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बुनियादी बातें #2: सांवैधानिक शासन

अपनी सरकार के बारे में और बात करते हैं। हमारा देश सिर्फ़ लोकतांत्रिक ही नहीं हैं बल्कि गणतांत्रिक (republic) भी है। गणतांत्रिक होने का मतलब है कि देश की संप्रभुता किसी एक व्यक्ति में निहित नहीं है, ना ही ये वंशानुगत है। सीधे शब्दों में हमारा मालिक कोई राजा नहीं है। हमारी संप्रभुता हमारे नागरिकों में निहित है। जिस व्यक्ति को हम अपने देश का प्रमुख (राष्ट्रपति) चुनते हैं वह हमारा मालिक नहीं बन जाता बल्कि हममे निहित देश की संप्रभुता का प्रतीकमात्र होता है। वह अपना पद अपने वंशजों को नहीं दे सकता है।

हमें आदत हो गई है इसकी, और इसलिए यह ज़्यादा बड़ी बात नहीं लगती। लेकिन सोच कर देखिए कि अंग्रेज़ों के पास भी गणतंत्र नहीं है। उनकी संप्रभुता उनके राजा या रानी में निहित है और वह पद वंशानुगत है। हमारी आज़ादी के बाद भी 26 जनवरी 1951 तक, जब तक हमने नए संविधान के तहत खुद को गणतंत्र नहीं घोषित किया था, हमारी रानी विक्टोरिया ही थीं, लंदन में बैठी हुई।

हालांकि बिना लोकतंत्र के किसी देश का सही मायनों में गणतंत्र होना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन बिना गणतंत्र के लोकतंत्र हो सकता है। इसको समझने के लिए परिभाषाओं की जगह उदाहरण ही लेकर चलते हैं। अंग्रेज़ों की सरकार टेक्निकली “कॉन्सटिट्यूशनल मॉनार्की” है – सांवैधानिक राजतंत्र। सांवैधानिक शब्द महत्वपूर्ण है। इसका मतलब है कि राजा या रानी देश के प्रमुख भले ही हों, लेकिन जो मर्ज़ी आए वह नहीं कर सकते। देश की सरकार संविधान के हिसाब से चलेगी। और उस संविधान के हिसाब से राजा या रानी के पास ज़्यादा पावर नहीं है। देश का अधिकतर काम लोकतांत्रिक तरीकों से चुनी गई सरकार चलाती है और वह सरकार भी संविधान का पालन करते हुए ही काम करती है। सांवैधानिक होने की वजह से अंग्रेज़ों की सरकार अगर गणतांत्रिक नहीं भी है तो ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता। क्योंकि राजपरिवार के लोग अपनी मनमर्ज़ी नहीं कर सकते और शासनतंत्र लोकतांत्रिक तरीकों से नागरिकों के लिए ही चलता है।

लेकिन सांवैधानिकता सिर्फ़ राजतंत्र को नियमित करने के लिए ही ज़रूरी नहीं है। हमारा गणतंत्र और लोकतंत्र भी सांवैधानिक हैं। हम अपने नेताओं को सांवैधानिक तरीके से चुनते हैं। और चुने जाने के बाद भी वे जो मन में आए वह नहीं कर सकते। उन्हें संविधान के तहत काम करना होता है।

अब ज़रा इस पर विचार करें कि सांवैधानिकता क्यों महत्वपूर्ण है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि शासनतंत्र को चलाने के लिए लोगों को कैसे भी चुना जाए, वे हमेशा सब-कुछ सही नहीं करेंगे। लोकतांत्रिक सरकार हो या किसी और तरीके की सरकार, जो लोग शासनतंत्र का हिस्सा होते हैं उन्हें पावर मिलती ही मिलती है। और जब इंसान को पावर मिलती है तो उसके दुरुपयोग की संभावना होती ही होती है। सांवैधानिकता उस संभावना को कम करने का तरीका है। अगर आपने बहुत आदर्श इंसान भी चुना हो किसी पद के लिए, फिर भी रक्षा में हत्या हो सकती है उससे। आखिर इंसान ही हैं। आम जीवन में भी कई बार ऐसा होता है कि आप कोई काम बहुत अच्छे इरादे से करते हैं लेकिन उसका परिणाम बहुत गलत हो जाता है। तो शासन चलाने वाला अच्छे से अच्छा इंसान भी अगर अपनी मनमर्ज़ी से काम कर रहा है तो भयानक गलतियां कर सकता है जिसका ख़ामियाज़ा ढेर सारे लोगों को भुगतना पड़ सकता है। और अगर उसके इरादे ही गलत हों तब तो मुसीबत होनी ही है। इसलिए सांवैधानिकता यह सुनिश्चित करती है कि सरकार का सारा काम सांवैधानिक सिंद्धांतों और नियमों को मुताबिक़ हो, किसी की मनमर्ज़ी से नहीं।

संविधान और शासनतंत्र के और भी कई पहलुओं पर बात की जा सकती है, लेकिन अभी के लिए हम यहाँ पर रुकते हैं और देखते हैं कि ये नागरिक-शास्त्र (civics) की कक्षा मैंने यहाँ क्यों लगाई हुई थी। एक महत्वपूर्ण बात पर ध्यान आकर्षित करवाना चाहती हूँ।

वह बात यह है कि सांवैधानिक लोकतांत्रिक शासनतंत्र में – चाहे वह गणतंत्र हो, या राजतंत्र हो – सरकार के पास पावर भले ही हो, लेकिन यह मान कर नहीं चला जाता कि उन्हें उस पावर को जैसे चाहें, वैसे इस्तेमाल करने की छूट है। यह भी मानकर नहीं चला जाता कि शासन व्यवस्था चलानो वालों के पास कोई दैवीय ज्ञान होता है सही और गलत का। शासनतंत्र और नागरिकों के बीच का रिश्ता मां-बाप और बच्चों के रिश्ते की तरह नहीं है। यह मानकर नहीं चला जाता कि सरकार जो भी सोचती है, जो भी करती है, हमारे लिए अच्छा ही होगा। (कुछ लोग कहेंगे कि मां-बाप और बच्चों के रिश्ते में भी ऐसा मान बैठना नासमझी है, लेकिन उसपर कभी फिर बात करेंगे।) यह रिश्ता तानाशाही राजा और प्रजा का रिश्ता भी नहीं है, जिसमें राजा मालिक होता है और प्रजा को उसकी हर आज्ञा को सर-आँखों पर लेना पड़ता है। नागरिकों और सरकार के रिश्ते को समझना बहुत ज़रूरी है। सरकार हमारे लिए मां-बाप नहीं है। हमारी माई-बाप (मालिक) भी नहीं हे।

चूंकि हमारी संस्कृति में अपने से बड़े या अपने से ऊपर के लोगों को सम्मान देना, यहाँ तक कि अंधा सम्मान देना, ज़रूरी माना जाता है, लोग अक्सर शासनतंत्र के साथ या अपने नेताओं के साथ भी वैसा ही करना उचित समझते हैं। सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना गलत समझते हैं। अपने नेताओं से कठिन सवाल पूछना गलत समझते हैं। ये सब सही नहीं है। शासनतंत्र में बैठे लोग भी इंसान हैं। उन्हें पावर दी गई है क्योंकि समाज को चलाते रखने के लिए कुछ लोगों का शासन चलाना ज़रूरी है। उस पावर पर या हमारी ज़िंदग़ी पर उनका कोई दैवीय अधिकार नहीं हैं। वे हम पर राज करने नहीं बैठे हैं। बल्कि सांवैधानिक तरीकों से हमारे प्रतिनिधि के रूप में देश का काम चलाने बैठे हैं। वे इस देश के आम नागरिक से ऊपर नहीं हैं। क्योंकि वे प्रधानमंत्री हैं, राष्ट्रपति हैं, बड़े ब्यूरोक्रैट हैं, कोई मंत्री, या सांसद या विधायक हैं, किसी भी चीज़ की वजह से उनका हमसे ज़बरदस्ती इज़ज्त लेने का अधिकार नहीं है। जिनको उनका काम पसंद आए, या जिनकी मर्जी हो, वे उनकी इज़्जत करे, जिनको ना करना हो वे ना करे। लेकिन क्योंकि यह लोकतंत्र है, और हमारा संविधान ऐसा कहता है, हर नागरिक को उनसे सवाल पूछने का हक़ ज़रूर है। और सवाल पूछने के हक़ के लिए हमें उनके लिए वोट करने की, उनके सामने सर झुकाने की, या कुछ भी और करने की ज़रूरत नहीं है। अग़र हम नागरिक हैं और वे शासनतंत्र का हिस्सा हैं तो सवाल पूछना हमारा हक़ है।

अगर ये बातें हम भूल जाते हैं, अगर सरकार और सरकारी लोगों को मालिक समझ कर उनके सामने सिर झुकाते हैं, उनकी असंवैधानिक तानाशाही बर्दाश्त करने के लिए तैयार हो जाते हैं, तो बहुत मुश्किल से मिले अपने अधिकारों की उपेक्षा करने की, उन्हें कमज़ोर करने की बहुत बड़ी गलती करते हैं।

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