politics

बुनियादी बातें #4: क़ानून नए-पुराने

जब 1947 में हमने अंग्रेज़ो से पावर ली इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 के अंतर्गत, तब हमने अंग्रेज़ों के शासनतंत्र को ध्वस्त नहीं कर दिया। वैसा कुछ करना बेवकूफ़ी ही होती। क्योंकि इतना बड़ा देश चलता कैसे? संविधान तो हमने नया बनाया, लेकिन ये प्रशासनिक व्यवस्थाएं और कई तरह के क़ानून वही चलते रहे जो अंग्रेज़ों के ज़माने में थे। सबसे प्रचलित उदाहरण है इंडियन पीनल कोड, जिसके तहत सभी आपराधिक मामले तय किए जाते हैं। यह कानून 1862 से चला आ रहा है।

इसका मतलब यह नहीं कि कुछ भी नहीं बदला। ज़्यादातर चीज़ों में कुछ बुराई नहीं थी। कई अपराध हर तरह के शासन में अपराध ही माने जाएंगे, चाहे वह विदेशी शासन हो या फिर हमारा अपना गणतंत्र। प्रशासनिक व्यवस्था भी कई सालों से चल रही थी और चलती ही रहती। लेकिन कई क़ानून और व्यवस्थाएं ऐसी थीं जो कि हिन्दुस्तानियों को दबा कर रखने के लिए बनाई गई थीं। कुछ और ऐसी जो समय के साथ या तो गलत या अप्रासंगिक हो गई थीं। लेकिन अब हमारे पास उन्हें लोकतांत्रिक और सांवैधानिक तरीकों से बदलने का तरीका था। तो विधायिका के जरिए कई पुराने नियम हटाए गए, कई बदले गए और कई नए बनाए गए।

यह तो अच्छा था कि पहले के ही प्रशासन तंत्र और कानूनों को बनाए रख के हम देश की शासन-व्यवस्था को सुचारु रख पाए। लेकिन उसका एक असर यह भी हुआ कि जब तक एक गलत क़ानून बदला ना जाए तब तक उसका इस्तेमाल होता रह सकता है। अगर आपको पहले की बात याद हो तो हमने यह देखा था कि किस तरह सरकार या शासनतंत्र की पावर आम नागरिकों से हमेशा ज़्यादा होती है। इसलिए इसका नतीज़ा अक्सर यह होता है कि जो क़ानून अंग्रेज़ों ने हम हिन्दुस्तानियों को अपने नीचे दबाए रखने के लिए बनाए थे और जो एक लोकतांत्रिक, सांवैधानिक व्यवस्था में बिलकुसल असंगत हैं, उनका इस्तेमाल हमारा अपना ही शासनतंत्र अपनी शक्ति बनाए रखने के लिए आज भी नागरिकों के ख़िलाफ़ करता है।

ऐसा एक क़ानून सेडिशन (राजद्रोह) का है जो कि ब्रिटिश ज़माने के इंडियन पीनल कोड का हिस्सा है। यह क़ानून उस ज़माने का है जब अंग्रेज़ी सरकार भारतीयों को उनके लोकतांत्रिक हक़ नहीं देना चाहती थी। वह नहीं चाहती थी कि लोग सरकार के ख़िलाफ़ कुछ भी बोल पाएं या कर पाएं। लेकिन आज हमारा देश गणतांत्रिक और लोकतांत्रिक है। हमारे देश की पहचान और उसकी संप्रभुता हमारे नागरिकों में हैं, सरकार में नहीं। और सरकार हमारी मालिक नहीं हैं। सरकार का यह हक़ नहीं कि हम उसके ख़िलाफ़ कुछ ना बोलें। बल्कि हमारा यह हक़ है कि हम सरकार की आलोचना करें, उससे सवाल पूछें, ज़रूरत हो तो कार्यापालिका पर हर संभव दवाब डालें, उसे अदालत ले जाएं, और जो सरकार सही काम नहीं कर रही हो उसे सांवैधानिक तरीके से हटा दें। अगर हम सरकार के सर पर खड़े रहते हैं तो राजद्रोह नहीं कर रहे। बल्कि एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक होना का कर्तव्य निभा रहे हैं। देश और सरकार एक चीज़ नहीं हैं। देश और नागरिक एक चीज़ हैं। एक गणतांत्रिक-लोकतात्रिक देश में राजद्रोह के क़ानून के लिए कोई जगह नहीं हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश अभी तक इस क़ानून को हटाया नहीं गया है। शायद इसलिए कि कोई भी सरकार हो अपनी पावर नहीं खोना चाहती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भविष्य में यह बदल नहीं सकता। नागरिकों के जागरूक होने की ज़रूरत है और अपने प्रतिनिधियों से यह मांग करने की ज़रूरत है।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s