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बुनियादी बातें #5: संविधान, लोकतंत्र और बदलाव

हमने ये देखा कि किस तरह हमारा संविधान हमें देश के क़ानून बदलने की एक व्यवस्था देता है, जिससे कि अगर कोई गलत क़ानून रह गया हो तो उसे हटाना, या ज़रूरत के हिसाब से नए क़ानून बनाना संभव है। और यह सब सांवैधानिक दायरे में रह कर होता है।

लेकिन ख़ुद संविधान का क्या? हमारा संविधान बहुत बड़ा है और बहुत सारे अलग-अलग मुद्दों को नियमित करता है। संविधान निर्माताओं को भी यह पता था कि समय के साथ कुछ मुद्दों पर संविधान की धाराएं देश और नागरिकों के भले के लिए उचित नहीं रह जाएंगी। इसलिए संविधान में ख़ुद संविधान को बदलने का भी रास्ता है। लेकिन ये संविधान के अंदर रहकर क़ानून बनाने या बदलने से ज़्यादा मुश्किल है। यह सावधानी बरतना सही भी है। क्योंकि हमारे सांवैधानिक शासन-तंत्र में हर किसी को न्याय दिलाने के लिए संविधान ही हमारा आखिरी सहारा है। तो हर ऐरे-गैरे कारण पर हम संविधान नहीं बदलते रह सकते। लेकिन जब वाकई जनता की ज़रूरत हो तो बदलने का तरीका ज़रूर है।

तो ये बताइए कि क्या हम संविधान को बदल कर उसमें यह व्यवस्था कर सकते हैं कि फलां आदमी आज से हमारा राजा होगा। प्रधानमंत्री चुने नहीं जाएंगे, बल्कि इस राजा द्वारा अपनी मर्ज़ी से नियुक्त किये जाएंगे, राष्ट्रपति का पद हटा दिया जाएगा और यह राजा का पद वंशानुगत होगा?

क्या यह यह संभावना आपको मज़ाक लग रही है? ऐसा है तो कुछ दूसरे देशों की कहानियाँ सुनते है।

पहली कहानी है फ़्रांस की। अगर स्कूल में पढ़ाया गया विश्व इतिहास आपको थोड़ा भी याद हो फ्रांसीसी क्रांति याद होगी, जो कि 1789 में हुई थी, फ़्रांस के राजा के ख़िलाफ़। आपको नेपोलियन का नाम भी याद होगा, जो बाद में फ़्रांस के सम्राट बन गए थे और जिनके युद्धों ने कई योरोपी देशों की हालत ख़राब कर दी थी। नेपोलियन फ़्रांस के सम्राट् 1804 में बने थे। अब सोचिए कि जिस देश ने राजा को हटाने के लिए इतनी बड़ी क्रांति कर दी और जिसके लिए कई सारे लोगों की जानें गईं, पंद्रह सालों के अंदर वहाँ एक सम्राट् कैसे पैदा हो गया?

लोकतांत्रिक तरीकों से।

फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात् काफ़ी उथल-पुथल के बाद वहाँ गणतंत्र की स्थापना हुई थी। उस गणतंत्र के लिए कभी युद्ध करते हुए और कभी शांति स्थापित करते हुए नेपोलियन ने अपनी पहचान बनाई। लेकिन सम्राट् वह युद्ध करके नहीं बने। उसके लिए धीरे-धीरे अपनी पावर बढ़ाई, पहले खुद को गणतंत्र का पहला कंसुल नियुक्त करवाया और अंत में एक रेफ़रेंडम करवा कर ख़ुद को सम्राट् नियुक्त किया। रेफ़रेंडम से ज़्यादा लोकतांत्रिक और क्या हो सकता है?

दूसरी कहानी जर्मनी की है और वहाँ के भी एक बहुत प्रचलित व्यक्ति की है। हिटलर का नाम आज दुनिया में कौन नहीं जानता, भले ही बदनामी में जाने। हिटलर ने इटली के मुसोलिनी से प्रभावित होकर एक बार ज़बरदस्ती सत्ता हासिल करने की कोशिश की थी लेकिन बुरी तरह असफ़ल हो गये थे। इसके लिए उन्हें कुछ समय जेल में भी बिताना पड़ा था। उसके बाद उन्होंने निर्णय लिया कि लोकतांत्रिक तरीकों से ही सत्ता हासिल करेंगे। और ऐसा ही किया। लेकिन जब सत्ता हासिल हुई तो फिर संविधान का ही इस्तेमाल कर कर के ऐसे क़ानून पास किए और ऐसे बदलाव लाए कि जर्मनी के तानाशाह हो गए।

यहाँ पर ध्यान देने वाली दो बातें हैं। एक यह कि कई बार लोग ख़ुद ही या तो तानाशाही को चुनते हैं या चुप रह कर उसको आगे बढ़ने देते हैं। शायद उनकी चुप रहने की कोई व्यक्तिगत मजबूरी या भय होता है या तत्काल की परिस्थितियों से परेशान होकर उन्हें तानाशाही लोकतंत्र से बेहतर विकल्प लगने लगती है। लेकिन आख़िरकार लोकतंत्र को खो देने की मार पड़ती ही है। फ्रांस से नेपोलियन का साम्राज्य गया, और उसके बाद की उथल-पुथल में कभी राजतंत्र वापस आया, कभी गणतंत्र। सोचिये कि उस देश के लोगों की क्या हालत होगी जिसका शासन का तंत्र रोज़ बदलता रहे और कल तक जो चीज़ आपका हक़ थी, वह अचानक आज अपराध हो जाए? जर्मनी में नाज़ी शासन ने ऐसा कहर ढाया कि एक तरफ़ तो अपने ही नागरिकों की हत्या की और दूसरी तरफ़ हर देश से दुश्मनी। नतीजा हुआ द्वितिय विश्व युद्ध, उसमें मिली हार, और देश की बरबादी और विभाजन।

दूसरी बात यह है कि लोकतंत्र को खतरा हमेंशा बाहरी ताक़तों या मिलिट्री से नहीं होता है। जिन लोगों और सरकारों को हमने लोकतांत्रिक तरीकों से चुना है वे लोकतांत्रिक नियमों का गलत इस्तेमाल कर के ही लोकतंत्र का मज़ाक बना कर छोड़ सकते है या उसे पूरी तरह मिटा भी सकते हैं।
इसलिए लोकतंत्र को लेकर हम कभी असावधान नहीं रह सकते। सरकार के कामों पर नज़र रखना और हर परिस्थिति में लोकतंत्र की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। तभी हम अपने लिए और आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक न्यायपूर्ण समाज बना पाएंगे।

हमारे देश में लेकिन एक अच्छी व्यस्था है संविधान को बदलने के मामले में, जो कि दरअसल संविधान से नहीं आई है, बल्कि न्यायपालिका से आई है। इसे “बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन” कहते हैं। इस सिद्धांत के तहत विधायिका संविधान में कोई ऐसा परिवर्तन नहीं कर सकती जिससे संविधान का मूल स्वरूप (बेसिक स्ट्रक्चर) बदल जाए। अपने आप में यह एक बड़ा विषय है जिसमें कई मुद्दे विवादास्पद हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह है कि हम अपना संविधान बदल कर ख़ुद को गणतंत्र से राजतंत्र नहीं बना सकते, अपना कोई सम्राट् नहीं चुन सकते। अगर विधायिका ने ऐसा कुछ किया तो न्यायपालिका उसे रद्द कर सकती है।

इससे थोड़ी राहत की सांस ली जा सकती है। लेकिन याद रखिए कि क्या पता कल को कोई सरकार इस सिद्धांत को ही असंवैधानिक सिद्ध कर दे, या सत्ता के मद में इतनी चूर हो कि इसे नज़रअंदाज़ ही कर दे। चौकन्ना रहना हमेशा ज़रूरी है।

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