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बुनियादी बातें #9: समता, मेरिट, प्रिविलेज

हमने पिछला भाग इस सवाल पर छोड़ा था कि समता का मतलब क्या है? और मुझे आशा है कि आपका निष्कर्ष यह था कि सिर्फ सबके ऊपर नियम क़ानून लगाना समता नहीं है। उससे ज़्यादा कुछ चाहिए ताकि जिस समता का अभी समाज में अभाव है, वह लाई जा सके।

लेकिन समाज में समता लाने का भी क्या मतलब है? क्या इसका मतलब यह है कि सारे लोग बिल्कुल एक जैसे हो जाएंगे? कि उनकी सोच-समझ, हाव-भाव, सूझ-बूझ, क्षमताएँ, इच्छाएँ सभी एक जैसी होंगी? ये थोड़ी पागलपंथी वाली बात लगती है। हम सब जानते हैं, अपने अनुभव से, कि ऐसा नहीं हो सकता है। समता का मतलब समानता नहीं होता है। सब लोग एक जैसे नहीं होते।

तो अगर सब लोग अलग-अलग होते हैं तो ज़ाहिर है कि उनकी ज़िंदग़ी भी अलग-अलग होगी ही। तो फिर समता का मतलब है क्या?

जवाब यह है कि समता का अपने आप में ज़्यादा कुछ मतलब नहीं होता। समता कोई इंसान के अंदर की चीज़ नहीं होती। समता हमारे समाज और सिस्टम का एक पहलू होती है। और इसलिए जब भी हम समता की बात करते हैं तो यह पूछना पड़ता है कि भाई! किस चीज़ की समता? अगर किसी ने कह दिया की हर चीज़ की समता, तो दुबारा पूछना पड़ता है कि किस-किस चीज़ की समता?

जैसे कि एक तरह की समता होगी आर्थिक समता। और फिर पूछना पड़ेगा कि आर्थिक समता का मतलब क्या है? क्या इसका मतलब है कि सबके पास बराबर पैसे होने चाहिए? अगर हम ऐसा समाज बना पाते जिसमें सबके पास बराबर पैसे होते और सब लोग अपना-अपना काम करते और मिल-जुल कर खुशी-खुशी रहते, तो फिर बात ही क्या होती? लेकिन सपने देखना छोड़ते हैं और यह मान लेते हैं कि आर्थिक समता का मतलब यह नहीं हो सकता कि सबके पास बराबर पैसे हैं।

आर्थिक समता का दूसरा मतलब यह हो सकता है कि अगर पैसे बनाने का कोई तरीका है तो वह सबको उपलब्ध है। जैसे कि अगर कोई नौकरी उपलब्ध है तो उसे पाने का हक़ सबको है। अगर कोई बिज़नेस है जो आप शुरू कर सकते हैं, तो उसे शुरु करने से मुझे भी कोई नहीं रोक सकता है। चलो ये तो ठीक है, लेकिन इसके बाद अगला सवाल आता है कि जब एक नौकरी हो और उसे पाँच लोग पाना चाहें तब कोई क्या करे? दूसरी चीज़ यह भी है कि सब लोग समान तो होते नहीं, तो फिर यह भी ज़रूरी नहीं कि सब लोग वह नौकरी करने के क़ाबिल हों। कुछ लोग बिलकुल क़ाबिल नहीं होंगे, और कुछ कम, तो कुछ ज़्यादा।

इन दोनों वजहों से हम समता के सिद्धांत के साथ मेरिट की बात करना शुरु करते हैं। कि नौकरी उसे मिलेगी जिसके अंदर उस नौकरी के लिए सबसे ज़्यादा क़ाबिलियत है, यानि जिसके पास सबसे ज़्यादा मेरिट है। अब मेरिट के विचार से हम इतनी अच्छी तरह से वाक़िफ़ हैं कि इसमें कोई पेचीदगी हो सकती है, ऐसा हम कभी सोचते ही नहीं हैं। लेकिन ज़रा एक मिनट ठहरिए और सोचिए कि मेरिट का मतलब क्या है? क्या जो तरह-तरह की परीक्षाएँ हमने बना रखी हैं – पढ़ाई के लिए, नौकरियों के लिए – उनके परिणाम मेरिट हैं? अगर वह पक्का मेरिट है, तो कहीं भी सरकारी नौकरी में, जिसके लिए इतना कॉम्पीटीशन होता है और इतनी परीक्षाएँ पास की जाती हैं, कोई ऐसा इंसान नहीं होता जो कि सही से काम नहीं करता। लेकिन ऐसे लोग भर-भर के होते हैं। अब आप कहेंगे कि उन्हें काम करना आता तो है, लेकिन वे करना नहीं चाहते हैं। तो किसी काम को सही से करने के लिए अगर काम करना चाहना ज़रूरी है तो मेरिट की परिभाषा में वह भी तो शामिल होना चाहिए? जो इंसान कुर्सी पर बैठ कर काम नहीं कर रहा है, उसकी जगह अगर कोई ऐसा इंसान वहां होता जिसके नंबर उससे थोड़े कम आए होते, लेकिन जो काम करना चाहता, तो वह बेहतर काम कर रहा होता।

तो ज़ाहिर है कि मेरिट की जो भी परिभाषा हमने निकाली है वह ऐसी कोई ऑब्जेक्टिव तो नहीं है। उससे किसी काम के लिए इंसान की क़ाबिलयत का सही पता चले, यह ज़रूरी नहीं है। इस बात को ध्यान में रखते हैं, लेकिन आगे भी बढ़ते हैं।

माना कि हमारी मेरिट की परिभाषा बहुत सटीक नहीं है, लेकिन वह सबके लिए समान तो है? हर काम के लिए हमें सबसे अच्छा व्यक्ति मिले या नहीं मिले, लेकिन नौकरी कर के जीवनयापन करने का जो हक़ सब लोगों को है, उसे पाने के लिए सबको एक ही तराजू पर तो तौला जा रहा है? तो ये काम तो हम सही कर रहे हैं। लेकिन क्या यह भी समता के लिए काफ़ी है?

एक उदाहरण लेते हैं। जब मैं दसवीं की परीक्षा दे रही थी, तो उस पूरे साल में मेरे पास पढ़ाई करने के अलावा कोई काम नहीं था, कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी। मैं एक होस्टल में रहती थी, जहाँ मेरे आस-पास के और लोग भी उतनी ही मुस्तैदी से परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। हमारे शिक्षक काफ़ी क्वालिफाइड थे, और वे हर समय हमारे लिए उपलब्ध भी थे। परीक्षा के समय तक आते आते, मैंने इतने सारे सैंपल पेपर सॉल्व किये हुए थे कि किसी भी विषय की परीक्षा में शायद ही कोई प्रश्न ऐसा था जिसका उत्तर मैंने पहले कई बार लिखा हुआ ना हो।

यही परीक्षा कुछ ऐसे बच्चे भी दे रहे होंगे जिनके घर में उनकी पढ़ाई के लिए कोई शांत जगह तक नहीं होगी, जिनको घर के काम करने पड़ते होंगे, या शायद घर के बाहर भी – खेत में, दुकान पर, जिनके स्कूलों में हर विषय के शिक्षक भी नहीं होंगे, होंगे भी तो काम पर आते नहीं होंगे, ठीक से पढ़ाते नहीं होंगे।

क्या उस परीक्षा में मेरे नंबर उन बच्चों से ज़्यादा आए, तो कोई आश्चर्य की बात है? क्या यह मेरिट सिर्फ मेरी प्रतिभा का नतीजा था? नहीं। इस मेरिट में एक बड़ा योगदान उन बच्चों की तुलना में मेरी प्रिविलेज का भी था।
कुछ और लोग भी वही परीक्षा दे रहे होंगे जिनका प्रिविलेज मुझसे भी ज़्यादा था। हमारे होस्टल में गर्मियों में बिजली चली जाती थी तो पंखा नहीं होता था, जबकि महानगरों में पल रहे अमीर बच्चों को पास ए. सी. रहा होगा। हमारे ही स्कूल के लड़के भी हमसे थोड़े ज़्यादा प्रिविलेज्ड थे, क्योंकि वे गर्मी में अपने कमरों से बाहर निकल कर पढ़ सकते थे या खिड़की खुली रख सकते थे। लेकिन लड़कियों को यह आज़ादी भी नहीं थी, उनकी ‘सुरक्षा’ के लिए। तो पसीने में नहा रहे हों या गर्मी से दम फूल रहा हो, पढ़ाई करनी है तो उसी बंद, गर्म कमरे में करनी है।

हम अपने से ज़्यादा प्रिविलेज वाले लोगों को देख कर अपना प्रिविलेज भूल जाते हैं। लेकिन यह मत भूलिए कि मेरिट में प्रिविलेज का बड़ा हाथ होता है।

कुछ लोग उन लोगों का उदाहरण देकर जिन्होंने प्रिविलेज ना होने पर भी सफलता हासिल की है, यह साबित करना चाहते हैं कि प्रिविलेज होने या ना होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। इसके जवाब में अंग्रेज़ी की एक अच्छी कहावत है: Exception that proves the rule – अपवाद जो सिद्धांत को साबित करता है। कैसे? इस बात से कि कम प्रिविलेज वाले लोगों की सफ़लता के उदाहरण इतने कम होते हैं कि वे हेडलाइन बन जाते हैं। इससे यह साबित नहीं होता कि प्रिविलेज से फ़र्क नहीं पड़ता। इससे यह साबित होता है कि प्रिविलेज की कमी पूरा करने के लिए उनके अंदर की प्रतिभा को और भी ज़्यादा मजबूत होना पड़ता है। इसलिए बिना प्रिविलेज के बहुत कम लोग वह सफलता प्राप्त कर सकते हैं। अगर उतनी प्रतिभा के साथ उन्हें प्रिविलेज भी मिला होता, तो वे और भी बेहतर करते। और जिन प्रिविलेज वाले लोगों ने उनके जितनी सफलता पाई है, उनकी अंदरूनी प्रतिभा कहीं कम है।

तो याद रखिएगा कि मेरिट की जो भी परिभाषा हो, लेकिन उसका समीकरण कुछ ऐसा होता है:

मेरिट = प्रतिभा + प्रिविलेज

तो जहाँ समता की समस्या हम मेरिट के बल पर सुलझाने की कोशिश कर रहे थे, वहाँ प्रिविलेज की पेचीदगी आ गई है। प्रिविलेज कहाँ से आता है? इसके बारे में हम अगली बार बात करेंगे।

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One thought on “बुनियादी बातें #9: समता, मेरिट, प्रिविलेज

  1. खूबसूरत लेख।
    हम अकेला जन्मे अकेला ही मरेंगे,
    अपने घर के चूल्हे पर
    पकने वाली रोटी की तलाश
    खुद ही करेंगे,
    गोत्र,जाति,धर्म,भाई,भतीजा
    कोई हमारा साथी नहीं
    बल्कि जो करीब हैं वही
    हमें ज्यादा सताते हैं,
    फिर ये समानता के नामपर बन्धन कैसा?
    क्यों हम गरीब के घर पैदा होकर भी
    गरीब नही माने जाते ?

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