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बुनियादी बातें #7: व्यक्ति, समाज और संविधान

हमारा संविधान बहुत तरह के समूहों को अलग-अलग तरीके से मान्यता देता है और एक व्यक्ति की पहचान उस समूह के सदस्य को रूप में स्वीकार करता है। हमारे देश का प्रशासन ही विभिन्न राज्यों में बंटा हुआ है। इसके जरिए एक क्षेत्रीय पहचान को मान्यता मिलती है। लोगों को अपने धर्म का पालन करने की आज़ादी है। इसलिए हालांकि हमारा कोई राष्ट्रीय धर्म नहीं है, लेकिन हम लोगों की धार्मिक पहचान को मिटाते नहीं है, उसे स्वीकार करते हैं। हमारे संविधान में बाइस भाषाएं आंठवें शेड्यूल में शामिल हैं। हर राज्य की आधिकारिक भाषा अलग हो सकती है जो वहाँ की स्थानीय भाषाओं में से चुनी जाती हैं। इस तरह भाषाई समूहों को भी पहचान मिलती है। कई क़ानूनों के जरिए परिवार को एक इकाई के रूप में भी मान्यता मिलती है।

लेकिन इन सबसे ऊपर हमारे संविधान में व्यक्ति की अपनी पहचान और अपने अधिकार हैं। एक व्यक्ति का मौलिक अधिकार उसके किसी भी समूह के अधिकारों के अधीन नहीं है। व्यक्ति की क़ानूनी पहचान सबसे पहले उसकी अपनी है।

वैयक्तिक अधिकारों और स्वतंत्रता पर आदर्श रूप से संविधान और क़ानून व्यवस्था उतनी ही रोक लगाती है जितनी समाज और देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए ज़रूरी है। कुछ मामलों में इसका निर्णय लेना आसान होता है। यह तो आज की तारीख़ में सभी मानेंगे कि किसी व्यक्ति को दूसरे का क़त्ल करने की आज़ादी नहीं होनी चाहिए। किसी दूसरे की चीज़ चुराने की भी आज़ादी नहीं होनी चाहिए। लेकिन और कई मामलों में यह सिद्धांत विविदास्पद हो सकता है। किसी धर्म में बहुविवाह की आज़ादी हो, या किसी समुदाय में जायदाद के मामलों मे लड़कों को प्राथमिकता मिलती हो, या किसी जनजाति के पारंपरिक पंचायती क़ानून हों जो कि उन्हें देश के क़ानूनों से ज़्यादा मान्य हों, तो ऐसी परिस्थितियों में पेचीदगी उत्पन्न हो जाती है। ख़ास कर जब एक तरफ़ तो हम हर समुदाय की पहचान को मान्यता देना चाहते हैं और इसलिए उन्हें अपनी परंपराओं की रक्षा करने का हक़ देना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ़ उन परंपराओं से उन समुदायों के लोगों के वैयक्तिक अधिकारों का हनन होता हो।

मोटे सिंद्धांत के तौर पर ऐसे मामलों में संविधान और क़ानून वैयक्तिक अधिकारों का साथ देता है।

उदाहरण के लिए इन बातों पर ध्यान दीजिए। हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है, लेकिन उसे यह अधिकार नहीं है कि अपने बच्चों को धर्म के बाहर जाकर शादी करने से रोके। उसके दूसरे सहधर्मियों को भी यह अधिकार नहीं है कि धर्म के नाम पर उसके खान-पान पर प्रतिबंध लगाए। इसी तरह संपत्ति और जायदाद से संबंधित कई क़ानूनों में पारिवारिक संबंधों का बहुत महत्व है, लेकिन आपके परिवार में किसी का यह हक़ नहीं कि वह आपसे आपकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कोई नौकरी करवाए। अग़र आपके परिवार के अंदर भी कोई आपके साथ मार-पीट करता है या आपको आर्थिक रूप से कोई धोखा देता है, तो आप उसके ख़िलाफ़ कार्यवाही कर सकते हैं। अगर आपके बच्चे वयस्क हैं, यानि अठारह साल से बड़े हैं, तो उन्हें अपनी मर्ज़ी से वोट देने से रोकने का, धर्म-परिवर्तन करने से रोकने का, पढ़ाई, नौकरी या शादी से संबंधित फ़ैसले लेने से रोकने का आपको कोई हक़ नहीं है। (शादी के संबंध में लड़कों की आयु सीमा इक्कीस साल है।) उसी तरह अगर आप वयस्क बच्चों को अपनी अर्जित सम्पत्ति से आर्थिक सहायता ना देना चाहें तो उन्हें आपसे वह सहायता मांगने का भी हक़ नहीं है।

राजनैतिक और ऐतिहासिक कारणों से कुछ मामले अभी भी ऐसे हैं हमारे सामने जिसमें यह पेचीदग़ी हल नहीं हो पाई है, लेकिन आम-तौर पर यह समझ कर चलने में कोई हर्ज़ नहीं है कि हमारा संविधान और शासन तंत्र हर व्यक्ति की स्वतंत्रता, गरिमा और अधिकारों का पक्षधर है। और हम अपने समाज को एक आधुनिक, उन्नत और सफल समाज तभी कह सकते हैं जब इसमें हर व्यक्ति को अपने तरीके से अपनी ज़िंदग़ी जीने का हक़ हो।

यह सिंद्धांत समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारी परंपराएं अक्सर इसे मान्यता नहीं देती है। सबसे करीबी उदाहरण शादियों का है। ‘अरेंज्ड मैरिज’ की परंपरा की वजह से परिवार के दबाव में आकर युवा अक्सर ही अपनी पसंद छोड़कर ऐसे व्यक्ति से शादी करते हैं जिन्हें उनके परिवार वालों ने चुना हो, जो उनके धर्म, जाति और सामाजिक स्तर के अनुकूल हों। जब लोग इस परंपरा के ख़िलाफ़ जाना चाहते हैं तो कई पढ़े-लिखे, आर्थिक रूप से संपन्न मध्यवर्गीय परिवारों में भी हंगामा खड़ा हो जाता है। कितने ही युवा-विद्रोह हर रोज़ हमारे समाज में दबाए जाते हैं। विद्रोही भी अधिकतर मामलों में इसे क़ानूनी मामला बनाने की नहीं सोचते हैं। ज़्यादातर मामलों में वे परिवार से हार भी जाते हैं। इसके बारे में चर्चा करने का उद्देश्य मेरा यहां पर ‘अरेंज्ड मैरिज’ या ‘लव मैरिज’ के फ़ायदे-नुक़्सान गिनाना नहीं है। बल्कि मैं ध्यान इस बात पर आकृष्ट करना चाहती हूँ कि किस तरह अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदग़ी में हम कई बार उन सिद्धांतों पर अमल नहीं करते हैं जिनपर हमारा स्वतंत्र, गणतांत्रिक, सांवैधानिक देश बना है।

अपने परिवार वालों या आस-पास के लोगों से उनकी वैयक्तिक स्वतंत्रता परिवार, धर्म, समाज के नाम पर छीनना तो ग़लत है ही, लेकिन यह सोच तब और भी चिंतनीय हो जाती है जब परंपराओं की दुहाई देकर लोग संविधान और क़ानून से ही उन सिद्धांतों को खतम कर देना चाहते हैं। अगर आप क़ानूनी तौर पर लोगों को खान-पान पर प्रतिबंध लगाना चाहते हैं, उनके शादी-ब्याह को नियंत्रित करना चाहते हैं, वह कहाँ रह सकते हैं, कहाँ नहीं इसपर पाबंदियाँ लगाना चाहते हैं, तो यह ध्यान रखें कि आप सांवैधानिक सिद्धांतों के विरोध में खड़े हैं और देश के उत्थान के रास्ते में आ रहे हैं। ऐसी प्रवृत्तियों से हमारे देश में हर व्यक्ति को वह गरिमा और स्वतंत्रता हासिल नहीं हो पाएगी जो एक आधुनिक, उन्नत समाज का लक्षण है।

एक बात साफ़ कर देनी यहाँ ज़रूरी है। वैयक्तिक स्वतंत्रता का यह मतलब नहीं है कि परिवार और समाज तितर-बितर हो जाएगा। ऐसा हो ही नहीं सकता क्योंकि मनुष्य स्वभाव से ही सामाजिक प्राणी है। वैयक्तिक स्वतंत्रता की बात करने वाला कोई भी इंसान इससे इंकार नहीं करता। बात सिर्फ़ इतनी है कि हमारी परंपराओं ने कई मामलों में समाज को व्यक्ति का शोषक बना दिया है। लेकिन समाज ही व्यक्ति की शक्ति भी होता है और हर व्यक्ति को समाज की ज़रूरत होती है। अगर ऐसा नहीं होता तो समाज का मतलब ही क्या रह जाएगा। वैयक्तिक स्वतंत्रता को प्रधानता देना यह सुनिश्चित करने में सहायक है कि व्यक्तियों के जिस समूह से समाज बना है, वह हर व्यक्ति के उत्थान और भलाई के लिए काम करे, ना कि समाज के नाम पर उन्हें दबाने के लिए।

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