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बुनियादी बातें #6: किसका लोकतंत्र?

हमने पहले बात की थी कि किस तरह हमारे देश का लोकतांत्रिक या गणतांत्रिक होना ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि हमारी व्यवस्था का सांवैधानिक होना भी बहुत महत्वपूर्ण है। सांवैधानिकता है जो हमारी सरकार को उसकी पावर का गलत इस्तेमाल करने से रोकती है। लेकिन सांवैधानिकता सिर्फ़ शासनतंत्र को नियमित करने के लिए ज़रूरी नहीं है। यह लोकतंत्र को एक न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाए रखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

अब तक हमने सरकार और नागरिकों की बात ऐसे की है मानो नागरिक सब एक जैसे ही हैं और उनका भला-बुरा सब एक जैसा ही है जिसको ध्यान में रख कर सरकार को काम करना होता है। लेकिन सारे नागरिक एक जैसे नहीं हैं। वे कई तरह के अलग-अलग समूहों में बँटे हुए हैं। और कौन किस समूह का हिस्सा है इसपर उसकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति निर्भर करती है, उसकी सोच-समझ निर्भर करती है, उसकी भले-बुरे की पहचान निर्भर करती है। समूह शब्द का इस्तेमाल मैंने कई तरह की विविधताओं को जताने के लिए किया है। ये कोई सोच-समझ कर बनाए गए समूह नहीं हैं। लिंग, धर्म, जाति, आर्थिक स्थिति, भाषा, क्षेत्र किसी भी तरह की विविधता अलग-अलग समूहों का निर्माण करती है।

अब इंसान की यह प्रवृत्ति होती है कि अपने जैसे लोगों की ज़्यादा परवाह करता है। तो इसलिए एक समूह के लोग एक-दूसरे के साथ ज़्यादा खड़े होते हैं, बजाय कि किसी दूसरे समूह के लोगों के साथ। बच्चों की भी लड़ाई होती है मां-बाप अपने बच्चों की ज़्यादा तरफ़दारी करते हैं। अपने धर्म, अपनी जाति वाले लोगों के साथ लोग ज़्यादा जाना-पहचाना महसूस करते हैं। दूर देश में कोई अपनी भाषा बोलने वाला मिल जाता है तो उसपर अपने पड़ोसी से भी ज़्यादा भरोसा कर बैठते हैं, भले ही असल में अपनी भाषा बोलने वाला इंसान कोई बड़ा ठग हो और दूसरी भाषा बोलने वाला पड़ोसी बहुत नेक़दिल हो। फ़िर कई बार एक समूह के लोगों की भलाई भी एक सी चीज़ों में होती है। अगर एक बांध बनने से एक क्षेत्र के गांव पानी में डूबने वाले होते हैं, तो दूसरे क्षेत्र के गांवों में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होने वाला होता है। ज़ाहिर है कि दोनों जगह रहने वालों लोगों के बांध के बारे में विचार अपने आस-पास रहने वाले लोगों से मिलेंगे। जिनके गांव डूबने वाले हैं, उन्हें बांध का विचार गलत लगेगा। जिन्हें पानी मिलने वाला है, उन्हें सही लगेगा।

यह समूहों की “अपने” लोगों का साथ देने की प्रवृत्ति के साथ यह भी ध्यान में रखें कि हमारे लोकतंत्र में कई फ़ैसले बहुमत से तय होते हैं। तो अगर किसी एक समूह में लोगों की संख्या ज़्यादा है तो क्या वह लोकतंत्र का फ़ायदा उठा कर सारे फ़ैसले अपनी मर्ज़ी के या अपने हक़ में करवा सकते हैं? क्या जिस धर्म के लोग ज़्यादा हैं देश में वे अपने धर्म के ज़्यादा प्रतिनिधि विधायिका में भेज कर उनसे यह क़ानून बनवा सकते हैं कि बाकी लोगों को अपना धर्म मानने की, अपने तरीके से पूजा-पाठ करने की स्वतंत्रता ना रहे। क्या पुरुष जिनका राजनीति में ज़्यादा प्रतिनिधित्व है महिलाओं से मतदान का अधिकार छीन सकते हैं?

वे यह सब नहीं कर सकते और यहीं पर संविधान फ़िर से अपनी भूमिका निभाता है। हमारा संविधान लोगों को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है। इसलिए अगर देश के अस्सी प्रतिशत लोग भी चाहें तो किसी धार्मिक समूह की यह स्वतंत्रता छीन नहीं सकते। इक्यावन प्रतिशत पुरुष भी उनचास प्रतिशत महिलाओं से मतदान का अधिकार नहीं छीन सकते।

इस पूरी कहानी का मतलब यब है कि यह हमारे देश की सांवैधानिकता है जो लोकतंत्र को बहुसंख्यक नागरिकों के समूह की दादागिरी बनने से बचाती है और हर नागरिक को न्याय दिलाती है, अभिव्यक्ति और धर्म की स्वतंत्रता देती है, हर व्यक्ति की गरिमा सुनिश्चित करती है। इसका यह भी मतलब है कि अगर किसी प्रस्ताव या फैसले की तरफ़दारी इसलिए की जा रही है क्योंकि देश में ज़्यादा लोग ऐसा चाहते हैं, तो सिर्फ़ उस वजह से वह फैसला सही नहीं हो जाएगा। अगर उससे किसी भी व्यक्ति के अधिकारों के हनन की नौबत आती है या संविधान के किसी भी हिस्से की वह अवज्ञा करता है, तो वह फ़ैसला नहीं लिया जा सकता।

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