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बुनियादी बातें #10: प्रिविलेज क्या है?

हमने पिछले हिस्से में बात की थी कि कैसे जिन चीज़ों को हम मेरिट का नाम देते हैं, वे सिर्फ़ व्यक्ति की प्रतिभा का परिणाम नहीं होती, बल्कि उनमें प्रिविलेज का भी बहुत बड़ा हाथ होता है। कुछ मायनों में प्रिविलेज को समझना आसान होता है। जैसा कि शायद मेरे उदाहरण में था। जैसे कि लगभग सभी मानते हैं कि अमीर लोगों के पास गरीब लोगों से ज़्यादा प्रिविलेज होता है। लेकिन इस बारे में थोड़ा और गहराई से समझने की ज़रूरत है, ख़ास कर के तब जब हम नियम, क़ानून, संविधान, सरकारी फैसलों और नीतियों के बारे में अपनी राय देते हैं।

इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात समझने की यह है कि प्रिविलेज का मतलब यह नहीं होता कि आपकी ज़िंदग़ी में कोई समस्याएं या संघर्ष नहीं रहे हैं। अगर एक आम मध्यमवर्गीय, सवर्ण आदमी से कहा जाएगा कि उसके पास प्रिविलेज है तो वह बिदक जाएगा कि कैसा प्रिविलेज। कहेगा कि मैंने ट्यूशन पढ़ा-पढ़ा कर अपनी कॉलेज की फीस दी है, रात-दिन काम करता हूँ, तब परिवार का काम चलता है, और महीने के अंत में फिर भी शायद ही कुछ बचता है। अपना घर बनाने के लिए लोन लेना पड़ेगा और सालों उसे चुकाना पड़ेगा। मेरे पास कैसी प्रिविलेज है?

कम-से-कम दो तरह की प्रिविलेज उसके पास हैं।

चूँकि वह एक सवर्ण है, उसे इस बात की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है कि किसी को उसकी जाति की वजह से उसके साथ उठने-बैठने में समस्या हो सकती है। अगर वह ट्यूशन पढ़ाने के क़ाबिल है तो उसे काम देने से लोग इस वजह से मना नहीं करेंगे कि उसके आने से उनका घर अशुद्ध हो जाएगा। अगर वह किसी नौकरी के लिए आपना बायोडाटा भेजेगा तो लोग बिना उससे मिले ही ‘कैटेगरी कैण्डीडेट’ होने की वजह से उसे अस्वीकृत नहीं कर देंगे।

और क्योंकि वह स्त्री नहीं, पुरुष है, उसकी भी प्रिविलेज उसके पास है। किसी के घर जाकर ट्यूशन पढ़ाने के पहले उसे यह नहीं सोचना पड़ता कि कहीं उस घर में कोई उसके साथ बदतमीज़ी तो नहीं करेगा। उसके पास ऑटो और टैक्सी के पैसे ना हों, तो भी वह काफ़ी दूर-दूर तक जाकर नौकरी कर सकता है क्योंकि वह बस में सफ़र कर सकता है, बिना इस बात की चिंता किए कि कोई ना कोई हर रोज़ उसे दबोचने की कोशिश करेगा या अगर वापस लौटने में देर हुई तो सुरक्षित घर लौटने की संभावना ना के बराबर है।

बस में धक्के खाना कोई प्रिविलेज है, आप पूछेंगे। बस में जा पाना, बिना डरे हुए, एक प्रिविलेज है। क्योंकि आपको भले इसके बारे में सोचने की ज़रूरत ना पड़ती हो। लेकिन एक स्त्री को, जो कि बाकी चीज़ों में बिलकुल आपके जैसी हो सकती, हर बार बस में चढ़ने पर सोचना पड़ता है। कई स्त्रियाँ नहीं चढ़ती हैं। कइयों के बस में चढ़ने पर उनके घर वाले रोक लगा देते हैं। तो अगर उनके पास पैसे नहीं हैं टैक्सी करने के लिए या अपनी कार के लिए तो वे कई जगहों पर जा ही नहीं सकतीं।

रोज़मर्रा की ज़िंदग़ी से जूझते हुए आपको इन प्रिविलेजों का परिणाम नहीं दिखता होगा। लेकिन बड़े स्तर पर जब संख्याएं देखी जाती हैं जैसे कि किस तरह के लोगों के पास पावर और पैसे वाली नौकरियाँ हैं, तो उनमें सवर्ण पुरुष हमेशा ज़्यादा होते हैं। सिर्फ सबसे ऊपर के स्तर पर नहीं, हर जगह। इसको मेरिट का मसला बता कर रफ़ा-दफ़ा मत कीजिएगा। क्योंकि हमने पहले ही देखा है कि मेरिट में ख़ुद ही प्रिविलेज का बड़ा हाथ होता है। तो यह एक चक्र सा चलता है। प्रिविलेज से मेरिट मिलती है और मेरिट से और भी प्रिविलेज।

प्रिविलेज होने का मतलब यह नहीं है कि आप अंबानी ही बन गए हैं। आपकी ज़िंदग़ी में कमियाँ हो सकती हैं। अपनी जिंदग़ी की कमियां ख़ुद को दिखती हैं। लेकिन प्रिविलेज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अपनी प्रिविलेज किसी को नहीं दिखती है। क्योंकि वह जिन वजहों से मिलती है वह आपको इतने सहज तरीके से उपलब्ध हैं, कि आप उसके बारे में सोचते भी नहीं है। घर की मुर्गी दाल बराबर वाली परिस्थिति होती है। उसका महत्व समझ में नहीं आता है। इसलिए आप कभी सोचते भी नहीं हैं कि जिन लोगों को वह उपलब्ध नहीं हैं, उनकी ज़िंदग़ी में इससे कितनी ज़्यादा समस्याएँ हो सकती हैं। कोशिश करने पर भी सोचना मुश्किल होता है। याद रखिए कि अगर आप ऐसे समूहों को सदस्य हैं जो कुछ सुविधाओं, कुछ सुरक्षाओं को सामान्य मान कर चलते हैं, क्योंकि उन्हें ये सहज ही उपलब्ध है, जबकि दूसरे समूहों के साथ ऐसा नहीं होता, तो आपके पास प्रिविलेज हैं।

प्रिविलेज कोई एक चीज़ भी नहीं है। अलग-अलग वजहों से प्रिविलेज मिलती है। भारत में बहुसंख्यक धर्म के सदस्य होने से, सवर्ण होने से, या पुरुष होने से आपको प्रिविलेज मिलती है। पैसों से भी प्रिविलेज मिलती है। इसका मतलब यह है कि एक ही व्यक्ति किसी मामले में प्रिविलेज्ड हो सकता है, तो किसी और मामले में अनप्रिविलेज्ड। एक दलित पुरुष अपनी जाति की वजह से एक सवर्ण महिला के सामने अनप्रिविलेज्ड है। लेकिन वह महिला भी अपने लिंग के कारण उस पुरुष के सामने अनप्रिविलेज्ड है। किसी एक व्यक्ति के लिए कभी-कभी एक तरह का प्रिविलेज, दूसरे तरह के प्रिविलेज की कमी को पूरा भी कर सकता है। अगर आपके पास धुरांधार पैसे हैं, और आप दलित हैं, तो शायद कुछ कट्टर सवर्ण भी आपके दरवाज़े पर नाक रगड़ने को तैयार हो जाएंगे। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि दलितों और सवर्णों के प्रिविलेज का अंतर ख़त्म हो गया। क्योंकि वही सवर्ण दूसरे मध्यमवर्गीय या गरीब दलितों को अपनी बराबरी में नहीं बैठने देंगे। ऐसे ही जब एक महिला राजनीति में शक्तिशाली हो जाती है, तो उसकी बात बहुत से ऐसे लोग सुनने लगते हैं जो कि अपने बराबर की और महिलाओं की नहीं सुनते। लेकिन उतनी शक्ति हासिल करने के लिए या तो उस महिला को किसी और तरह की प्रिविलेज का इस्तेमाल करना पड़ा होगा, या पुरुषों से बहुत ज़्यादा प्रतिभा दिखानी पड़ी होगी। एक अलग सी लगने वाली बात पर ग़ौर करते हैं। क्या आपको कभी लगता है कि राजनीति की शक्तिशाली महिलाएं, ख़ास कर के वे जिन्होंने अपने दम पर अपनी पहचान बनाई है, जो किसी राजनैतिक या अमीर परिवार से नहीं आती, पुरुष राजनीतिज्ञों से ज़्यादा बुरी होती हैं? शायद इसकी वजह यह है कि वैसे पुरुष जो अपने दम पर राजनीति में आगे बढ़ते हैं, किसी राजनैतिक या अमीर परिवार से नहीं आते, बड़े ब्यूरोक्रैट नहीं रहे होते, उन्हें ऊपर चढ़ने के लिए बहुत से बुरे काम करने पड़ते हैं। राजनीति में यह कर पाना उनकी प्रतिभा और मेरिट का प्रमाण है। तो महिलाओं के पास पुरुष ना होने की प्रिविलेज की कमी को पूरा करने का क्या तरीका है? अपने तरह के पुरुषों से बढ़कर वे काम करना जिससे राजनीति में आगे बढ़ सकते हैं!

चलिए ख़ैर, राजनीति को छोड़िए और थोड़ी देर इसपर विचार कीजिए कि आपके पास किस तरह की प्रिविलेज है? और जो है उसके लिए – थोड़ी देर के लिए ही सही – खुश रहिए।

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