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बुनियादी बातें #6: किसका लोकतंत्र?

हमने पहले बात की थी कि किस तरह हमारे देश का लोकतांत्रिक या गणतांत्रिक होना ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि हमारी व्यवस्था का सांवैधानिक होना भी बहुत महत्वपूर्ण है। सांवैधानिकता है जो हमारी सरकार को उसकी पावर का गलत इस्तेमाल करने से रोकती है। लेकिन सांवैधानिकता सिर्फ़ शासनतंत्र को नियमित करने के लिए ज़रूरी नहीं है। यह लोकतंत्र को एक न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाए रखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

अब तक हमने सरकार और नागरिकों की बात ऐसे की है मानो नागरिक सब एक जैसे ही हैं और उनका भला-बुरा सब एक जैसा ही है जिसको ध्यान में रख कर सरकार को काम करना होता है। लेकिन सारे नागरिक एक जैसे नहीं हैं। वे कई तरह के अलग-अलग समूहों में बँटे हुए हैं। और कौन किस समूह का हिस्सा है इसपर उसकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति निर्भर करती है, उसकी सोच-समझ निर्भर करती है, उसकी भले-बुरे की पहचान निर्भर करती है। समूह शब्द का इस्तेमाल मैंने कई तरह की विविधताओं को जताने के लिए किया है। ये कोई सोच-समझ कर बनाए गए समूह नहीं हैं। लिंग, धर्म, जाति, आर्थिक स्थिति, भाषा, क्षेत्र किसी भी तरह की विविधता अलग-अलग समूहों का निर्माण करती है।

अब इंसान की यह प्रवृत्ति होती है कि अपने जैसे लोगों की ज़्यादा परवाह करता है। तो इसलिए एक समूह के लोग एक-दूसरे के साथ ज़्यादा खड़े होते हैं, बजाय कि किसी दूसरे समूह के लोगों के साथ। बच्चों की भी लड़ाई होती है मां-बाप अपने बच्चों की ज़्यादा तरफ़दारी करते हैं। अपने धर्म, अपनी जाति वाले लोगों के साथ लोग ज़्यादा जाना-पहचाना महसूस करते हैं। दूर देश में कोई अपनी भाषा बोलने वाला मिल जाता है तो उसपर अपने पड़ोसी से भी ज़्यादा भरोसा कर बैठते हैं, भले ही असल में अपनी भाषा बोलने वाला इंसान कोई बड़ा ठग हो और दूसरी भाषा बोलने वाला पड़ोसी बहुत नेक़दिल हो। फ़िर कई बार एक समूह के लोगों की भलाई भी एक सी चीज़ों में होती है। अगर एक बांध बनने से एक क्षेत्र के गांव पानी में डूबने वाले होते हैं, तो दूसरे क्षेत्र के गांवों में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होने वाला होता है। ज़ाहिर है कि दोनों जगह रहने वालों लोगों के बांध के बारे में विचार अपने आस-पास रहने वाले लोगों से मिलेंगे। जिनके गांव डूबने वाले हैं, उन्हें बांध का विचार गलत लगेगा। जिन्हें पानी मिलने वाला है, उन्हें सही लगेगा।

यह समूहों की “अपने” लोगों का साथ देने की प्रवृत्ति के साथ यह भी ध्यान में रखें कि हमारे लोकतंत्र में कई फ़ैसले बहुमत से तय होते हैं। तो अगर किसी एक समूह में लोगों की संख्या ज़्यादा है तो क्या वह लोकतंत्र का फ़ायदा उठा कर सारे फ़ैसले अपनी मर्ज़ी के या अपने हक़ में करवा सकते हैं? क्या जिस धर्म के लोग ज़्यादा हैं देश में वे अपने धर्म के ज़्यादा प्रतिनिधि विधायिका में भेज कर उनसे यह क़ानून बनवा सकते हैं कि बाकी लोगों को अपना धर्म मानने की, अपने तरीके से पूजा-पाठ करने की स्वतंत्रता ना रहे। क्या पुरुष जिनका राजनीति में ज़्यादा प्रतिनिधित्व है महिलाओं से मतदान का अधिकार छीन सकते हैं?

वे यह सब नहीं कर सकते और यहीं पर संविधान फ़िर से अपनी भूमिका निभाता है। हमारा संविधान लोगों को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है। इसलिए अगर देश के अस्सी प्रतिशत लोग भी चाहें तो किसी धार्मिक समूह की यह स्वतंत्रता छीन नहीं सकते। इक्यावन प्रतिशत पुरुष भी उनचास प्रतिशत महिलाओं से मतदान का अधिकार नहीं छीन सकते।

इस पूरी कहानी का मतलब यब है कि यह हमारे देश की सांवैधानिकता है जो लोकतंत्र को बहुसंख्यक नागरिकों के समूह की दादागिरी बनने से बचाती है और हर नागरिक को न्याय दिलाती है, अभिव्यक्ति और धर्म की स्वतंत्रता देती है, हर व्यक्ति की गरिमा सुनिश्चित करती है। इसका यह भी मतलब है कि अगर किसी प्रस्ताव या फैसले की तरफ़दारी इसलिए की जा रही है क्योंकि देश में ज़्यादा लोग ऐसा चाहते हैं, तो सिर्फ़ उस वजह से वह फैसला सही नहीं हो जाएगा। अगर उससे किसी भी व्यक्ति के अधिकारों के हनन की नौबत आती है या संविधान के किसी भी हिस्से की वह अवज्ञा करता है, तो वह फ़ैसला नहीं लिया जा सकता।

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बुनियादी बातें #5: संविधान, लोकतंत्र और बदलाव

हमने ये देखा कि किस तरह हमारा संविधान हमें देश के क़ानून बदलने की एक व्यवस्था देता है, जिससे कि अगर कोई गलत क़ानून रह गया हो तो उसे हटाना, या ज़रूरत के हिसाब से नए क़ानून बनाना संभव है। और यह सब सांवैधानिक दायरे में रह कर होता है।

लेकिन ख़ुद संविधान का क्या? हमारा संविधान बहुत बड़ा है और बहुत सारे अलग-अलग मुद्दों को नियमित करता है। संविधान निर्माताओं को भी यह पता था कि समय के साथ कुछ मुद्दों पर संविधान की धाराएं देश और नागरिकों के भले के लिए उचित नहीं रह जाएंगी। इसलिए संविधान में ख़ुद संविधान को बदलने का भी रास्ता है। लेकिन ये संविधान के अंदर रहकर क़ानून बनाने या बदलने से ज़्यादा मुश्किल है। यह सावधानी बरतना सही भी है। क्योंकि हमारे सांवैधानिक शासन-तंत्र में हर किसी को न्याय दिलाने के लिए संविधान ही हमारा आखिरी सहारा है। तो हर ऐरे-गैरे कारण पर हम संविधान नहीं बदलते रह सकते। लेकिन जब वाकई जनता की ज़रूरत हो तो बदलने का तरीका ज़रूर है।

तो ये बताइए कि क्या हम संविधान को बदल कर उसमें यह व्यवस्था कर सकते हैं कि फलां आदमी आज से हमारा राजा होगा। प्रधानमंत्री चुने नहीं जाएंगे, बल्कि इस राजा द्वारा अपनी मर्ज़ी से नियुक्त किये जाएंगे, राष्ट्रपति का पद हटा दिया जाएगा और यह राजा का पद वंशानुगत होगा?

क्या यह यह संभावना आपको मज़ाक लग रही है? ऐसा है तो कुछ दूसरे देशों की कहानियाँ सुनते है।

पहली कहानी है फ़्रांस की। अगर स्कूल में पढ़ाया गया विश्व इतिहास आपको थोड़ा भी याद हो फ्रांसीसी क्रांति याद होगी, जो कि 1789 में हुई थी, फ़्रांस के राजा के ख़िलाफ़। आपको नेपोलियन का नाम भी याद होगा, जो बाद में फ़्रांस के सम्राट बन गए थे और जिनके युद्धों ने कई योरोपी देशों की हालत ख़राब कर दी थी। नेपोलियन फ़्रांस के सम्राट् 1804 में बने थे। अब सोचिए कि जिस देश ने राजा को हटाने के लिए इतनी बड़ी क्रांति कर दी और जिसके लिए कई सारे लोगों की जानें गईं, पंद्रह सालों के अंदर वहाँ एक सम्राट् कैसे पैदा हो गया?

लोकतांत्रिक तरीकों से।

फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात् काफ़ी उथल-पुथल के बाद वहाँ गणतंत्र की स्थापना हुई थी। उस गणतंत्र के लिए कभी युद्ध करते हुए और कभी शांति स्थापित करते हुए नेपोलियन ने अपनी पहचान बनाई। लेकिन सम्राट् वह युद्ध करके नहीं बने। उसके लिए धीरे-धीरे अपनी पावर बढ़ाई, पहले खुद को गणतंत्र का पहला कंसुल नियुक्त करवाया और अंत में एक रेफ़रेंडम करवा कर ख़ुद को सम्राट् नियुक्त किया। रेफ़रेंडम से ज़्यादा लोकतांत्रिक और क्या हो सकता है?

दूसरी कहानी जर्मनी की है और वहाँ के भी एक बहुत प्रचलित व्यक्ति की है। हिटलर का नाम आज दुनिया में कौन नहीं जानता, भले ही बदनामी में जाने। हिटलर ने इटली के मुसोलिनी से प्रभावित होकर एक बार ज़बरदस्ती सत्ता हासिल करने की कोशिश की थी लेकिन बुरी तरह असफ़ल हो गये थे। इसके लिए उन्हें कुछ समय जेल में भी बिताना पड़ा था। उसके बाद उन्होंने निर्णय लिया कि लोकतांत्रिक तरीकों से ही सत्ता हासिल करेंगे। और ऐसा ही किया। लेकिन जब सत्ता हासिल हुई तो फिर संविधान का ही इस्तेमाल कर कर के ऐसे क़ानून पास किए और ऐसे बदलाव लाए कि जर्मनी के तानाशाह हो गए।

यहाँ पर ध्यान देने वाली दो बातें हैं। एक यह कि कई बार लोग ख़ुद ही या तो तानाशाही को चुनते हैं या चुप रह कर उसको आगे बढ़ने देते हैं। शायद उनकी चुप रहने की कोई व्यक्तिगत मजबूरी या भय होता है या तत्काल की परिस्थितियों से परेशान होकर उन्हें तानाशाही लोकतंत्र से बेहतर विकल्प लगने लगती है। लेकिन आख़िरकार लोकतंत्र को खो देने की मार पड़ती ही है। फ्रांस से नेपोलियन का साम्राज्य गया, और उसके बाद की उथल-पुथल में कभी राजतंत्र वापस आया, कभी गणतंत्र। सोचिये कि उस देश के लोगों की क्या हालत होगी जिसका शासन का तंत्र रोज़ बदलता रहे और कल तक जो चीज़ आपका हक़ थी, वह अचानक आज अपराध हो जाए? जर्मनी में नाज़ी शासन ने ऐसा कहर ढाया कि एक तरफ़ तो अपने ही नागरिकों की हत्या की और दूसरी तरफ़ हर देश से दुश्मनी। नतीजा हुआ द्वितिय विश्व युद्ध, उसमें मिली हार, और देश की बरबादी और विभाजन।

दूसरी बात यह है कि लोकतंत्र को खतरा हमेंशा बाहरी ताक़तों या मिलिट्री से नहीं होता है। जिन लोगों और सरकारों को हमने लोकतांत्रिक तरीकों से चुना है वे लोकतांत्रिक नियमों का गलत इस्तेमाल कर के ही लोकतंत्र का मज़ाक बना कर छोड़ सकते है या उसे पूरी तरह मिटा भी सकते हैं।
इसलिए लोकतंत्र को लेकर हम कभी असावधान नहीं रह सकते। सरकार के कामों पर नज़र रखना और हर परिस्थिति में लोकतंत्र की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। तभी हम अपने लिए और आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक न्यायपूर्ण समाज बना पाएंगे।

हमारे देश में लेकिन एक अच्छी व्यस्था है संविधान को बदलने के मामले में, जो कि दरअसल संविधान से नहीं आई है, बल्कि न्यायपालिका से आई है। इसे “बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन” कहते हैं। इस सिद्धांत के तहत विधायिका संविधान में कोई ऐसा परिवर्तन नहीं कर सकती जिससे संविधान का मूल स्वरूप (बेसिक स्ट्रक्चर) बदल जाए। अपने आप में यह एक बड़ा विषय है जिसमें कई मुद्दे विवादास्पद हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह है कि हम अपना संविधान बदल कर ख़ुद को गणतंत्र से राजतंत्र नहीं बना सकते, अपना कोई सम्राट् नहीं चुन सकते। अगर विधायिका ने ऐसा कुछ किया तो न्यायपालिका उसे रद्द कर सकती है।

इससे थोड़ी राहत की सांस ली जा सकती है। लेकिन याद रखिए कि क्या पता कल को कोई सरकार इस सिद्धांत को ही असंवैधानिक सिद्ध कर दे, या सत्ता के मद में इतनी चूर हो कि इसे नज़रअंदाज़ ही कर दे। चौकन्ना रहना हमेशा ज़रूरी है।

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बुनियादी बातें #4: क़ानून नए-पुराने

जब 1947 में हमने अंग्रेज़ो से पावर ली इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 के अंतर्गत, तब हमने अंग्रेज़ों के शासनतंत्र को ध्वस्त नहीं कर दिया। वैसा कुछ करना बेवकूफ़ी ही होती। क्योंकि इतना बड़ा देश चलता कैसे? संविधान तो हमने नया बनाया, लेकिन ये प्रशासनिक व्यवस्थाएं और कई तरह के क़ानून वही चलते रहे जो अंग्रेज़ों के ज़माने में थे। सबसे प्रचलित उदाहरण है इंडियन पीनल कोड, जिसके तहत सभी आपराधिक मामले तय किए जाते हैं। यह कानून 1862 से चला आ रहा है।

इसका मतलब यह नहीं कि कुछ भी नहीं बदला। ज़्यादातर चीज़ों में कुछ बुराई नहीं थी। कई अपराध हर तरह के शासन में अपराध ही माने जाएंगे, चाहे वह विदेशी शासन हो या फिर हमारा अपना गणतंत्र। प्रशासनिक व्यवस्था भी कई सालों से चल रही थी और चलती ही रहती। लेकिन कई क़ानून और व्यवस्थाएं ऐसी थीं जो कि हिन्दुस्तानियों को दबा कर रखने के लिए बनाई गई थीं। कुछ और ऐसी जो समय के साथ या तो गलत या अप्रासंगिक हो गई थीं। लेकिन अब हमारे पास उन्हें लोकतांत्रिक और सांवैधानिक तरीकों से बदलने का तरीका था। तो विधायिका के जरिए कई पुराने नियम हटाए गए, कई बदले गए और कई नए बनाए गए।

यह तो अच्छा था कि पहले के ही प्रशासन तंत्र और कानूनों को बनाए रख के हम देश की शासन-व्यवस्था को सुचारु रख पाए। लेकिन उसका एक असर यह भी हुआ कि जब तक एक गलत क़ानून बदला ना जाए तब तक उसका इस्तेमाल होता रह सकता है। अगर आपको पहले की बात याद हो तो हमने यह देखा था कि किस तरह सरकार या शासनतंत्र की पावर आम नागरिकों से हमेशा ज़्यादा होती है। इसलिए इसका नतीज़ा अक्सर यह होता है कि जो क़ानून अंग्रेज़ों ने हम हिन्दुस्तानियों को अपने नीचे दबाए रखने के लिए बनाए थे और जो एक लोकतांत्रिक, सांवैधानिक व्यवस्था में बिलकुसल असंगत हैं, उनका इस्तेमाल हमारा अपना ही शासनतंत्र अपनी शक्ति बनाए रखने के लिए आज भी नागरिकों के ख़िलाफ़ करता है।

ऐसा एक क़ानून सेडिशन (राजद्रोह) का है जो कि ब्रिटिश ज़माने के इंडियन पीनल कोड का हिस्सा है। यह क़ानून उस ज़माने का है जब अंग्रेज़ी सरकार भारतीयों को उनके लोकतांत्रिक हक़ नहीं देना चाहती थी। वह नहीं चाहती थी कि लोग सरकार के ख़िलाफ़ कुछ भी बोल पाएं या कर पाएं। लेकिन आज हमारा देश गणतांत्रिक और लोकतांत्रिक है। हमारे देश की पहचान और उसकी संप्रभुता हमारे नागरिकों में हैं, सरकार में नहीं। और सरकार हमारी मालिक नहीं हैं। सरकार का यह हक़ नहीं कि हम उसके ख़िलाफ़ कुछ ना बोलें। बल्कि हमारा यह हक़ है कि हम सरकार की आलोचना करें, उससे सवाल पूछें, ज़रूरत हो तो कार्यापालिका पर हर संभव दवाब डालें, उसे अदालत ले जाएं, और जो सरकार सही काम नहीं कर रही हो उसे सांवैधानिक तरीके से हटा दें। अगर हम सरकार के सर पर खड़े रहते हैं तो राजद्रोह नहीं कर रहे। बल्कि एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक होना का कर्तव्य निभा रहे हैं। देश और सरकार एक चीज़ नहीं हैं। देश और नागरिक एक चीज़ हैं। एक गणतांत्रिक-लोकतात्रिक देश में राजद्रोह के क़ानून के लिए कोई जगह नहीं हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश अभी तक इस क़ानून को हटाया नहीं गया है। शायद इसलिए कि कोई भी सरकार हो अपनी पावर नहीं खोना चाहती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भविष्य में यह बदल नहीं सकता। नागरिकों के जागरूक होने की ज़रूरत है और अपने प्रतिनिधियों से यह मांग करने की ज़रूरत है।

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बुनियादी बातें #3: शक्ति विभाजन और संतुलन

अब चलिए हमारा शासनतंत्र सांवैधानिक है। मतलब हमारे चुने हुए नेता, मंत्री, हमारी शासन व्यवस्था चला रहे ब्यूरोक्रैट, ये लोग हम पर राज नहीं कर सकते, अपनी मनमर्ज़ी नहीं चला सकते। उन्हें सांवैधानिक तरीके से काम करना होता है।

लेकिन जब एक बड़े, जटिल देश का काम चलाना है तो आप हर संभावना पहले से सोच कर संविधान में नहीं डाल सकते। सांवैधानिक सिद्धांतों के तहत काम करते हुए भी जो लोग शासनतंत्र चला रहे हैं उन्हें काफ़ी कुछ ख़ुद सोच कर करना पड़ता है। अगर उन्हें यह छूट नहीं दी जाएगी तो कभी कुछ काम हो ही नहीं पाएगा। तो यह छूट देनी ज़रूरी है। लेकिन यह छूट शासनतंत्र और उसमें शामिल लोगों को सांवैधानिक व्यवस्था में भी एक पावर देती है। और फ़िर से पावर के ग़लत इस्तेमाल की संभावना उठ खड़ी होता है। तो फिर इस बड़े से शासन तंत्र में लोग सब कुछ सही कर रहे हैं यह कैसे सुनिश्चित किया जाए? अगर शासनतंत्र के किसी हिस्से या किसी इंसान के ख़िलाफ़ कोई शिकायत है तो क्या गारण्टी है कि बाकी का शासनतंत्र उसके साथ खड़ा हो कर उसकी तरफ़दारी नहीं करेगा? आख़िर पावर बरकरार रखना किसे पसंद नहीं होता? इसलिए यह पूरी तरह संभव है कि लोकतांत्रिक होने के बावज़ूद भी शासनतंत्र अपने पावर का इस्तेमाल करके अपने सदस्यों के फ़ायदे के लिए काम करने लगे और देश के बाकी नागरिकों के ख़िलाफ़। इतना ही नहीं, यह भी संभव है कि वह न सिर्फ़ संविधान में दी गई छूट का ग़लत इस्तेमाल करे, बल्कि वह असंवैधानिक भी होता जाए ओर कोई उसका कुछ ना कर पाए क्योंकि संविधान की रक्षा भी तो उसी शासनतंत्र का काम है।

इस समस्या को ध्यान में रखते हुए ही संविधान ने शासनतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण व्यवस्था की है। वह है शासनतंत्र की विभिन्न शाखाएं बनाना और उन शाखाओं के बीच शक्ति का विभाजन करना। सबसे ऊँचे स्तर पर यह विभाजन विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का है। सांवैधानिक सिद्धांत ऐसे बनाने की कोशिश की गई हैं कि इनमें से एक शाखा दूसरे के ऊपर अनुचित प्रभाव नहीं डाल सकती है। और वे एक-दूसरे के काम पर नियंत्रण रखती हैं। अगर विधायिका कोई ऐसा कानून पास कर दे जो कि असांवैधानिक है तो न्यायपालिका उसे रद्द कर सकती है। लेकिन क़ानून बनाने का हक़ न्यायपालिका को नहीं है। इसी तरह कानून के तहत कार्यपालिका कई तरह के काम कर सकती है लेकिन कानून बनाने या बदलने के लिए उसे विधायिका के पास जाना पड़ेगा। विधायिका न्यायपालिका की जगह लेकर निर्णय नहीं सुनाने लग सकती। इस तरह से एक शक्ति संतुलन बरकरार रखने की कोशिश की गई है ताकि शासनतंत्र अनियमित तरीके से काम कर के देश के नागरिकों का ही शोषण ना करने लगे। इस मुख्य विभाजन के अलावा भी कई अलग-अलग संस्थाएं हैं जिनके काम में पावर में बैठे दूसरे लोग दख़लअंदाज़ी नहीं कर सकते। कोई संस्था राज्य सरकार के अंदर है तो कोई केंद्र के। भारतीय रिज़र्व बैंक के काम का अपना दायरा है और वित्त मंत्रालय का अपना। सीबीआई को एक तरह के मामले सौंपे जाते हैं और राज्य की पुलिस फ़ोर्स को दूसरे तरीके के। देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को भी यह हक़ नहीं है कि रिज़र्व बैंक, या पुलिस. या सीबीआई के काम में हस्तक्षेप करें या उन्हें अपना काम करने से रोकें।

यहाँ पर रुक कर दो बातों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगी।

पहली यह कि सैंद्धांतिक तौर पर लोकतंत्र लोगों की सरकार है। लेकिन व्यावहारिक तौर पर देश में दो समूह बन ही जाते हैं। शासक और शासित का। सरकार के पास ज़्यादा पावर होती है। विधायिका की कानून बनाने की पावर, कार्यपालिका की उन्हें लागू करने की पावर, न्यायपालिका की कानूनी विषयों पर निर्णय देने की पावर, पुलिस की आपको ग़िरफ़्तार करने की पावर, रिज़र्व बैंक की पैसों से संबंधित निर्णय लेने की पावर – इसी तरह पूरे शासनतंत्र के हर हिस्से को जोड़ कर देखें तो उनसे बनी सरकार के पास नागरिकों से ऊपर बहुत पावर होती है। इस पावर को नियमित करने के लिए व्यवस्थाएं है लेकिन किसी भी व्यवस्था से यह ख़त्म नहीं होती। इसका मतलब यह होता है कि अगर सरकार चाहे तो बिना किसी वजह के आपका जीना हराम कर सकती है। यह संभव है कि आखिरकार निर्दोष लोगों को इंसाफ़ मिल जाए। लेकिन एक रात गलत तरीके से पुलिस की हिरासत में रहना भी आपकी ज़िंदगी पर बहुत बुरा प्रभाव डाल सकता है। तो कहीं अगर महीनों और सालों तक आप सरकार के पावर का शिकार होते रहे तो आखिरकार अगर न्याय मिल भी गया, तब भी बहुत देर हो चुकी होगी। आपकी शिक्षा, आपकी नौकरी, आपका परिवार, आपकी भविष्य की आशाएं, सब कुछ तितर-बितर हो सकती हैं।

इसलिए यह ध्यान रखें कि सरकार और नागरिकों के रिश्ते में हक़ की बात हमेंशा नागरिकों के लिए होनी चाहिए। सरकार के पास वैसे ही बहुत पावर है, जिसे नियमित करते रहने की ज़रूरत है। सरकार को और कोई हक़ देने की ज़रूरत नहीं है। किसी को ग़िरफ़्तार करना पुलिस का हक़ नहीं है। यह पुलिस की पावर है जो तभी इस्तेमाल की जानी चाहिए जब उसकी ज़रूरत है। सिर्फ़ इसलिए कि पुलित उस पावर का इस्तेमाल कर सकती है, वह इस्तेमाल सही नहीं हो जाता। इसपर इतना ज़ोर इसलिए दे रही हूँ कि कई बार हम हाथ झटक कर बोल देते हैं कि ‘पुलिस को अपना काम करने दो’ या ‘सरकार को अपना काम करने दो’। पुलिस और सरकार का अपना काम करना ज़रूरी तो है ही। लेकिन यह संभावना हमेशा रहती है कि काम के नाम पर पावर का दुरुपयोग हो रहा है। तो अग़र कोई उसपर सवाल उठाता है, तो वह सवाल नाजायज़ नहीं है, बल्कि ज़रूरी है। उसे दबाने की कोशिश ना करें।

दूसरी बात यह है कि जब सरकार के पास पावर है इतनी तो उसे नियमित करने के लिए जो भी व्यवस्थाएं हैं, उनका सही से काम करना बहुत ज़रूरी है। जैसे कि सरकार की अलग-अलग शाखाओं के बीच शक्ति विभाजन। कुछ अच्छा करने के नाम पर भी हमें यह शक्ति विभाजन किसी को ख़त्म नहीं करने देना चाहिए। क्योंकि अगर आज एक काम सही हो भी गया, तब भी शक्ति विभाजन के ख़त्म होने से किसी एक व्यक्ति या शासनतंत्र के किसी एक हिस्से की पावर में जो बढ़ोतरी होगी, उसका गलत इस्तेमाल होना ही होना है।

मान लीजिए कि आज उच्चतम न्यायालय के जज यह निर्णय लेना चाहें कि देश का प्रधानमंत्री कौन होगा। आपको लगता है कि चुनावों की राजनीति के जरिए जो लोग प्रधानमंत्री बन रहे हैं वे ज़्यादा अच्छे नहीं हैं। और ये उच्चतम न्यायालय के जज जिसे प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं वह बेहतर है इस पद के लिए। तो इसलिए अगर हमने उच्चतम न्यायालय को देश का प्रधानमंत्री नियुक्त करने की पावर दे दी, तो हो सकता है कि आज वह वाकई एक अच्छा प्रधानमंत्री नियुक्त कर दें। लेकिन कल को वहाँ भाई-भतीजेवाद चालू हो जाएगा। जो ज़्यादा शक्तिशाली जज हैं वे अपने घरवालों को या अपने काम आनेवाले साथियों को प्रधानमंत्री बनाना शुरू कर देंगे। या फ़िर वे ऐसे लोगों को प्रधानमंत्री बनाएंगे जो उनके मुताबिक काम करे, देश की जनता के मुताबिक़ नहीं। हमारी कार्यपालिका न्यायपालिका के अधीन हो जाएगी और न्यायपालिका की पावर बढ़कर नागरिकों का शोषण करने लगेगी।

इसी तरह अगर कार्यपालिका को कानून बनाने की छूट मिल गई तो वह अपनी सुविधा के हिसाब से कानून बनाती जाएगी और वे कानून सही हैं या गलत ये सवाल कोई नहीं पूछ पाएगा। हो सकता है कि वह पुलिस की पावर इतनी बढ़ा दे कि देश के आधे लोग ग़िरफ़्तार हो जाएं। इतने लोग जेल के अंदर होंगे तो कई अपराधी भी अंदर पहुंच ही जाएंगे। तो शायद अपराध कम हो जाए और कार्यपालिका यह दावा करे कि उसका ख़ुद कानून बनाना अच्छा था। इससे अपराध कम हो गया। लेकिन उसके चक्कर में अपराधियों से कहीं ज़्यादा जो निर्दोष लोग अंदर चले गए, उनके बारे में सवाल उठाने का काम तो विधायिका का था। उसे वह मौका ही नहीं मिला। कल को कार्यपालिका अपना काम आसान करने के लिए और भी कई कानून बनाने लगेगी, जिससे नागरिकों का जीना हराम हो जाए।

तो इसलिए शासनतंत्र का कोई व्यक्ति या हिस्सा यदि अपने दायरे से बाहर जा रहा है तो उसे रोकना ज़रूरी है। उस क़दम के फ़ायदे गिनाकर उन्हें मनमर्ज़ी करने देना सही नहीं है।

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बुनियादी बातें #2: सांवैधानिक शासन

अपनी सरकार के बारे में और बात करते हैं। हमारा देश सिर्फ़ लोकतांत्रिक ही नहीं हैं बल्कि गणतांत्रिक (republic) भी है। गणतांत्रिक होने का मतलब है कि देश की संप्रभुता किसी एक व्यक्ति में निहित नहीं है, ना ही ये वंशानुगत है। सीधे शब्दों में हमारा मालिक कोई राजा नहीं है। हमारी संप्रभुता हमारे नागरिकों में निहित है। जिस व्यक्ति को हम अपने देश का प्रमुख (राष्ट्रपति) चुनते हैं वह हमारा मालिक नहीं बन जाता बल्कि हममे निहित देश की संप्रभुता का प्रतीकमात्र होता है। वह अपना पद अपने वंशजों को नहीं दे सकता है।

हमें आदत हो गई है इसकी, और इसलिए यह ज़्यादा बड़ी बात नहीं लगती। लेकिन सोच कर देखिए कि अंग्रेज़ों के पास भी गणतंत्र नहीं है। उनकी संप्रभुता उनके राजा या रानी में निहित है और वह पद वंशानुगत है। हमारी आज़ादी के बाद भी 26 जनवरी 1951 तक, जब तक हमने नए संविधान के तहत खुद को गणतंत्र नहीं घोषित किया था, हमारी रानी विक्टोरिया ही थीं, लंदन में बैठी हुई।

हालांकि बिना लोकतंत्र के किसी देश का सही मायनों में गणतंत्र होना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन बिना गणतंत्र के लोकतंत्र हो सकता है। इसको समझने के लिए परिभाषाओं की जगह उदाहरण ही लेकर चलते हैं। अंग्रेज़ों की सरकार टेक्निकली “कॉन्सटिट्यूशनल मॉनार्की” है – सांवैधानिक राजतंत्र। सांवैधानिक शब्द महत्वपूर्ण है। इसका मतलब है कि राजा या रानी देश के प्रमुख भले ही हों, लेकिन जो मर्ज़ी आए वह नहीं कर सकते। देश की सरकार संविधान के हिसाब से चलेगी। और उस संविधान के हिसाब से राजा या रानी के पास ज़्यादा पावर नहीं है। देश का अधिकतर काम लोकतांत्रिक तरीकों से चुनी गई सरकार चलाती है और वह सरकार भी संविधान का पालन करते हुए ही काम करती है। सांवैधानिक होने की वजह से अंग्रेज़ों की सरकार अगर गणतांत्रिक नहीं भी है तो ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता। क्योंकि राजपरिवार के लोग अपनी मनमर्ज़ी नहीं कर सकते और शासनतंत्र लोकतांत्रिक तरीकों से नागरिकों के लिए ही चलता है।

लेकिन सांवैधानिकता सिर्फ़ राजतंत्र को नियमित करने के लिए ही ज़रूरी नहीं है। हमारा गणतंत्र और लोकतंत्र भी सांवैधानिक हैं। हम अपने नेताओं को सांवैधानिक तरीके से चुनते हैं। और चुने जाने के बाद भी वे जो मन में आए वह नहीं कर सकते। उन्हें संविधान के तहत काम करना होता है।

अब ज़रा इस पर विचार करें कि सांवैधानिकता क्यों महत्वपूर्ण है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि शासनतंत्र को चलाने के लिए लोगों को कैसे भी चुना जाए, वे हमेशा सब-कुछ सही नहीं करेंगे। लोकतांत्रिक सरकार हो या किसी और तरीके की सरकार, जो लोग शासनतंत्र का हिस्सा होते हैं उन्हें पावर मिलती ही मिलती है। और जब इंसान को पावर मिलती है तो उसके दुरुपयोग की संभावना होती ही होती है। सांवैधानिकता उस संभावना को कम करने का तरीका है। अगर आपने बहुत आदर्श इंसान भी चुना हो किसी पद के लिए, फिर भी रक्षा में हत्या हो सकती है उससे। आखिर इंसान ही हैं। आम जीवन में भी कई बार ऐसा होता है कि आप कोई काम बहुत अच्छे इरादे से करते हैं लेकिन उसका परिणाम बहुत गलत हो जाता है। तो शासन चलाने वाला अच्छे से अच्छा इंसान भी अगर अपनी मनमर्ज़ी से काम कर रहा है तो भयानक गलतियां कर सकता है जिसका ख़ामियाज़ा ढेर सारे लोगों को भुगतना पड़ सकता है। और अगर उसके इरादे ही गलत हों तब तो मुसीबत होनी ही है। इसलिए सांवैधानिकता यह सुनिश्चित करती है कि सरकार का सारा काम सांवैधानिक सिंद्धांतों और नियमों को मुताबिक़ हो, किसी की मनमर्ज़ी से नहीं।

संविधान और शासनतंत्र के और भी कई पहलुओं पर बात की जा सकती है, लेकिन अभी के लिए हम यहाँ पर रुकते हैं और देखते हैं कि ये नागरिक-शास्त्र (civics) की कक्षा मैंने यहाँ क्यों लगाई हुई थी। एक महत्वपूर्ण बात पर ध्यान आकर्षित करवाना चाहती हूँ।

वह बात यह है कि सांवैधानिक लोकतांत्रिक शासनतंत्र में – चाहे वह गणतंत्र हो, या राजतंत्र हो – सरकार के पास पावर भले ही हो, लेकिन यह मान कर नहीं चला जाता कि उन्हें उस पावर को जैसे चाहें, वैसे इस्तेमाल करने की छूट है। यह भी मानकर नहीं चला जाता कि शासन व्यवस्था चलानो वालों के पास कोई दैवीय ज्ञान होता है सही और गलत का। शासनतंत्र और नागरिकों के बीच का रिश्ता मां-बाप और बच्चों के रिश्ते की तरह नहीं है। यह मानकर नहीं चला जाता कि सरकार जो भी सोचती है, जो भी करती है, हमारे लिए अच्छा ही होगा। (कुछ लोग कहेंगे कि मां-बाप और बच्चों के रिश्ते में भी ऐसा मान बैठना नासमझी है, लेकिन उसपर कभी फिर बात करेंगे।) यह रिश्ता तानाशाही राजा और प्रजा का रिश्ता भी नहीं है, जिसमें राजा मालिक होता है और प्रजा को उसकी हर आज्ञा को सर-आँखों पर लेना पड़ता है। नागरिकों और सरकार के रिश्ते को समझना बहुत ज़रूरी है। सरकार हमारे लिए मां-बाप नहीं है। हमारी माई-बाप (मालिक) भी नहीं हे।

चूंकि हमारी संस्कृति में अपने से बड़े या अपने से ऊपर के लोगों को सम्मान देना, यहाँ तक कि अंधा सम्मान देना, ज़रूरी माना जाता है, लोग अक्सर शासनतंत्र के साथ या अपने नेताओं के साथ भी वैसा ही करना उचित समझते हैं। सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना गलत समझते हैं। अपने नेताओं से कठिन सवाल पूछना गलत समझते हैं। ये सब सही नहीं है। शासनतंत्र में बैठे लोग भी इंसान हैं। उन्हें पावर दी गई है क्योंकि समाज को चलाते रखने के लिए कुछ लोगों का शासन चलाना ज़रूरी है। उस पावर पर या हमारी ज़िंदग़ी पर उनका कोई दैवीय अधिकार नहीं हैं। वे हम पर राज करने नहीं बैठे हैं। बल्कि सांवैधानिक तरीकों से हमारे प्रतिनिधि के रूप में देश का काम चलाने बैठे हैं। वे इस देश के आम नागरिक से ऊपर नहीं हैं। क्योंकि वे प्रधानमंत्री हैं, राष्ट्रपति हैं, बड़े ब्यूरोक्रैट हैं, कोई मंत्री, या सांसद या विधायक हैं, किसी भी चीज़ की वजह से उनका हमसे ज़बरदस्ती इज़ज्त लेने का अधिकार नहीं है। जिनको उनका काम पसंद आए, या जिनकी मर्जी हो, वे उनकी इज़्जत करे, जिनको ना करना हो वे ना करे। लेकिन क्योंकि यह लोकतंत्र है, और हमारा संविधान ऐसा कहता है, हर नागरिक को उनसे सवाल पूछने का हक़ ज़रूर है। और सवाल पूछने के हक़ के लिए हमें उनके लिए वोट करने की, उनके सामने सर झुकाने की, या कुछ भी और करने की ज़रूरत नहीं है। अग़र हम नागरिक हैं और वे शासनतंत्र का हिस्सा हैं तो सवाल पूछना हमारा हक़ है।

अगर ये बातें हम भूल जाते हैं, अगर सरकार और सरकारी लोगों को मालिक समझ कर उनके सामने सिर झुकाते हैं, उनकी असंवैधानिक तानाशाही बर्दाश्त करने के लिए तैयार हो जाते हैं, तो बहुत मुश्किल से मिले अपने अधिकारों की उपेक्षा करने की, उन्हें कमज़ोर करने की बहुत बड़ी गलती करते हैं।

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बुनियादी बातें #1: आज़ादी और लोकतंत्र

हम भारतीयों को अपनी आज़ादी अंग्रेज़ी हुक़ूमत से लड़कर, उन्हें भगाने के बाद मिली। और फ़िर हम लोकतांत्रिक देश बन गए। लेकिन कुछ बातों पर ग़ौर करने की ज़रूरत है।

आज हम सब स्वतंत्रता दिवस मनाते है। और हमारे दिमाग़ में यही बात रहती है कि हमें अंग्रेज़ों से, या गोवा, पाँडिचेरी जैसी जगहों पर दूसरी विदेशी ताक़तों से आज़ादी मिली। लेकिन यह बात सब लोगों के लिए सच नहीं है। क्योंकि देश में कई राजा और उनकी रियासतें भी थी आज़ादी के समय। कुछ राज्य तो काफ़ी बड़े भी थे। उनकी प्रजा राजतंत्र के अंदर थी और राजा भारतीय थे।

1947 में हमें एक और चीज़ मिली जो कि काफ़ी कमाल की थी। वह थी एक लोकतांत्रिक सरकार। हममे से कई लोगों को शायद ये दोनों चीज़े एक ही लगती हैं। हम ये मान लेते हैं कि लोकतंत्र तो आना ही था। लेकिन विदेशियों का जाना और एक लोकतांत्रिक सरकार का आना एक ही बात नहीं है। कम्बोडिया से जब विदेशी गए तो सरकार वापस उनके राजा को सौंप के गए। बर्मा में एक लोकतांत्रिक सरकार बनी लेकिन डेढ़ दशकों के अंदर मिलिट्री डिक्टेटरशिप आ गई। वियतनाम में एक-पार्टी की कम्युनिस्ट डिक्टेटरशिप। यहाँ तक कि भारत से ही टूटे पाकिस्तान में भी लोकतंत्र आता-जाता रहता है। और जैसा कि हमने पहले देखा जो आज भारत है उसके सारे लोग भी विदेशी सरकारों के अधीन नहीं थे। उन्हें लोकतंत्र अपने ही राजाओं को हटा कर मिला। कैनेडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे मुल्कों की बात करें तो नाम के लिए उनके राजा या रानी अभी भी ब्रिटिश राजा या रानी ही होते हैं। लेकिन उनकी सरकार लोकतांत्रिक है। श्रीलंका में अंग्रेज़ निकलने से पहले कई तरह के लोकतांत्रिक बंदोबस्त कर के गए थे। लेकिन उनकी आपस की टकराव में कई बार लोकतंत्र हाथ मलता रह गया।

इसलिए हमें कुछ बातें ध्यान में रखनी चाहिए। पहली यह कि विदेशी शासन का जाना लोकतंत्र के आने की गारण्टी नहीं है। दूसरी यह कि अपना शासन होना और लोकतंत्र होना एक ही बात नहीं है। अपने राजा के अंदर राजतंत्र भी हो सकता है। या सबसे भयावह बात यह है कि अपने ही किसी नेता के अंदर तानाशाही भी।

तो इसलिए हमे सावधान रहने की ज़रूरत है कि कहीं हम अपने लोकतंत्र को घर की मुर्गी दाल बराबर समझ कर उसकी सेहत को नज़रअंदाज़ ना करने लगें। अगर आज हमारे पास लोकतंत्र है तो सिर्फ इसलिए नहीं कि विदेशी चले गए। बल्कि इसलिए भी कि हम अपने अंदर के राजाओ और तानाशाहों को सत्ता से दूर रख पाए।

Own Poetry Hindi

देवी

तुम्हें देवी का दर्ज़ा दिया है ना हमने?

तो देवी!

तुम मंदिर में रहो।
जिसका हम अपनी सुविधा से
दरवाज़ा दोपहर में बंद कर के
अपनी नींद पूरी करने जा सकें।

और रात में जहाँ मर्ज़ी हो
जाकरअपनी हवस बुझा सकें।

और सुबह माथा टेक कर मंदिर में
करनी का बोझ भुला सकें।

देवी!

तुम सड़कों पर मत आओ,
हमारे किये की याद मत दिलाओ,
जवाब के लिए आवाज़ मत उठाओ।

क्योंकि मंदिर का नहीं भी सही,
पर जेल का दरवाज़ा तो है ही।
और वह चौबीस घण्टे बंद रहता है।
और तुम्हें मंदिर की मूरत से भी
ज़्यादा मूक कर सकता है।

देवी!

अपने घर वापस जाओ।
समाज को आईना मत दिखाओ।