Own Poetry Hindi

ये बढ़िया चौकीदारी है।

ये बढ़िया चौकीदारी है।

चोर घूमें सड़कों पर
और चोर से तुम्हें बचाने को
तुम पर ही पहरेदारी है।
ये बढ़िया चौकीदारी है।

तनख्वाह इस चौकीदार की
आती जाने किस द्वार से?
ये हम पर बहुत ही भारी है।
ये बढ़िया चौकीदारी है।

कुछ सत्तर साल पुराने
एक दूजे चौकीदार का
भूत इनपर भारी है।
ये बढ़िया चौकीदारी है।

इंतजार वेकैन्सी का करना
तुम छोड़ो, ट्विटर पर
अब आबंटन की बारी है।
ये बढ़िया चौकीदारी है।

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कंकड़-पत्थर

राहों में चलते-चलते
कुछ मज़ेदार शक़ल के,
जो कंकड़-पत्थर मिले
हमने उठा लिए।

कभी कहीं किसी की
नज़रें मिली पारखी,
उन्हें अलट-पलट के
हीरे बता दिए।

हमसे तो ना बना
उनका मोल-भाव किए,
जो दाम दिया उन्होंने
ले हम आगे बढ़ गए।

Photo by Jeremy Thomas on Unsplash

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ख़ून की मांग

ख़ून के बदले ख़ून
मांग तो मैं भी लूं,
लेकिन वह ख़ून लेने
मैं तो जाऊंगी नहीं।
तो किस मुंह से मांगू
जो ख़ुद मैं लाऊंगी नहीं‌‌‍?

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नियम-क़ानून

स्टूडेन्ट हो,
एक्टिविस्ट न बनो।
एक्टिविस्ट हो,
किताबें ना पढ़ों।

हिन्दू हो,
मीट ना खाओ।
मुसलमान हो,
पाकिस्तान जाओ।

सरकार के आगे
सर झुकाओ।
डेमाक्रेसी का
भाव ना खाओ।

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आप फ़रमायें

हम तो जब वो पावर में आएंगे
तब उनपर भी सवाल उठाएंगे।
आप फ़रमायें,
कैसे हुक़ूमत बदलने पर आप
आज के दिन को कल रात
और रात को दिन बताएंगे?
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सफ़ल कलम

एक कलम थी
बड़ी सफ़ल थी।
सब उसका लिखा पढ़ते थे
बड़ी वाहवाहियाँ करते थे।

एक दिन वो मुझे मिली,
कोई घमंडी भी नहीं लगी।
तो हिम्मत करके मैंने पूछा,
“बहन, कैसे ऐसा करती हो?
ज़ुल्मों का रोना भरती हो,
लेकिन ज़ुल्मी भी उसपर फ़िदा हैं,
मैं नहीं पूरा बाज़ार गवाह है।”

सुनकर वो हँसी,
हंसी थी बड़ी तीखी।
और मेरे सवाल पर
वो आश्चर्यचकित नहीं थी।
“तुम्हें राज़ अपना बताती हूँ।
पूछी है पते की बात तुमने,
तुमसे नहीं छिपाती हूँ।
व्यथाओं पर आहें भरना
सबको अच्छा लगता है।
आहें भर कर ज़ुल्मी भी
ख़ुद को हमदर्द समझता है।
पर क्या देखा नहीं तुमने,
मैने कभी इंसाफ़ नहीं मांगा।
व्यथाएं सुनाई बस
बदलाव नहीं मांगा।
अगर मांगा होता तो
आहें भरने वालों के
रास्ते में आती।
उनका दिन ख़राब होता
नींदें उड़ जाती।

कोई नहीं होता फिर
जो आहें भरता।
ना ही कोई होता
कि वाहवाहियां करता।
सफ़लता फिर मेरी
गोद में ना आती।
स्याही छिन जाती मेरी
मैं मार दी जाती।”

मेरा भौंचक्का चेहरा देख
वो फिर ज़ोर से हंसी।
और हंसते-हंसते यों ही
अपने रास्ते चल दी।

Photo by rawpixel.com on Unsplash

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पद्मावती

पुरुष की ही नज़रों का शिकार थी
तुम तब भी पद्मावती
और आज भी।

सिंदूर का ग़ुलाम किसने किया?
सौंदर्य का बखान किसने किया?
जौहर का इंतज़ाम किसने किया?
युद्ध में, जुए में, स्त्री को परिभाषित
जीतने वाला सामान किसने किया?

ना किसी मुसलमान की हवस थी
ना ही थी किसी राजपूत की हार,
तुम्हें आग में ढकेलने वाला था
पुरुष का तुम पर तुमसे ज़्यादा अधिकार।

तो जौहर में तुम्हें झोंकने वालों को आज
राजपूत और मुसलमान किसने किया?

उन्होंने जो तुम्हारे ज़िंदा जलते शरीर पर
शर्म और दर्द नहीं महसूस करते,
गर्व का महोत्सव मनाना चाहते हैं।
और जो स्त्री को आज भी
तलवार चलाना सिखाने की जगह
आग में जलाना चाहते हैं।
तुम्हारे मुंह से तो कभी सुनेंगे नहीं
कहानी तुम्हारी,
वे अपने शब्दों का
डंका बजवाना चाहते हैं।

पुरुष के ही शब्दों का शिकार थी
तुम तब भी पद्मावती
और आज भी।

Photo by Ravi Shekhar on Unsplash