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बुनियादी बातें #3: शक्ति विभाजन और संतुलन

अब चलिए हमारा शासनतंत्र सांवैधानिक है। मतलब हमारे चुने हुए नेता, मंत्री, हमारी शासन व्यवस्था चला रहे ब्यूरोक्रैट, ये लोग हम पर राज नहीं कर सकते, अपनी मनमर्ज़ी नहीं चला सकते। उन्हें सांवैधानिक तरीके से काम करना होता है।

लेकिन जब एक बड़े, जटिल देश का काम चलाना है तो आप हर संभावना पहले से सोच कर संविधान में नहीं डाल सकते। सांवैधानिक सिद्धांतों के तहत काम करते हुए भी जो लोग शासनतंत्र चला रहे हैं उन्हें काफ़ी कुछ ख़ुद सोच कर करना पड़ता है। अगर उन्हें यह छूट नहीं दी जाएगी तो कभी कुछ काम हो ही नहीं पाएगा। तो यह छूट देनी ज़रूरी है। लेकिन यह छूट शासनतंत्र और उसमें शामिल लोगों को सांवैधानिक व्यवस्था में भी एक पावर देती है। और फ़िर से पावर के ग़लत इस्तेमाल की संभावना उठ खड़ी होता है। तो फिर इस बड़े से शासन तंत्र में लोग सब कुछ सही कर रहे हैं यह कैसे सुनिश्चित किया जाए? अगर शासनतंत्र के किसी हिस्से या किसी इंसान के ख़िलाफ़ कोई शिकायत है तो क्या गारण्टी है कि बाकी का शासनतंत्र उसके साथ खड़ा हो कर उसकी तरफ़दारी नहीं करेगा? आख़िर पावर बरकरार रखना किसे पसंद नहीं होता? इसलिए यह पूरी तरह संभव है कि लोकतांत्रिक होने के बावज़ूद भी शासनतंत्र अपने पावर का इस्तेमाल करके अपने सदस्यों के फ़ायदे के लिए काम करने लगे और देश के बाकी नागरिकों के ख़िलाफ़। इतना ही नहीं, यह भी संभव है कि वह न सिर्फ़ संविधान में दी गई छूट का ग़लत इस्तेमाल करे, बल्कि वह असंवैधानिक भी होता जाए ओर कोई उसका कुछ ना कर पाए क्योंकि संविधान की रक्षा भी तो उसी शासनतंत्र का काम है।

इस समस्या को ध्यान में रखते हुए ही संविधान ने शासनतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण व्यवस्था की है। वह है शासनतंत्र की विभिन्न शाखाएं बनाना और उन शाखाओं के बीच शक्ति का विभाजन करना। सबसे ऊँचे स्तर पर यह विभाजन विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का है। सांवैधानिक सिद्धांत ऐसे बनाने की कोशिश की गई हैं कि इनमें से एक शाखा दूसरे के ऊपर अनुचित प्रभाव नहीं डाल सकती है। और वे एक-दूसरे के काम पर नियंत्रण रखती हैं। अगर विधायिका कोई ऐसा कानून पास कर दे जो कि असांवैधानिक है तो न्यायपालिका उसे रद्द कर सकती है। लेकिन क़ानून बनाने का हक़ न्यायपालिका को नहीं है। इसी तरह कानून के तहत कार्यपालिका कई तरह के काम कर सकती है लेकिन कानून बनाने या बदलने के लिए उसे विधायिका के पास जाना पड़ेगा। विधायिका न्यायपालिका की जगह लेकर निर्णय नहीं सुनाने लग सकती। इस तरह से एक शक्ति संतुलन बरकरार रखने की कोशिश की गई है ताकि शासनतंत्र अनियमित तरीके से काम कर के देश के नागरिकों का ही शोषण ना करने लगे। इस मुख्य विभाजन के अलावा भी कई अलग-अलग संस्थाएं हैं जिनके काम में पावर में बैठे दूसरे लोग दख़लअंदाज़ी नहीं कर सकते। कोई संस्था राज्य सरकार के अंदर है तो कोई केंद्र के। भारतीय रिज़र्व बैंक के काम का अपना दायरा है और वित्त मंत्रालय का अपना। सीबीआई को एक तरह के मामले सौंपे जाते हैं और राज्य की पुलिस फ़ोर्स को दूसरे तरीके के। देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को भी यह हक़ नहीं है कि रिज़र्व बैंक, या पुलिस. या सीबीआई के काम में हस्तक्षेप करें या उन्हें अपना काम करने से रोकें।

यहाँ पर रुक कर दो बातों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगी।

पहली यह कि सैंद्धांतिक तौर पर लोकतंत्र लोगों की सरकार है। लेकिन व्यावहारिक तौर पर देश में दो समूह बन ही जाते हैं। शासक और शासित का। सरकार के पास ज़्यादा पावर होती है। विधायिका की कानून बनाने की पावर, कार्यपालिका की उन्हें लागू करने की पावर, न्यायपालिका की कानूनी विषयों पर निर्णय देने की पावर, पुलिस की आपको ग़िरफ़्तार करने की पावर, रिज़र्व बैंक की पैसों से संबंधित निर्णय लेने की पावर – इसी तरह पूरे शासनतंत्र के हर हिस्से को जोड़ कर देखें तो उनसे बनी सरकार के पास नागरिकों से ऊपर बहुत पावर होती है। इस पावर को नियमित करने के लिए व्यवस्थाएं है लेकिन किसी भी व्यवस्था से यह ख़त्म नहीं होती। इसका मतलब यह होता है कि अगर सरकार चाहे तो बिना किसी वजह के आपका जीना हराम कर सकती है। यह संभव है कि आखिरकार निर्दोष लोगों को इंसाफ़ मिल जाए। लेकिन एक रात गलत तरीके से पुलिस की हिरासत में रहना भी आपकी ज़िंदगी पर बहुत बुरा प्रभाव डाल सकता है। तो कहीं अगर महीनों और सालों तक आप सरकार के पावर का शिकार होते रहे तो आखिरकार अगर न्याय मिल भी गया, तब भी बहुत देर हो चुकी होगी। आपकी शिक्षा, आपकी नौकरी, आपका परिवार, आपकी भविष्य की आशाएं, सब कुछ तितर-बितर हो सकती हैं।

इसलिए यह ध्यान रखें कि सरकार और नागरिकों के रिश्ते में हक़ की बात हमेंशा नागरिकों के लिए होनी चाहिए। सरकार के पास वैसे ही बहुत पावर है, जिसे नियमित करते रहने की ज़रूरत है। सरकार को और कोई हक़ देने की ज़रूरत नहीं है। किसी को ग़िरफ़्तार करना पुलिस का हक़ नहीं है। यह पुलिस की पावर है जो तभी इस्तेमाल की जानी चाहिए जब उसकी ज़रूरत है। सिर्फ़ इसलिए कि पुलित उस पावर का इस्तेमाल कर सकती है, वह इस्तेमाल सही नहीं हो जाता। इसपर इतना ज़ोर इसलिए दे रही हूँ कि कई बार हम हाथ झटक कर बोल देते हैं कि ‘पुलिस को अपना काम करने दो’ या ‘सरकार को अपना काम करने दो’। पुलिस और सरकार का अपना काम करना ज़रूरी तो है ही। लेकिन यह संभावना हमेशा रहती है कि काम के नाम पर पावर का दुरुपयोग हो रहा है। तो अग़र कोई उसपर सवाल उठाता है, तो वह सवाल नाजायज़ नहीं है, बल्कि ज़रूरी है। उसे दबाने की कोशिश ना करें।

दूसरी बात यह है कि जब सरकार के पास पावर है इतनी तो उसे नियमित करने के लिए जो भी व्यवस्थाएं हैं, उनका सही से काम करना बहुत ज़रूरी है। जैसे कि सरकार की अलग-अलग शाखाओं के बीच शक्ति विभाजन। कुछ अच्छा करने के नाम पर भी हमें यह शक्ति विभाजन किसी को ख़त्म नहीं करने देना चाहिए। क्योंकि अगर आज एक काम सही हो भी गया, तब भी शक्ति विभाजन के ख़त्म होने से किसी एक व्यक्ति या शासनतंत्र के किसी एक हिस्से की पावर में जो बढ़ोतरी होगी, उसका गलत इस्तेमाल होना ही होना है।

मान लीजिए कि आज उच्चतम न्यायालय के जज यह निर्णय लेना चाहें कि देश का प्रधानमंत्री कौन होगा। आपको लगता है कि चुनावों की राजनीति के जरिए जो लोग प्रधानमंत्री बन रहे हैं वे ज़्यादा अच्छे नहीं हैं। और ये उच्चतम न्यायालय के जज जिसे प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं वह बेहतर है इस पद के लिए। तो इसलिए अगर हमने उच्चतम न्यायालय को देश का प्रधानमंत्री नियुक्त करने की पावर दे दी, तो हो सकता है कि आज वह वाकई एक अच्छा प्रधानमंत्री नियुक्त कर दें। लेकिन कल को वहाँ भाई-भतीजेवाद चालू हो जाएगा। जो ज़्यादा शक्तिशाली जज हैं वे अपने घरवालों को या अपने काम आनेवाले साथियों को प्रधानमंत्री बनाना शुरू कर देंगे। या फ़िर वे ऐसे लोगों को प्रधानमंत्री बनाएंगे जो उनके मुताबिक काम करे, देश की जनता के मुताबिक़ नहीं। हमारी कार्यपालिका न्यायपालिका के अधीन हो जाएगी और न्यायपालिका की पावर बढ़कर नागरिकों का शोषण करने लगेगी।

इसी तरह अगर कार्यपालिका को कानून बनाने की छूट मिल गई तो वह अपनी सुविधा के हिसाब से कानून बनाती जाएगी और वे कानून सही हैं या गलत ये सवाल कोई नहीं पूछ पाएगा। हो सकता है कि वह पुलिस की पावर इतनी बढ़ा दे कि देश के आधे लोग ग़िरफ़्तार हो जाएं। इतने लोग जेल के अंदर होंगे तो कई अपराधी भी अंदर पहुंच ही जाएंगे। तो शायद अपराध कम हो जाए और कार्यपालिका यह दावा करे कि उसका ख़ुद कानून बनाना अच्छा था। इससे अपराध कम हो गया। लेकिन उसके चक्कर में अपराधियों से कहीं ज़्यादा जो निर्दोष लोग अंदर चले गए, उनके बारे में सवाल उठाने का काम तो विधायिका का था। उसे वह मौका ही नहीं मिला। कल को कार्यपालिका अपना काम आसान करने के लिए और भी कई कानून बनाने लगेगी, जिससे नागरिकों का जीना हराम हो जाए।

तो इसलिए शासनतंत्र का कोई व्यक्ति या हिस्सा यदि अपने दायरे से बाहर जा रहा है तो उसे रोकना ज़रूरी है। उस क़दम के फ़ायदे गिनाकर उन्हें मनमर्ज़ी करने देना सही नहीं है।

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