पद्मावती

पुरुष की ही नज़रों का शिकार थी
तुम तब भी पद्मावती
और आज भी।

सिंदूर का ग़ुलाम किसने किया?
सौंदर्य का बखान किसने किया?
जौहर का इंतज़ाम किसने किया?
युद्ध में, जुए में, स्त्री को परिभाषित
जीतने वाला सामान किसने किया?

ना किसी मुसलमान की हवस थी
ना ही थी किसी राजपूत की हार,
तुम्हें आग में ढकेलने वाला था
पुरुष का तुम पर तुमसे ज़्यादा अधिकार।

तो जौहर में तुम्हें झोंकने वालों को आज
राजपूत और मुसलमान किसने किया?

उन्होंने जो तुम्हारे ज़िंदा जलते शरीर पर
शर्म और दर्द नहीं महसूस करते,
गर्व का महोत्सव मनाना चाहते हैं।
और जो स्त्री को आज भी
तलवार चलाना सिखाने की जगह
आग में जलाना चाहते हैं।
तुम्हारे मुंह से तो कभी सुनेंगे नहीं
कहानी तुम्हारी,
वे अपने शब्दों का
डंका बजवाना चाहते हैं।

पुरुष के ही शब्दों का शिकार थी
तुम तब भी पद्मावती
और आज भी।

Photo by Ravi Shekhar on Unsplash

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बेचारे पुरुष बड़े आहत हैं

एक स्त्री के सिंदूर पर सवाल से
बेचारे पुरुष बड़े आहत हैं।
यूं लगता है सखी कि सिंदूर में
वाकई बड़ी ताक़त है।

जादूगर का तोता है सिंदूर,
जान बसती है इसमें,
पहनने वाले की नहीं,
उसकी ज़िंदग़ी को जकड़ के रखने वाले
पुरुषों के बनाए गए समाज की।

Sanyasi

और उन समाज-निर्माताओं ने
फ़तवा दिया है,
कि सिंदूर पर सवाल किया,
तो तुम जाहिल हो।

अगर तुम्हारी शिक्षा-दीक्षा ने
तुम्हें सिंदूर पर अटका दिया है,
सवाल खड़े करने की तुम्हारी
शक्ति ख़तम कर दी है,
तो तुम्हारे चुप सयानेपन से बेहतर
मेरी सवाल पूछने वाली जहालत है।
एक स्त्री के सिंदूर पर सवाल से
बेचारे पुरुष बड़े आहत हैं।

Photo by Ashes Sitoula on Unsplash

दीवाली की रोशनी की मेहनत

ये तो सच है माँ
कि तुम्हारे बचपन में
दीवाली की रोशनी पर
बड़ी मेहनत लगती थी।

दिये लाते थे,
पानी में डालकर
फिर सुखाते थे,
बातियाँ बनाते थे,
तेल लगाते थे,
फिर एक-एक कर के
सारे दिये जलाते थे।

हमारा क्या?
एल ई डी की लड़ियाँ लाते हैं,
सॉकेट में लगाते हैं,
और बटन दबाते हैं।

लेकिन वो लड़ियाँ खरीदने के लिए
पार्किंग ढूँढ़ने में जो मेहनत लगती है ना
उसे कम मत आँको, माँ।

यहाँ सोचना गुनाह है।

यहाँ सोचना गुनाह है।

झुका सर, नपे कदम,
उनकी राह चलें जो हम,
वही सही राह है।

यहाँ सोचना गुनाह है।

तुम्हारे दिमाग के कीड़े
उनके नाज़ुक दिल को ना छेड़ें,
लगती बुरी उनकी आह है।

यहाँ सोचना गुनाह है।

पूछो ना कोई सवाल
तुम ठहरे जयचंद के लाल।
उसकी किसे परवाह है?

यहाँ सोचना गुनाह है।

पत्थर चुभते नहीं,
बर्फ पिघलती नहीं,
जो उन्होंने कहा
तो आग जलती नहीं।
तलवार उनके हाथ में
मगर मज़लूम वही हैं।
तुम्हारे सुबूत ओ सुराग
किसी काम के नहीं है।
मुक़दमा चल चुका है
फ़ैसला फरमाया है,
पूछो नहीं कि कौन सी
अदालत ने सुनाया है।
बस इतना काफी है कि
उनका इतिहास गवाह है।

यहाँ सोचना गुनाह है।

सीख

बचपन में सिखाया था
बुजुर्गों ने
कि बूंद-बूंद से ही
घड़ा भरता है।

कहीं और ये सीख
इतनी काम ना आई
जितनी बैंगलोर के ट्रैफ़िक में।

आखिर इंच-इंच खिसक के ही तो
हम घर पहुँचते हैं।