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बुनियादी बातें #8: समता क्या है?

‘क़ानून के सामने सभी बराबर होते हैं।’

किसी हीरो की भारी-भरकम आवाज़ में ये किसी भी हिन्दी फ़िल्म का डायलोग हो सकता है। और हममें से ज़्यादातर लोग इसके बारे में ज़्यादा सोचेंगे नहीं। क्योंकि ये हमें बड़ी साधारण सी बात लगती है जो हर किसी को समझ में आती है। समता का सिद्धांत हमारे संविधान में निहित हैं। सभी नागरिक बराबर हैं। मैं इसके बारे में कुछ और क्यों लिखना चाहती हूँ? इसलिए कि समता का सिद्धांत तो ठीक है लेकिन इसका मतलब क्या होता है और इसका स्वरूप क्या होना चाहिए, यह तय करना हमेशा आसान नहीं होता है।

एक उदाहरण लेते हैं।

अगर एक इंसान किसी दूसरे का ख़ून करता है, तो उसके लिए हमारे क़ानून में सज़ा नियत है। मान लीजिए कि उसकी सज़ा उम्रक़ैद है। तो मुज़रिम अमीर हो या ग़रीब, उसे यही सज़ा होनी चाहिए। इसमें ज़्यादा लोगों को आपत्ति तो नहीं होती है।

एक थोड़ा अलग उदाहरण लेते हैं। चोरी का। मान लीजिए कि चोरी की सज़ा यह है कि मुज़रिम को चोरी किया हुआ सामान या उसका दाम वापस करना होगा और साथ में कुछ और हर्ज़ाना भी भरना होगा। अब मान लीजिए कि किसी ऐसे ग़रीब आदमी ने, जो कि भूख से मर रहा हो, एक बहुत ही अमीर आदमी के घर से थोड़ा खाना चुरा कर खा लिया। उस अमीर आदमी के घर पर इतना खाना था कि अगर यह चोर रंगे हाथों पकड़ा ना जाता तो शायद किसी को पता भी नहीं चलता कि थोड़ा खाना चुराया गया है। लेकिन यह चोर पकड़ा गया। खाना तो उसने खा लिया है, वह वापस हो नहीं सकता। और पैसे उसके पास हैं नहीं, तो वह दाम या हर्ज़ाना तो क्या ही भरेगा? उसे शायद जेल जाना पड़ेगा।

क्या इस उदाहरण में आपको थोड़ी कसमसाहट सी होती है? मुझे होती है। कई लोगों को होती है। क्या हमारे समाज में कुछ गड़बड़ नहीं है कि कुछ इंसान भूख से मर रहे हैं, जबकि कइयों के यहाँ खाना बर्बाद हो रहा है? कुछ तो है जो सही नहीं लगता कि एक भूख से मर रहे आदमी को हम और सज़ा दे रहे हैं।

हमारे क़ानून या हमारी सरकार हाथ पर हाथ धरे इस परिस्थिति को स्वीकार नहीं कर लेते। गरीबों को खाना चुराने की छूट तो हम नहीं देते, लेकिन ऐसे सरकारी कार्यक्रम हैं, जिनका काम है यह सुनिश्चित करना कि जिन लोगों के पास भोजन-प्राप्ति के लिए संसाधन नहीं हैं, उन्हें मुफ़्त में या कम-से-कम दाम पर भोजन उपलब्ध करवाया जाए।

अब अगर इंसान अड़ जाए तो यह कह सकता है कि जब बाकी लोग अपना खाना पैसे देकर खरीदते हैं तो कुछ लोगों को यह मुफ्त में या कम दाम पर देना बाकी लोगों के समता के अधिकार का उल्लंघन हैं।

ऐसी परिस्थिति में हमें एक क़दम पीछे लेना पड़ेगा और ये पूछना पड़ेगा कि आखिर समता का सिद्धांत महत्वपूर्ण क्यों है? यह सिद्धांत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके जरिए हम एक न्यायपूर्ण समाज बनाना चाहते हैं। हम नहीं चाहते कि अमीर और शक्तिशाली लोग बाकी लोगों के साथ कुछ भी करें और कोई उनका बाल भी बांका ना कर पाए। अगर समता के सिद्धांत को हमने ऐसा स्वरूप दे दिया कि उससे कमज़ोर और दबे-कुचले लोगों की ही हालत और खराब होने लगे, तो इस सिद्धांत की कोई महत्ता ही नहीं रह जाएगी। जिस समाज में इतनी गरीबी है कि कुछ लोग खाने के लिए चोरी करने पर मजबूर हैं, वहाँ सारे चोरों को सज़ा देकर भी समाज का ज़्यादा कुछ कल्याण नहीं हो जाएगा। बल्कि वहाँ हमें यह पूछने की ज़रूरत है कि क्या समाज में कुछ लोगों का इतना गरीब होना अपने आप में ही समता के सिद्धांत की खिल्ली नहीं है?

जो सवाल यहाँ उठ रहे हैं, वे ये हैं:
1. जब हम समता के सिद्धांत की बात कर रहे हैं, तो हम अपने समाज के बारे में क्या कह रहे हैं? क्या हम यह कह रहे हैं कि समाज में समता पहले से है और हमारा काम इसे बरक़रार रखना है? या हम यह कह रहे हैं कि समाज में समता नहीं है और हमें उसे प्राप्त करने की कोशिश करनी है?
2. हम किस तरीके की समता की बात कर रहे हैं? क्या हम नियम-क़ानून सब के ऊपर एक तरीके से लगाने की बात कर रहे हैं? या उन नियम कानूनों का असर क्या होगा, इसकी बात कर रहे हैं?

दूसरा सवाल पहले से संबंधित है। दूसरे का जवाब पहले पर निर्भर करता है। अगर समाज में पहले से समता नहीं है, तो सबके ऊपर सिर्फ एक जैसे नियम-क़ानून लगाने से काम नहीं चलेगा।

इस भाग में मैं बस आपको इस विचार के साथ छोड़ देना चाहती हूँ कि क्या हम वाकई में समता की बात उतने अच्छे से समझते हैं, जितना हमें लगता है? क्या समाज में पहले से समता है? अभी के बाद जब किसी बात का समर्थन या विरोध आप समता के नाम पर करें, तो एक बार ज़रूर सोचें कि उस समता का मतलब क्या है?

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