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बुनियादी बातें #9: समता, मेरिट, प्रिविलेज

हमने पिछला भाग इस सवाल पर छोड़ा था कि समता का मतलब क्या है? और मुझे आशा है कि आपका निष्कर्ष यह था कि सिर्फ सबके ऊपर नियम क़ानून लगाना समता नहीं है। उससे ज़्यादा कुछ चाहिए ताकि जिस समता का अभी समाज में अभाव है, वह लाई जा सके।

लेकिन समाज में समता लाने का भी क्या मतलब है? क्या इसका मतलब यह है कि सारे लोग बिल्कुल एक जैसे हो जाएंगे? कि उनकी सोच-समझ, हाव-भाव, सूझ-बूझ, क्षमताएँ, इच्छाएँ सभी एक जैसी होंगी? ये थोड़ी पागलपंथी वाली बात लगती है। हम सब जानते हैं, अपने अनुभव से, कि ऐसा नहीं हो सकता है। समता का मतलब समानता नहीं होता है। सब लोग एक जैसे नहीं होते।

तो अगर सब लोग अलग-अलग होते हैं तो ज़ाहिर है कि उनकी ज़िंदग़ी भी अलग-अलग होगी ही। तो फिर समता का मतलब है क्या?

जवाब यह है कि समता का अपने आप में ज़्यादा कुछ मतलब नहीं होता। समता कोई इंसान के अंदर की चीज़ नहीं होती। समता हमारे समाज और सिस्टम का एक पहलू होती है। और इसलिए जब भी हम समता की बात करते हैं तो यह पूछना पड़ता है कि भाई! किस चीज़ की समता? अगर किसी ने कह दिया की हर चीज़ की समता, तो दुबारा पूछना पड़ता है कि किस-किस चीज़ की समता?

जैसे कि एक तरह की समता होगी आर्थिक समता। और फिर पूछना पड़ेगा कि आर्थिक समता का मतलब क्या है? क्या इसका मतलब है कि सबके पास बराबर पैसे होने चाहिए? अगर हम ऐसा समाज बना पाते जिसमें सबके पास बराबर पैसे होते और सब लोग अपना-अपना काम करते और मिल-जुल कर खुशी-खुशी रहते, तो फिर बात ही क्या होती? लेकिन सपने देखना छोड़ते हैं और यह मान लेते हैं कि आर्थिक समता का मतलब यह नहीं हो सकता कि सबके पास बराबर पैसे हैं।

आर्थिक समता का दूसरा मतलब यह हो सकता है कि अगर पैसे बनाने का कोई तरीका है तो वह सबको उपलब्ध है। जैसे कि अगर कोई नौकरी उपलब्ध है तो उसे पाने का हक़ सबको है। अगर कोई बिज़नेस है जो आप शुरू कर सकते हैं, तो उसे शुरु करने से मुझे भी कोई नहीं रोक सकता है। चलो ये तो ठीक है, लेकिन इसके बाद अगला सवाल आता है कि जब एक नौकरी हो और उसे पाँच लोग पाना चाहें तब कोई क्या करे? दूसरी चीज़ यह भी है कि सब लोग समान तो होते नहीं, तो फिर यह भी ज़रूरी नहीं कि सब लोग वह नौकरी करने के क़ाबिल हों। कुछ लोग बिलकुल क़ाबिल नहीं होंगे, और कुछ कम, तो कुछ ज़्यादा।

इन दोनों वजहों से हम समता के सिद्धांत के साथ मेरिट की बात करना शुरु करते हैं। कि नौकरी उसे मिलेगी जिसके अंदर उस नौकरी के लिए सबसे ज़्यादा क़ाबिलियत है, यानि जिसके पास सबसे ज़्यादा मेरिट है। अब मेरिट के विचार से हम इतनी अच्छी तरह से वाक़िफ़ हैं कि इसमें कोई पेचीदगी हो सकती है, ऐसा हम कभी सोचते ही नहीं हैं। लेकिन ज़रा एक मिनट ठहरिए और सोचिए कि मेरिट का मतलब क्या है? क्या जो तरह-तरह की परीक्षाएँ हमने बना रखी हैं – पढ़ाई के लिए, नौकरियों के लिए – उनके परिणाम मेरिट हैं? अगर वह पक्का मेरिट है, तो कहीं भी सरकारी नौकरी में, जिसके लिए इतना कॉम्पीटीशन होता है और इतनी परीक्षाएँ पास की जाती हैं, कोई ऐसा इंसान नहीं होता जो कि सही से काम नहीं करता। लेकिन ऐसे लोग भर-भर के होते हैं। अब आप कहेंगे कि उन्हें काम करना आता तो है, लेकिन वे करना नहीं चाहते हैं। तो किसी काम को सही से करने के लिए अगर काम करना चाहना ज़रूरी है तो मेरिट की परिभाषा में वह भी तो शामिल होना चाहिए? जो इंसान कुर्सी पर बैठ कर काम नहीं कर रहा है, उसकी जगह अगर कोई ऐसा इंसान वहां होता जिसके नंबर उससे थोड़े कम आए होते, लेकिन जो काम करना चाहता, तो वह बेहतर काम कर रहा होता।

तो ज़ाहिर है कि मेरिट की जो भी परिभाषा हमने निकाली है वह ऐसी कोई ऑब्जेक्टिव तो नहीं है। उससे किसी काम के लिए इंसान की क़ाबिलयत का सही पता चले, यह ज़रूरी नहीं है। इस बात को ध्यान में रखते हैं, लेकिन आगे भी बढ़ते हैं।

माना कि हमारी मेरिट की परिभाषा बहुत सटीक नहीं है, लेकिन वह सबके लिए समान तो है? हर काम के लिए हमें सबसे अच्छा व्यक्ति मिले या नहीं मिले, लेकिन नौकरी कर के जीवनयापन करने का जो हक़ सब लोगों को है, उसे पाने के लिए सबको एक ही तराजू पर तो तौला जा रहा है? तो ये काम तो हम सही कर रहे हैं। लेकिन क्या यह भी समता के लिए काफ़ी है?

एक उदाहरण लेते हैं। जब मैं दसवीं की परीक्षा दे रही थी, तो उस पूरे साल में मेरे पास पढ़ाई करने के अलावा कोई काम नहीं था, कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी। मैं एक होस्टल में रहती थी, जहाँ मेरे आस-पास के और लोग भी उतनी ही मुस्तैदी से परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। हमारे शिक्षक काफ़ी क्वालिफाइड थे, और वे हर समय हमारे लिए उपलब्ध भी थे। परीक्षा के समय तक आते आते, मैंने इतने सारे सैंपल पेपर सॉल्व किये हुए थे कि किसी भी विषय की परीक्षा में शायद ही कोई प्रश्न ऐसा था जिसका उत्तर मैंने पहले कई बार लिखा हुआ ना हो।

यही परीक्षा कुछ ऐसे बच्चे भी दे रहे होंगे जिनके घर में उनकी पढ़ाई के लिए कोई शांत जगह तक नहीं होगी, जिनको घर के काम करने पड़ते होंगे, या शायद घर के बाहर भी – खेत में, दुकान पर, जिनके स्कूलों में हर विषय के शिक्षक भी नहीं होंगे, होंगे भी तो काम पर आते नहीं होंगे, ठीक से पढ़ाते नहीं होंगे।

क्या उस परीक्षा में मेरे नंबर उन बच्चों से ज़्यादा आए, तो कोई आश्चर्य की बात है? क्या यह मेरिट सिर्फ मेरी प्रतिभा का नतीजा था? नहीं। इस मेरिट में एक बड़ा योगदान उन बच्चों की तुलना में मेरी प्रिविलेज का भी था।
कुछ और लोग भी वही परीक्षा दे रहे होंगे जिनका प्रिविलेज मुझसे भी ज़्यादा था। हमारे होस्टल में गर्मियों में बिजली चली जाती थी तो पंखा नहीं होता था, जबकि महानगरों में पल रहे अमीर बच्चों को पास ए. सी. रहा होगा। हमारे ही स्कूल के लड़के भी हमसे थोड़े ज़्यादा प्रिविलेज्ड थे, क्योंकि वे गर्मी में अपने कमरों से बाहर निकल कर पढ़ सकते थे या खिड़की खुली रख सकते थे। लेकिन लड़कियों को यह आज़ादी भी नहीं थी, उनकी ‘सुरक्षा’ के लिए। तो पसीने में नहा रहे हों या गर्मी से दम फूल रहा हो, पढ़ाई करनी है तो उसी बंद, गर्म कमरे में करनी है।

हम अपने से ज़्यादा प्रिविलेज वाले लोगों को देख कर अपना प्रिविलेज भूल जाते हैं। लेकिन यह मत भूलिए कि मेरिट में प्रिविलेज का बड़ा हाथ होता है।

कुछ लोग उन लोगों का उदाहरण देकर जिन्होंने प्रिविलेज ना होने पर भी सफलता हासिल की है, यह साबित करना चाहते हैं कि प्रिविलेज होने या ना होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। इसके जवाब में अंग्रेज़ी की एक अच्छी कहावत है: Exception that proves the rule – अपवाद जो सिद्धांत को साबित करता है। कैसे? इस बात से कि कम प्रिविलेज वाले लोगों की सफ़लता के उदाहरण इतने कम होते हैं कि वे हेडलाइन बन जाते हैं। इससे यह साबित नहीं होता कि प्रिविलेज से फ़र्क नहीं पड़ता। इससे यह साबित होता है कि प्रिविलेज की कमी पूरा करने के लिए उनके अंदर की प्रतिभा को और भी ज़्यादा मजबूत होना पड़ता है। इसलिए बिना प्रिविलेज के बहुत कम लोग वह सफलता प्राप्त कर सकते हैं। अगर उतनी प्रतिभा के साथ उन्हें प्रिविलेज भी मिला होता, तो वे और भी बेहतर करते। और जिन प्रिविलेज वाले लोगों ने उनके जितनी सफलता पाई है, उनकी अंदरूनी प्रतिभा कहीं कम है।

तो याद रखिएगा कि मेरिट की जो भी परिभाषा हो, लेकिन उसका समीकरण कुछ ऐसा होता है:

मेरिट = प्रतिभा + प्रिविलेज

तो जहाँ समता की समस्या हम मेरिट के बल पर सुलझाने की कोशिश कर रहे थे, वहाँ प्रिविलेज की पेचीदगी आ गई है। प्रिविलेज कहाँ से आता है? इसके बारे में हम अगली बार बात करेंगे।

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बुनियादी बातें #8: समता क्या है?

‘क़ानून के सामने सभी बराबर होते हैं।’

किसी हीरो की भारी-भरकम आवाज़ में ये किसी भी हिन्दी फ़िल्म का डायलोग हो सकता है। और हममें से ज़्यादातर लोग इसके बारे में ज़्यादा सोचेंगे नहीं। क्योंकि ये हमें बड़ी साधारण सी बात लगती है जो हर किसी को समझ में आती है। समता का सिद्धांत हमारे संविधान में निहित हैं। सभी नागरिक बराबर हैं। मैं इसके बारे में कुछ और क्यों लिखना चाहती हूँ? इसलिए कि समता का सिद्धांत तो ठीक है लेकिन इसका मतलब क्या होता है और इसका स्वरूप क्या होना चाहिए, यह तय करना हमेशा आसान नहीं होता है।

एक उदाहरण लेते हैं।

अगर एक इंसान किसी दूसरे का ख़ून करता है, तो उसके लिए हमारे क़ानून में सज़ा नियत है। मान लीजिए कि उसकी सज़ा उम्रक़ैद है। तो मुज़रिम अमीर हो या ग़रीब, उसे यही सज़ा होनी चाहिए। इसमें ज़्यादा लोगों को आपत्ति तो नहीं होती है।

एक थोड़ा अलग उदाहरण लेते हैं। चोरी का। मान लीजिए कि चोरी की सज़ा यह है कि मुज़रिम को चोरी किया हुआ सामान या उसका दाम वापस करना होगा और साथ में कुछ और हर्ज़ाना भी भरना होगा। अब मान लीजिए कि किसी ऐसे ग़रीब आदमी ने, जो कि भूख से मर रहा हो, एक बहुत ही अमीर आदमी के घर से थोड़ा खाना चुरा कर खा लिया। उस अमीर आदमी के घर पर इतना खाना था कि अगर यह चोर रंगे हाथों पकड़ा ना जाता तो शायद किसी को पता भी नहीं चलता कि थोड़ा खाना चुराया गया है। लेकिन यह चोर पकड़ा गया। खाना तो उसने खा लिया है, वह वापस हो नहीं सकता। और पैसे उसके पास हैं नहीं, तो वह दाम या हर्ज़ाना तो क्या ही भरेगा? उसे शायद जेल जाना पड़ेगा।

क्या इस उदाहरण में आपको थोड़ी कसमसाहट सी होती है? मुझे होती है। कई लोगों को होती है। क्या हमारे समाज में कुछ गड़बड़ नहीं है कि कुछ इंसान भूख से मर रहे हैं, जबकि कइयों के यहाँ खाना बर्बाद हो रहा है? कुछ तो है जो सही नहीं लगता कि एक भूख से मर रहे आदमी को हम और सज़ा दे रहे हैं।

हमारे क़ानून या हमारी सरकार हाथ पर हाथ धरे इस परिस्थिति को स्वीकार नहीं कर लेते। गरीबों को खाना चुराने की छूट तो हम नहीं देते, लेकिन ऐसे सरकारी कार्यक्रम हैं, जिनका काम है यह सुनिश्चित करना कि जिन लोगों के पास भोजन-प्राप्ति के लिए संसाधन नहीं हैं, उन्हें मुफ़्त में या कम-से-कम दाम पर भोजन उपलब्ध करवाया जाए।

अब अगर इंसान अड़ जाए तो यह कह सकता है कि जब बाकी लोग अपना खाना पैसे देकर खरीदते हैं तो कुछ लोगों को यह मुफ्त में या कम दाम पर देना बाकी लोगों के समता के अधिकार का उल्लंघन हैं।

ऐसी परिस्थिति में हमें एक क़दम पीछे लेना पड़ेगा और ये पूछना पड़ेगा कि आखिर समता का सिद्धांत महत्वपूर्ण क्यों है? यह सिद्धांत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके जरिए हम एक न्यायपूर्ण समाज बनाना चाहते हैं। हम नहीं चाहते कि अमीर और शक्तिशाली लोग बाकी लोगों के साथ कुछ भी करें और कोई उनका बाल भी बांका ना कर पाए। अगर समता के सिद्धांत को हमने ऐसा स्वरूप दे दिया कि उससे कमज़ोर और दबे-कुचले लोगों की ही हालत और खराब होने लगे, तो इस सिद्धांत की कोई महत्ता ही नहीं रह जाएगी। जिस समाज में इतनी गरीबी है कि कुछ लोग खाने के लिए चोरी करने पर मजबूर हैं, वहाँ सारे चोरों को सज़ा देकर भी समाज का ज़्यादा कुछ कल्याण नहीं हो जाएगा। बल्कि वहाँ हमें यह पूछने की ज़रूरत है कि क्या समाज में कुछ लोगों का इतना गरीब होना अपने आप में ही समता के सिद्धांत की खिल्ली नहीं है?

जो सवाल यहाँ उठ रहे हैं, वे ये हैं:
1. जब हम समता के सिद्धांत की बात कर रहे हैं, तो हम अपने समाज के बारे में क्या कह रहे हैं? क्या हम यह कह रहे हैं कि समाज में समता पहले से है और हमारा काम इसे बरक़रार रखना है? या हम यह कह रहे हैं कि समाज में समता नहीं है और हमें उसे प्राप्त करने की कोशिश करनी है?
2. हम किस तरीके की समता की बात कर रहे हैं? क्या हम नियम-क़ानून सब के ऊपर एक तरीके से लगाने की बात कर रहे हैं? या उन नियम कानूनों का असर क्या होगा, इसकी बात कर रहे हैं?

दूसरा सवाल पहले से संबंधित है। दूसरे का जवाब पहले पर निर्भर करता है। अगर समाज में पहले से समता नहीं है, तो सबके ऊपर सिर्फ एक जैसे नियम-क़ानून लगाने से काम नहीं चलेगा।

इस भाग में मैं बस आपको इस विचार के साथ छोड़ देना चाहती हूँ कि क्या हम वाकई में समता की बात उतने अच्छे से समझते हैं, जितना हमें लगता है? क्या समाज में पहले से समता है? अभी के बाद जब किसी बात का समर्थन या विरोध आप समता के नाम पर करें, तो एक बार ज़रूर सोचें कि उस समता का मतलब क्या है?

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बुनियादी बातें #7: व्यक्ति, समाज और संविधान

हमारा संविधान बहुत तरह के समूहों को अलग-अलग तरीके से मान्यता देता है और एक व्यक्ति की पहचान उस समूह के सदस्य को रूप में स्वीकार करता है। हमारे देश का प्रशासन ही विभिन्न राज्यों में बंटा हुआ है। इसके जरिए एक क्षेत्रीय पहचान को मान्यता मिलती है। लोगों को अपने धर्म का पालन करने की आज़ादी है। इसलिए हालांकि हमारा कोई राष्ट्रीय धर्म नहीं है, लेकिन हम लोगों की धार्मिक पहचान को मिटाते नहीं है, उसे स्वीकार करते हैं। हमारे संविधान में बाइस भाषाएं आंठवें शेड्यूल में शामिल हैं। हर राज्य की आधिकारिक भाषा अलग हो सकती है जो वहाँ की स्थानीय भाषाओं में से चुनी जाती हैं। इस तरह भाषाई समूहों को भी पहचान मिलती है। कई क़ानूनों के जरिए परिवार को एक इकाई के रूप में भी मान्यता मिलती है।

लेकिन इन सबसे ऊपर हमारे संविधान में व्यक्ति की अपनी पहचान और अपने अधिकार हैं। एक व्यक्ति का मौलिक अधिकार उसके किसी भी समूह के अधिकारों के अधीन नहीं है। व्यक्ति की क़ानूनी पहचान सबसे पहले उसकी अपनी है।

वैयक्तिक अधिकारों और स्वतंत्रता पर आदर्श रूप से संविधान और क़ानून व्यवस्था उतनी ही रोक लगाती है जितनी समाज और देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए ज़रूरी है। कुछ मामलों में इसका निर्णय लेना आसान होता है। यह तो आज की तारीख़ में सभी मानेंगे कि किसी व्यक्ति को दूसरे का क़त्ल करने की आज़ादी नहीं होनी चाहिए। किसी दूसरे की चीज़ चुराने की भी आज़ादी नहीं होनी चाहिए। लेकिन और कई मामलों में यह सिद्धांत विविदास्पद हो सकता है। किसी धर्म में बहुविवाह की आज़ादी हो, या किसी समुदाय में जायदाद के मामलों मे लड़कों को प्राथमिकता मिलती हो, या किसी जनजाति के पारंपरिक पंचायती क़ानून हों जो कि उन्हें देश के क़ानूनों से ज़्यादा मान्य हों, तो ऐसी परिस्थितियों में पेचीदगी उत्पन्न हो जाती है। ख़ास कर जब एक तरफ़ तो हम हर समुदाय की पहचान को मान्यता देना चाहते हैं और इसलिए उन्हें अपनी परंपराओं की रक्षा करने का हक़ देना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ़ उन परंपराओं से उन समुदायों के लोगों के वैयक्तिक अधिकारों का हनन होता हो।

मोटे सिंद्धांत के तौर पर ऐसे मामलों में संविधान और क़ानून वैयक्तिक अधिकारों का साथ देता है।

उदाहरण के लिए इन बातों पर ध्यान दीजिए। हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है, लेकिन उसे यह अधिकार नहीं है कि अपने बच्चों को धर्म के बाहर जाकर शादी करने से रोके। उसके दूसरे सहधर्मियों को भी यह अधिकार नहीं है कि धर्म के नाम पर उसके खान-पान पर प्रतिबंध लगाए। इसी तरह संपत्ति और जायदाद से संबंधित कई क़ानूनों में पारिवारिक संबंधों का बहुत महत्व है, लेकिन आपके परिवार में किसी का यह हक़ नहीं कि वह आपसे आपकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कोई नौकरी करवाए। अग़र आपके परिवार के अंदर भी कोई आपके साथ मार-पीट करता है या आपको आर्थिक रूप से कोई धोखा देता है, तो आप उसके ख़िलाफ़ कार्यवाही कर सकते हैं। अगर आपके बच्चे वयस्क हैं, यानि अठारह साल से बड़े हैं, तो उन्हें अपनी मर्ज़ी से वोट देने से रोकने का, धर्म-परिवर्तन करने से रोकने का, पढ़ाई, नौकरी या शादी से संबंधित फ़ैसले लेने से रोकने का आपको कोई हक़ नहीं है। (शादी के संबंध में लड़कों की आयु सीमा इक्कीस साल है।) उसी तरह अगर आप वयस्क बच्चों को अपनी अर्जित सम्पत्ति से आर्थिक सहायता ना देना चाहें तो उन्हें आपसे वह सहायता मांगने का भी हक़ नहीं है।

राजनैतिक और ऐतिहासिक कारणों से कुछ मामले अभी भी ऐसे हैं हमारे सामने जिसमें यह पेचीदग़ी हल नहीं हो पाई है, लेकिन आम-तौर पर यह समझ कर चलने में कोई हर्ज़ नहीं है कि हमारा संविधान और शासन तंत्र हर व्यक्ति की स्वतंत्रता, गरिमा और अधिकारों का पक्षधर है। और हम अपने समाज को एक आधुनिक, उन्नत और सफल समाज तभी कह सकते हैं जब इसमें हर व्यक्ति को अपने तरीके से अपनी ज़िंदग़ी जीने का हक़ हो।

यह सिंद्धांत समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारी परंपराएं अक्सर इसे मान्यता नहीं देती है। सबसे करीबी उदाहरण शादियों का है। ‘अरेंज्ड मैरिज’ की परंपरा की वजह से परिवार के दबाव में आकर युवा अक्सर ही अपनी पसंद छोड़कर ऐसे व्यक्ति से शादी करते हैं जिन्हें उनके परिवार वालों ने चुना हो, जो उनके धर्म, जाति और सामाजिक स्तर के अनुकूल हों। जब लोग इस परंपरा के ख़िलाफ़ जाना चाहते हैं तो कई पढ़े-लिखे, आर्थिक रूप से संपन्न मध्यवर्गीय परिवारों में भी हंगामा खड़ा हो जाता है। कितने ही युवा-विद्रोह हर रोज़ हमारे समाज में दबाए जाते हैं। विद्रोही भी अधिकतर मामलों में इसे क़ानूनी मामला बनाने की नहीं सोचते हैं। ज़्यादातर मामलों में वे परिवार से हार भी जाते हैं। इसके बारे में चर्चा करने का उद्देश्य मेरा यहां पर ‘अरेंज्ड मैरिज’ या ‘लव मैरिज’ के फ़ायदे-नुक़्सान गिनाना नहीं है। बल्कि मैं ध्यान इस बात पर आकृष्ट करना चाहती हूँ कि किस तरह अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदग़ी में हम कई बार उन सिद्धांतों पर अमल नहीं करते हैं जिनपर हमारा स्वतंत्र, गणतांत्रिक, सांवैधानिक देश बना है।

अपने परिवार वालों या आस-पास के लोगों से उनकी वैयक्तिक स्वतंत्रता परिवार, धर्म, समाज के नाम पर छीनना तो ग़लत है ही, लेकिन यह सोच तब और भी चिंतनीय हो जाती है जब परंपराओं की दुहाई देकर लोग संविधान और क़ानून से ही उन सिद्धांतों को खतम कर देना चाहते हैं। अगर आप क़ानूनी तौर पर लोगों को खान-पान पर प्रतिबंध लगाना चाहते हैं, उनके शादी-ब्याह को नियंत्रित करना चाहते हैं, वह कहाँ रह सकते हैं, कहाँ नहीं इसपर पाबंदियाँ लगाना चाहते हैं, तो यह ध्यान रखें कि आप सांवैधानिक सिद्धांतों के विरोध में खड़े हैं और देश के उत्थान के रास्ते में आ रहे हैं। ऐसी प्रवृत्तियों से हमारे देश में हर व्यक्ति को वह गरिमा और स्वतंत्रता हासिल नहीं हो पाएगी जो एक आधुनिक, उन्नत समाज का लक्षण है।

एक बात साफ़ कर देनी यहाँ ज़रूरी है। वैयक्तिक स्वतंत्रता का यह मतलब नहीं है कि परिवार और समाज तितर-बितर हो जाएगा। ऐसा हो ही नहीं सकता क्योंकि मनुष्य स्वभाव से ही सामाजिक प्राणी है। वैयक्तिक स्वतंत्रता की बात करने वाला कोई भी इंसान इससे इंकार नहीं करता। बात सिर्फ़ इतनी है कि हमारी परंपराओं ने कई मामलों में समाज को व्यक्ति का शोषक बना दिया है। लेकिन समाज ही व्यक्ति की शक्ति भी होता है और हर व्यक्ति को समाज की ज़रूरत होती है। अगर ऐसा नहीं होता तो समाज का मतलब ही क्या रह जाएगा। वैयक्तिक स्वतंत्रता को प्रधानता देना यह सुनिश्चित करने में सहायक है कि व्यक्तियों के जिस समूह से समाज बना है, वह हर व्यक्ति के उत्थान और भलाई के लिए काम करे, ना कि समाज के नाम पर उन्हें दबाने के लिए।

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बुनियादी बातें #6: किसका लोकतंत्र?

हमने पहले बात की थी कि किस तरह हमारे देश का लोकतांत्रिक या गणतांत्रिक होना ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि हमारी व्यवस्था का सांवैधानिक होना भी बहुत महत्वपूर्ण है। सांवैधानिकता है जो हमारी सरकार को उसकी पावर का गलत इस्तेमाल करने से रोकती है। लेकिन सांवैधानिकता सिर्फ़ शासनतंत्र को नियमित करने के लिए ज़रूरी नहीं है। यह लोकतंत्र को एक न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाए रखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

अब तक हमने सरकार और नागरिकों की बात ऐसे की है मानो नागरिक सब एक जैसे ही हैं और उनका भला-बुरा सब एक जैसा ही है जिसको ध्यान में रख कर सरकार को काम करना होता है। लेकिन सारे नागरिक एक जैसे नहीं हैं। वे कई तरह के अलग-अलग समूहों में बँटे हुए हैं। और कौन किस समूह का हिस्सा है इसपर उसकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति निर्भर करती है, उसकी सोच-समझ निर्भर करती है, उसकी भले-बुरे की पहचान निर्भर करती है। समूह शब्द का इस्तेमाल मैंने कई तरह की विविधताओं को जताने के लिए किया है। ये कोई सोच-समझ कर बनाए गए समूह नहीं हैं। लिंग, धर्म, जाति, आर्थिक स्थिति, भाषा, क्षेत्र किसी भी तरह की विविधता अलग-अलग समूहों का निर्माण करती है।

अब इंसान की यह प्रवृत्ति होती है कि अपने जैसे लोगों की ज़्यादा परवाह करता है। तो इसलिए एक समूह के लोग एक-दूसरे के साथ ज़्यादा खड़े होते हैं, बजाय कि किसी दूसरे समूह के लोगों के साथ। बच्चों की भी लड़ाई होती है मां-बाप अपने बच्चों की ज़्यादा तरफ़दारी करते हैं। अपने धर्म, अपनी जाति वाले लोगों के साथ लोग ज़्यादा जाना-पहचाना महसूस करते हैं। दूर देश में कोई अपनी भाषा बोलने वाला मिल जाता है तो उसपर अपने पड़ोसी से भी ज़्यादा भरोसा कर बैठते हैं, भले ही असल में अपनी भाषा बोलने वाला इंसान कोई बड़ा ठग हो और दूसरी भाषा बोलने वाला पड़ोसी बहुत नेक़दिल हो। फ़िर कई बार एक समूह के लोगों की भलाई भी एक सी चीज़ों में होती है। अगर एक बांध बनने से एक क्षेत्र के गांव पानी में डूबने वाले होते हैं, तो दूसरे क्षेत्र के गांवों में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होने वाला होता है। ज़ाहिर है कि दोनों जगह रहने वालों लोगों के बांध के बारे में विचार अपने आस-पास रहने वाले लोगों से मिलेंगे। जिनके गांव डूबने वाले हैं, उन्हें बांध का विचार गलत लगेगा। जिन्हें पानी मिलने वाला है, उन्हें सही लगेगा।

यह समूहों की “अपने” लोगों का साथ देने की प्रवृत्ति के साथ यह भी ध्यान में रखें कि हमारे लोकतंत्र में कई फ़ैसले बहुमत से तय होते हैं। तो अगर किसी एक समूह में लोगों की संख्या ज़्यादा है तो क्या वह लोकतंत्र का फ़ायदा उठा कर सारे फ़ैसले अपनी मर्ज़ी के या अपने हक़ में करवा सकते हैं? क्या जिस धर्म के लोग ज़्यादा हैं देश में वे अपने धर्म के ज़्यादा प्रतिनिधि विधायिका में भेज कर उनसे यह क़ानून बनवा सकते हैं कि बाकी लोगों को अपना धर्म मानने की, अपने तरीके से पूजा-पाठ करने की स्वतंत्रता ना रहे। क्या पुरुष जिनका राजनीति में ज़्यादा प्रतिनिधित्व है महिलाओं से मतदान का अधिकार छीन सकते हैं?

वे यह सब नहीं कर सकते और यहीं पर संविधान फ़िर से अपनी भूमिका निभाता है। हमारा संविधान लोगों को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है। इसलिए अगर देश के अस्सी प्रतिशत लोग भी चाहें तो किसी धार्मिक समूह की यह स्वतंत्रता छीन नहीं सकते। इक्यावन प्रतिशत पुरुष भी उनचास प्रतिशत महिलाओं से मतदान का अधिकार नहीं छीन सकते।

इस पूरी कहानी का मतलब यब है कि यह हमारे देश की सांवैधानिकता है जो लोकतंत्र को बहुसंख्यक नागरिकों के समूह की दादागिरी बनने से बचाती है और हर नागरिक को न्याय दिलाती है, अभिव्यक्ति और धर्म की स्वतंत्रता देती है, हर व्यक्ति की गरिमा सुनिश्चित करती है। इसका यह भी मतलब है कि अगर किसी प्रस्ताव या फैसले की तरफ़दारी इसलिए की जा रही है क्योंकि देश में ज़्यादा लोग ऐसा चाहते हैं, तो सिर्फ़ उस वजह से वह फैसला सही नहीं हो जाएगा। अगर उससे किसी भी व्यक्ति के अधिकारों के हनन की नौबत आती है या संविधान के किसी भी हिस्से की वह अवज्ञा करता है, तो वह फ़ैसला नहीं लिया जा सकता।

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बुनियादी बातें #5: संविधान, लोकतंत्र और बदलाव

हमने ये देखा कि किस तरह हमारा संविधान हमें देश के क़ानून बदलने की एक व्यवस्था देता है, जिससे कि अगर कोई गलत क़ानून रह गया हो तो उसे हटाना, या ज़रूरत के हिसाब से नए क़ानून बनाना संभव है। और यह सब सांवैधानिक दायरे में रह कर होता है।

लेकिन ख़ुद संविधान का क्या? हमारा संविधान बहुत बड़ा है और बहुत सारे अलग-अलग मुद्दों को नियमित करता है। संविधान निर्माताओं को भी यह पता था कि समय के साथ कुछ मुद्दों पर संविधान की धाराएं देश और नागरिकों के भले के लिए उचित नहीं रह जाएंगी। इसलिए संविधान में ख़ुद संविधान को बदलने का भी रास्ता है। लेकिन ये संविधान के अंदर रहकर क़ानून बनाने या बदलने से ज़्यादा मुश्किल है। यह सावधानी बरतना सही भी है। क्योंकि हमारे सांवैधानिक शासन-तंत्र में हर किसी को न्याय दिलाने के लिए संविधान ही हमारा आखिरी सहारा है। तो हर ऐरे-गैरे कारण पर हम संविधान नहीं बदलते रह सकते। लेकिन जब वाकई जनता की ज़रूरत हो तो बदलने का तरीका ज़रूर है।

तो ये बताइए कि क्या हम संविधान को बदल कर उसमें यह व्यवस्था कर सकते हैं कि फलां आदमी आज से हमारा राजा होगा। प्रधानमंत्री चुने नहीं जाएंगे, बल्कि इस राजा द्वारा अपनी मर्ज़ी से नियुक्त किये जाएंगे, राष्ट्रपति का पद हटा दिया जाएगा और यह राजा का पद वंशानुगत होगा?

क्या यह यह संभावना आपको मज़ाक लग रही है? ऐसा है तो कुछ दूसरे देशों की कहानियाँ सुनते है।

पहली कहानी है फ़्रांस की। अगर स्कूल में पढ़ाया गया विश्व इतिहास आपको थोड़ा भी याद हो फ्रांसीसी क्रांति याद होगी, जो कि 1789 में हुई थी, फ़्रांस के राजा के ख़िलाफ़। आपको नेपोलियन का नाम भी याद होगा, जो बाद में फ़्रांस के सम्राट बन गए थे और जिनके युद्धों ने कई योरोपी देशों की हालत ख़राब कर दी थी। नेपोलियन फ़्रांस के सम्राट् 1804 में बने थे। अब सोचिए कि जिस देश ने राजा को हटाने के लिए इतनी बड़ी क्रांति कर दी और जिसके लिए कई सारे लोगों की जानें गईं, पंद्रह सालों के अंदर वहाँ एक सम्राट् कैसे पैदा हो गया?

लोकतांत्रिक तरीकों से।

फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात् काफ़ी उथल-पुथल के बाद वहाँ गणतंत्र की स्थापना हुई थी। उस गणतंत्र के लिए कभी युद्ध करते हुए और कभी शांति स्थापित करते हुए नेपोलियन ने अपनी पहचान बनाई। लेकिन सम्राट् वह युद्ध करके नहीं बने। उसके लिए धीरे-धीरे अपनी पावर बढ़ाई, पहले खुद को गणतंत्र का पहला कंसुल नियुक्त करवाया और अंत में एक रेफ़रेंडम करवा कर ख़ुद को सम्राट् नियुक्त किया। रेफ़रेंडम से ज़्यादा लोकतांत्रिक और क्या हो सकता है?

दूसरी कहानी जर्मनी की है और वहाँ के भी एक बहुत प्रचलित व्यक्ति की है। हिटलर का नाम आज दुनिया में कौन नहीं जानता, भले ही बदनामी में जाने। हिटलर ने इटली के मुसोलिनी से प्रभावित होकर एक बार ज़बरदस्ती सत्ता हासिल करने की कोशिश की थी लेकिन बुरी तरह असफ़ल हो गये थे। इसके लिए उन्हें कुछ समय जेल में भी बिताना पड़ा था। उसके बाद उन्होंने निर्णय लिया कि लोकतांत्रिक तरीकों से ही सत्ता हासिल करेंगे। और ऐसा ही किया। लेकिन जब सत्ता हासिल हुई तो फिर संविधान का ही इस्तेमाल कर कर के ऐसे क़ानून पास किए और ऐसे बदलाव लाए कि जर्मनी के तानाशाह हो गए।

यहाँ पर ध्यान देने वाली दो बातें हैं। एक यह कि कई बार लोग ख़ुद ही या तो तानाशाही को चुनते हैं या चुप रह कर उसको आगे बढ़ने देते हैं। शायद उनकी चुप रहने की कोई व्यक्तिगत मजबूरी या भय होता है या तत्काल की परिस्थितियों से परेशान होकर उन्हें तानाशाही लोकतंत्र से बेहतर विकल्प लगने लगती है। लेकिन आख़िरकार लोकतंत्र को खो देने की मार पड़ती ही है। फ्रांस से नेपोलियन का साम्राज्य गया, और उसके बाद की उथल-पुथल में कभी राजतंत्र वापस आया, कभी गणतंत्र। सोचिये कि उस देश के लोगों की क्या हालत होगी जिसका शासन का तंत्र रोज़ बदलता रहे और कल तक जो चीज़ आपका हक़ थी, वह अचानक आज अपराध हो जाए? जर्मनी में नाज़ी शासन ने ऐसा कहर ढाया कि एक तरफ़ तो अपने ही नागरिकों की हत्या की और दूसरी तरफ़ हर देश से दुश्मनी। नतीजा हुआ द्वितिय विश्व युद्ध, उसमें मिली हार, और देश की बरबादी और विभाजन।

दूसरी बात यह है कि लोकतंत्र को खतरा हमेंशा बाहरी ताक़तों या मिलिट्री से नहीं होता है। जिन लोगों और सरकारों को हमने लोकतांत्रिक तरीकों से चुना है वे लोकतांत्रिक नियमों का गलत इस्तेमाल कर के ही लोकतंत्र का मज़ाक बना कर छोड़ सकते है या उसे पूरी तरह मिटा भी सकते हैं।
इसलिए लोकतंत्र को लेकर हम कभी असावधान नहीं रह सकते। सरकार के कामों पर नज़र रखना और हर परिस्थिति में लोकतंत्र की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। तभी हम अपने लिए और आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक न्यायपूर्ण समाज बना पाएंगे।

हमारे देश में लेकिन एक अच्छी व्यस्था है संविधान को बदलने के मामले में, जो कि दरअसल संविधान से नहीं आई है, बल्कि न्यायपालिका से आई है। इसे “बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन” कहते हैं। इस सिद्धांत के तहत विधायिका संविधान में कोई ऐसा परिवर्तन नहीं कर सकती जिससे संविधान का मूल स्वरूप (बेसिक स्ट्रक्चर) बदल जाए। अपने आप में यह एक बड़ा विषय है जिसमें कई मुद्दे विवादास्पद हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह है कि हम अपना संविधान बदल कर ख़ुद को गणतंत्र से राजतंत्र नहीं बना सकते, अपना कोई सम्राट् नहीं चुन सकते। अगर विधायिका ने ऐसा कुछ किया तो न्यायपालिका उसे रद्द कर सकती है।

इससे थोड़ी राहत की सांस ली जा सकती है। लेकिन याद रखिए कि क्या पता कल को कोई सरकार इस सिद्धांत को ही असंवैधानिक सिद्ध कर दे, या सत्ता के मद में इतनी चूर हो कि इसे नज़रअंदाज़ ही कर दे। चौकन्ना रहना हमेशा ज़रूरी है।

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बुनियादी बातें #4: क़ानून नए-पुराने

जब 1947 में हमने अंग्रेज़ो से पावर ली इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 के अंतर्गत, तब हमने अंग्रेज़ों के शासनतंत्र को ध्वस्त नहीं कर दिया। वैसा कुछ करना बेवकूफ़ी ही होती। क्योंकि इतना बड़ा देश चलता कैसे? संविधान तो हमने नया बनाया, लेकिन ये प्रशासनिक व्यवस्थाएं और कई तरह के क़ानून वही चलते रहे जो अंग्रेज़ों के ज़माने में थे। सबसे प्रचलित उदाहरण है इंडियन पीनल कोड, जिसके तहत सभी आपराधिक मामले तय किए जाते हैं। यह कानून 1862 से चला आ रहा है।

इसका मतलब यह नहीं कि कुछ भी नहीं बदला। ज़्यादातर चीज़ों में कुछ बुराई नहीं थी। कई अपराध हर तरह के शासन में अपराध ही माने जाएंगे, चाहे वह विदेशी शासन हो या फिर हमारा अपना गणतंत्र। प्रशासनिक व्यवस्था भी कई सालों से चल रही थी और चलती ही रहती। लेकिन कई क़ानून और व्यवस्थाएं ऐसी थीं जो कि हिन्दुस्तानियों को दबा कर रखने के लिए बनाई गई थीं। कुछ और ऐसी जो समय के साथ या तो गलत या अप्रासंगिक हो गई थीं। लेकिन अब हमारे पास उन्हें लोकतांत्रिक और सांवैधानिक तरीकों से बदलने का तरीका था। तो विधायिका के जरिए कई पुराने नियम हटाए गए, कई बदले गए और कई नए बनाए गए।

यह तो अच्छा था कि पहले के ही प्रशासन तंत्र और कानूनों को बनाए रख के हम देश की शासन-व्यवस्था को सुचारु रख पाए। लेकिन उसका एक असर यह भी हुआ कि जब तक एक गलत क़ानून बदला ना जाए तब तक उसका इस्तेमाल होता रह सकता है। अगर आपको पहले की बात याद हो तो हमने यह देखा था कि किस तरह सरकार या शासनतंत्र की पावर आम नागरिकों से हमेशा ज़्यादा होती है। इसलिए इसका नतीज़ा अक्सर यह होता है कि जो क़ानून अंग्रेज़ों ने हम हिन्दुस्तानियों को अपने नीचे दबाए रखने के लिए बनाए थे और जो एक लोकतांत्रिक, सांवैधानिक व्यवस्था में बिलकुसल असंगत हैं, उनका इस्तेमाल हमारा अपना ही शासनतंत्र अपनी शक्ति बनाए रखने के लिए आज भी नागरिकों के ख़िलाफ़ करता है।

ऐसा एक क़ानून सेडिशन (राजद्रोह) का है जो कि ब्रिटिश ज़माने के इंडियन पीनल कोड का हिस्सा है। यह क़ानून उस ज़माने का है जब अंग्रेज़ी सरकार भारतीयों को उनके लोकतांत्रिक हक़ नहीं देना चाहती थी। वह नहीं चाहती थी कि लोग सरकार के ख़िलाफ़ कुछ भी बोल पाएं या कर पाएं। लेकिन आज हमारा देश गणतांत्रिक और लोकतांत्रिक है। हमारे देश की पहचान और उसकी संप्रभुता हमारे नागरिकों में हैं, सरकार में नहीं। और सरकार हमारी मालिक नहीं हैं। सरकार का यह हक़ नहीं कि हम उसके ख़िलाफ़ कुछ ना बोलें। बल्कि हमारा यह हक़ है कि हम सरकार की आलोचना करें, उससे सवाल पूछें, ज़रूरत हो तो कार्यापालिका पर हर संभव दवाब डालें, उसे अदालत ले जाएं, और जो सरकार सही काम नहीं कर रही हो उसे सांवैधानिक तरीके से हटा दें। अगर हम सरकार के सर पर खड़े रहते हैं तो राजद्रोह नहीं कर रहे। बल्कि एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक होना का कर्तव्य निभा रहे हैं। देश और सरकार एक चीज़ नहीं हैं। देश और नागरिक एक चीज़ हैं। एक गणतांत्रिक-लोकतात्रिक देश में राजद्रोह के क़ानून के लिए कोई जगह नहीं हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश अभी तक इस क़ानून को हटाया नहीं गया है। शायद इसलिए कि कोई भी सरकार हो अपनी पावर नहीं खोना चाहती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भविष्य में यह बदल नहीं सकता। नागरिकों के जागरूक होने की ज़रूरत है और अपने प्रतिनिधियों से यह मांग करने की ज़रूरत है।

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बुनियादी बातें #3: शक्ति विभाजन और संतुलन

अब चलिए हमारा शासनतंत्र सांवैधानिक है। मतलब हमारे चुने हुए नेता, मंत्री, हमारी शासन व्यवस्था चला रहे ब्यूरोक्रैट, ये लोग हम पर राज नहीं कर सकते, अपनी मनमर्ज़ी नहीं चला सकते। उन्हें सांवैधानिक तरीके से काम करना होता है।

लेकिन जब एक बड़े, जटिल देश का काम चलाना है तो आप हर संभावना पहले से सोच कर संविधान में नहीं डाल सकते। सांवैधानिक सिद्धांतों के तहत काम करते हुए भी जो लोग शासनतंत्र चला रहे हैं उन्हें काफ़ी कुछ ख़ुद सोच कर करना पड़ता है। अगर उन्हें यह छूट नहीं दी जाएगी तो कभी कुछ काम हो ही नहीं पाएगा। तो यह छूट देनी ज़रूरी है। लेकिन यह छूट शासनतंत्र और उसमें शामिल लोगों को सांवैधानिक व्यवस्था में भी एक पावर देती है। और फ़िर से पावर के ग़लत इस्तेमाल की संभावना उठ खड़ी होता है। तो फिर इस बड़े से शासन तंत्र में लोग सब कुछ सही कर रहे हैं यह कैसे सुनिश्चित किया जाए? अगर शासनतंत्र के किसी हिस्से या किसी इंसान के ख़िलाफ़ कोई शिकायत है तो क्या गारण्टी है कि बाकी का शासनतंत्र उसके साथ खड़ा हो कर उसकी तरफ़दारी नहीं करेगा? आख़िर पावर बरकरार रखना किसे पसंद नहीं होता? इसलिए यह पूरी तरह संभव है कि लोकतांत्रिक होने के बावज़ूद भी शासनतंत्र अपने पावर का इस्तेमाल करके अपने सदस्यों के फ़ायदे के लिए काम करने लगे और देश के बाकी नागरिकों के ख़िलाफ़। इतना ही नहीं, यह भी संभव है कि वह न सिर्फ़ संविधान में दी गई छूट का ग़लत इस्तेमाल करे, बल्कि वह असंवैधानिक भी होता जाए ओर कोई उसका कुछ ना कर पाए क्योंकि संविधान की रक्षा भी तो उसी शासनतंत्र का काम है।

इस समस्या को ध्यान में रखते हुए ही संविधान ने शासनतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण व्यवस्था की है। वह है शासनतंत्र की विभिन्न शाखाएं बनाना और उन शाखाओं के बीच शक्ति का विभाजन करना। सबसे ऊँचे स्तर पर यह विभाजन विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का है। सांवैधानिक सिद्धांत ऐसे बनाने की कोशिश की गई हैं कि इनमें से एक शाखा दूसरे के ऊपर अनुचित प्रभाव नहीं डाल सकती है। और वे एक-दूसरे के काम पर नियंत्रण रखती हैं। अगर विधायिका कोई ऐसा कानून पास कर दे जो कि असांवैधानिक है तो न्यायपालिका उसे रद्द कर सकती है। लेकिन क़ानून बनाने का हक़ न्यायपालिका को नहीं है। इसी तरह कानून के तहत कार्यपालिका कई तरह के काम कर सकती है लेकिन कानून बनाने या बदलने के लिए उसे विधायिका के पास जाना पड़ेगा। विधायिका न्यायपालिका की जगह लेकर निर्णय नहीं सुनाने लग सकती। इस तरह से एक शक्ति संतुलन बरकरार रखने की कोशिश की गई है ताकि शासनतंत्र अनियमित तरीके से काम कर के देश के नागरिकों का ही शोषण ना करने लगे। इस मुख्य विभाजन के अलावा भी कई अलग-अलग संस्थाएं हैं जिनके काम में पावर में बैठे दूसरे लोग दख़लअंदाज़ी नहीं कर सकते। कोई संस्था राज्य सरकार के अंदर है तो कोई केंद्र के। भारतीय रिज़र्व बैंक के काम का अपना दायरा है और वित्त मंत्रालय का अपना। सीबीआई को एक तरह के मामले सौंपे जाते हैं और राज्य की पुलिस फ़ोर्स को दूसरे तरीके के। देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को भी यह हक़ नहीं है कि रिज़र्व बैंक, या पुलिस. या सीबीआई के काम में हस्तक्षेप करें या उन्हें अपना काम करने से रोकें।

यहाँ पर रुक कर दो बातों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगी।

पहली यह कि सैंद्धांतिक तौर पर लोकतंत्र लोगों की सरकार है। लेकिन व्यावहारिक तौर पर देश में दो समूह बन ही जाते हैं। शासक और शासित का। सरकार के पास ज़्यादा पावर होती है। विधायिका की कानून बनाने की पावर, कार्यपालिका की उन्हें लागू करने की पावर, न्यायपालिका की कानूनी विषयों पर निर्णय देने की पावर, पुलिस की आपको ग़िरफ़्तार करने की पावर, रिज़र्व बैंक की पैसों से संबंधित निर्णय लेने की पावर – इसी तरह पूरे शासनतंत्र के हर हिस्से को जोड़ कर देखें तो उनसे बनी सरकार के पास नागरिकों से ऊपर बहुत पावर होती है। इस पावर को नियमित करने के लिए व्यवस्थाएं है लेकिन किसी भी व्यवस्था से यह ख़त्म नहीं होती। इसका मतलब यह होता है कि अगर सरकार चाहे तो बिना किसी वजह के आपका जीना हराम कर सकती है। यह संभव है कि आखिरकार निर्दोष लोगों को इंसाफ़ मिल जाए। लेकिन एक रात गलत तरीके से पुलिस की हिरासत में रहना भी आपकी ज़िंदगी पर बहुत बुरा प्रभाव डाल सकता है। तो कहीं अगर महीनों और सालों तक आप सरकार के पावर का शिकार होते रहे तो आखिरकार अगर न्याय मिल भी गया, तब भी बहुत देर हो चुकी होगी। आपकी शिक्षा, आपकी नौकरी, आपका परिवार, आपकी भविष्य की आशाएं, सब कुछ तितर-बितर हो सकती हैं।

इसलिए यह ध्यान रखें कि सरकार और नागरिकों के रिश्ते में हक़ की बात हमेंशा नागरिकों के लिए होनी चाहिए। सरकार के पास वैसे ही बहुत पावर है, जिसे नियमित करते रहने की ज़रूरत है। सरकार को और कोई हक़ देने की ज़रूरत नहीं है। किसी को ग़िरफ़्तार करना पुलिस का हक़ नहीं है। यह पुलिस की पावर है जो तभी इस्तेमाल की जानी चाहिए जब उसकी ज़रूरत है। सिर्फ़ इसलिए कि पुलित उस पावर का इस्तेमाल कर सकती है, वह इस्तेमाल सही नहीं हो जाता। इसपर इतना ज़ोर इसलिए दे रही हूँ कि कई बार हम हाथ झटक कर बोल देते हैं कि ‘पुलिस को अपना काम करने दो’ या ‘सरकार को अपना काम करने दो’। पुलिस और सरकार का अपना काम करना ज़रूरी तो है ही। लेकिन यह संभावना हमेशा रहती है कि काम के नाम पर पावर का दुरुपयोग हो रहा है। तो अग़र कोई उसपर सवाल उठाता है, तो वह सवाल नाजायज़ नहीं है, बल्कि ज़रूरी है। उसे दबाने की कोशिश ना करें।

दूसरी बात यह है कि जब सरकार के पास पावर है इतनी तो उसे नियमित करने के लिए जो भी व्यवस्थाएं हैं, उनका सही से काम करना बहुत ज़रूरी है। जैसे कि सरकार की अलग-अलग शाखाओं के बीच शक्ति विभाजन। कुछ अच्छा करने के नाम पर भी हमें यह शक्ति विभाजन किसी को ख़त्म नहीं करने देना चाहिए। क्योंकि अगर आज एक काम सही हो भी गया, तब भी शक्ति विभाजन के ख़त्म होने से किसी एक व्यक्ति या शासनतंत्र के किसी एक हिस्से की पावर में जो बढ़ोतरी होगी, उसका गलत इस्तेमाल होना ही होना है।

मान लीजिए कि आज उच्चतम न्यायालय के जज यह निर्णय लेना चाहें कि देश का प्रधानमंत्री कौन होगा। आपको लगता है कि चुनावों की राजनीति के जरिए जो लोग प्रधानमंत्री बन रहे हैं वे ज़्यादा अच्छे नहीं हैं। और ये उच्चतम न्यायालय के जज जिसे प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं वह बेहतर है इस पद के लिए। तो इसलिए अगर हमने उच्चतम न्यायालय को देश का प्रधानमंत्री नियुक्त करने की पावर दे दी, तो हो सकता है कि आज वह वाकई एक अच्छा प्रधानमंत्री नियुक्त कर दें। लेकिन कल को वहाँ भाई-भतीजेवाद चालू हो जाएगा। जो ज़्यादा शक्तिशाली जज हैं वे अपने घरवालों को या अपने काम आनेवाले साथियों को प्रधानमंत्री बनाना शुरू कर देंगे। या फ़िर वे ऐसे लोगों को प्रधानमंत्री बनाएंगे जो उनके मुताबिक काम करे, देश की जनता के मुताबिक़ नहीं। हमारी कार्यपालिका न्यायपालिका के अधीन हो जाएगी और न्यायपालिका की पावर बढ़कर नागरिकों का शोषण करने लगेगी।

इसी तरह अगर कार्यपालिका को कानून बनाने की छूट मिल गई तो वह अपनी सुविधा के हिसाब से कानून बनाती जाएगी और वे कानून सही हैं या गलत ये सवाल कोई नहीं पूछ पाएगा। हो सकता है कि वह पुलिस की पावर इतनी बढ़ा दे कि देश के आधे लोग ग़िरफ़्तार हो जाएं। इतने लोग जेल के अंदर होंगे तो कई अपराधी भी अंदर पहुंच ही जाएंगे। तो शायद अपराध कम हो जाए और कार्यपालिका यह दावा करे कि उसका ख़ुद कानून बनाना अच्छा था। इससे अपराध कम हो गया। लेकिन उसके चक्कर में अपराधियों से कहीं ज़्यादा जो निर्दोष लोग अंदर चले गए, उनके बारे में सवाल उठाने का काम तो विधायिका का था। उसे वह मौका ही नहीं मिला। कल को कार्यपालिका अपना काम आसान करने के लिए और भी कई कानून बनाने लगेगी, जिससे नागरिकों का जीना हराम हो जाए।

तो इसलिए शासनतंत्र का कोई व्यक्ति या हिस्सा यदि अपने दायरे से बाहर जा रहा है तो उसे रोकना ज़रूरी है। उस क़दम के फ़ायदे गिनाकर उन्हें मनमर्ज़ी करने देना सही नहीं है।