सीख

बचपन में सिखाया था
बुजुर्गों ने
कि बूंद-बूंद से ही
घड़ा भरता है।

कहीं और ये सीख
इतनी काम ना आई
जितनी बैंगलोर के ट्रैफ़िक में।

आखिर इंच-इंच खिसक के ही तो
हम घर पहुँचते हैं।

मेरे बचपन के भगवान

मेरे बचपन के भगवान
खो गए तुम
मेरे बड़े होते-होते।

अब लगता नहीं कि तुम हो।
लेकिन तुम पर भरोसा बना रहता
तो अच्छा होता।
परेशानी के पलों में
झूठा ही सही
कोई सहारा होता।

लेकिन क्या करूँ?
बड़े होते हुए
तुम्हारे नाम पर
लोगों को बस अपना उल्लू
सीधा करते ही देखा,
मारते-काटते देखा,
लूटते-पीटते देखा,
दबाते-कुचलते देखा।

उठ गया मेरा भरोसा
तुम्हारी कहानियों से,
और खो गए तुम
मेरे बचपन के भगवान।

हड़प्पा के नाम

कौन थे तुम?
कहाँ से आए थे?

कौन सी अनजानी
भाषा बोलते थे?
कैसे आजीबोगरीब
अक्षर लिखते थे?
किसको पूजते थे?
किससे डरते थे?
मृतक शरीरों का
क्या करते थे?

कहाँ से सीखा,
ईंटें सिंकाना?
सड़कों सी चौड़ी
दीवारें उठाना?
पक्की नालियाँ
और किले बनाना?
खिलौने ढालना,
मनके सजाना?

कौन सी आँधी
थी वो समय की
जो लील गई तुम्हें
ये सब करके भी?
किसी को अपनी भाषा
सिखा भी न सके
क्या कहते थे ख़ुद को
इतना भी बता न सके।

और सदियों बाद
एक-एक कर के,
तुम्हारे टूटे मटके
जोड़ जोड़ के,
तुम्हें जानने की
हम कोशिश कर रहे।
डग-डग पर लेकिन
हैं हम अटक रहे।

दुख है हमें
तुम्हारा किया गँवाने का।
गुस्सा है
तुम्हें न समझ पाने का।
डर भी है
तुम्हारी तरह मिट जाने का,
किले टूट जाने का,
दीवारें गिर जाने का।

और इसलिए
हम पूछना बंद नहीं कर सकते-
कौन थे तुम?
कहाँ से आए थे?

Inspired by my recent trip to Dholavira and Lothal with Carnelian.

बंद करो

बंद करो
इतिहास में जीना
बाप की ख़ता का
बेटे से बदला लेना।

वर्ना बेटे का बेटा
तुम्हारे बेटे से बदला लेगा
और ये खूनी खेल
कभी खत्म ना होगा।

एक ही बात है

माँ running water tap घर में लगने पर भी
आटा गूँधने के बाद, सूखे आटे से गीला आटा छुड़ाती थी।

पापा auto-start वाली motorcycle खरीद कर भी
उसे kick-start ही करते थे।

मुझे बड़े से screen वाले phone में भी
Physical keyboard चाहिए।

एक ही बात है।