Own Poetry Hindi

देवी

तुम्हें देवी का दर्ज़ा दिया है ना हमने?

तो देवी!

तुम मंदिर में रहो।
जिसका हम अपनी सुविधा से
दरवाज़ा दोपहर में बंद कर के
अपनी नींद पूरी करने जा सकें।

और रात में जहाँ मर्ज़ी हो
जाकरअपनी हवस बुझा सकें।

और सुबह माथा टेक कर मंदिर में
करनी का बोझ भुला सकें।

देवी!

तुम सड़कों पर मत आओ,
हमारे किये की याद मत दिलाओ,
जवाब के लिए आवाज़ मत उठाओ।

क्योंकि मंदिर का नहीं भी सही,
पर जेल का दरवाज़ा तो है ही।
और वह चौबीस घण्टे बंद रहता है।
और तुम्हें मंदिर की मूरत से भी
ज़्यादा मूक कर सकता है।

देवी!

अपने घर वापस जाओ।
समाज को आईना मत दिखाओ।

3 thoughts on “देवी

      1. thanks that you’re replied. I was amazed when I saw your archive that you’re blogging since 2004. I was started blogging in 2013.
        crapauthor.blogspot.in

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