Feminism · Thoughts

क्या #MeToo का जवाब भारतीय संस्कृति है?

ट्विटर पर #MeToo ने कहर मचाया हुआ है। कुछ लोग खुश हैं कि आख़िरकार हमारे समाज का भयावह चेहरा सामने आ गया है और आगे कुछ बेहतर होगा। कुछ लोग बहुत ही परेशान हैं और इन सब आरोपों के सबूत ढूँढ़ते फिर रहे हैं। कुछ लोग #MeToo में भाग लेने वाली महिलाओं को ग़लत साबित करने में, उन्हें गालियाँ और तरह-तरह की धमकियाँ देने में व्यस्त हैं। लेकिन थोड़े लोग ऐसे भी हैं जो कि बड़े आत्मसंतुष्ट हैं। ये संस्कारी लोग हैं। नहीं, नहीं, मैं आलोक नाथ का बिलकुल भी मज़ाक़ नहीं उड़ा रही! ये वे लोग हैं जिन्हें भरोसा है कि दुनिया में जो भी समस्याएं हैं, वे इसलिए हैं कि हम भारतीय संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। इसलिए उनका मानना है कि जो ये यौन शोषण और उत्पीड़न की घटनाएँ सामने आ रही हैं, वह भी इसलिए हैं कि हम अपने संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं।

तो इसलिए मैंने सोचना शुरु किया कि क्या भारतीय संस्कृति के पास वाक़ई #MeToo का जवाब है?

(दरअसल मैंने अभी सोचना नहीं शुरु किया है, काफ़ी समय से सोचा हुआ है। लेकिन कुछ लोगों को शायद अच्छा लगे कि उन्होंने किसी को भारतीय संस्कृति के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। इसलिए ऊपर ऐसा लिख दिया मैने।)

तो क्या भारतीय संस्कृति #MeToo का जवाब हो सकती है? कई पहलू हैं। एक-एक करके विचार करते हैं।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः

ऐसे कुछ-एक श्लोकों के साथ हमारा दावा यह होता है कि भारतीय संस्कृति नारियों की पूजा करती है, वह उनका अपमान नहीं कर सकती। अब इसपर शास्त्रीय बहस हो सकती है कि जो लिखा गया उसका क्या मतलब है? और क्या-क्या लिखा गया? उन सबको मिलाकर उस ज़माने के समाज की क्या तस्वीर बनती है। लेकिन मैं इस शास्त्रीय बहस में नहीं जाना चाहती। बस एक तुर्रा छोड़ देती हूँ कि जरा यह सोचिए कि नारियों के लिए खास कर के ऐसे श्लोक लिखने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी? कई अन्य श्लोक भी हैं जिनमें नारियों को खुश रखने की गुज़ारिश की गई है। क्यों करनी पड़ी ये ख़ास गुज़ारिश? शायद इसलिए कि नारियों की हालत उस समाज में भी अच्छी नहीं थी।

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लेकिन अगर मेरे तुर्रे से आप सहमत नहीं भी है तो कोई बात नहीं। क्योंकि तब क्या था इससे मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता है। आज श्लोक सुनकर किसका पेट भरता है? और पूजा किसे करवानी है? ढोंगी बाबाओं को अपनी पूजा करवाने का शौक होगा। एक आम इंसान को, स्त्रियों को भी, आम जीवन में सुख, शांति, खुशियाँ, स्वतंत्रता, सम्मान और जीने का हक़ चाहिए होता है। किसी जीते -जागते इंसान को देवी-देवता बनाना और पूजा के कमरे में बंद कर देना उसके साथ नाइंसाफ़ी ही होगी। भ्रूण-हत्या करने के बाद, ज़िंदा रहने दिया तो क़दम-क़दम पर उन्हें पीछे खींचने के बाद, उनके आने-जाने पर रोक-टोक लगाने के बाद, बाहर निकली तो उन्हें शर्मिन्दा करने के बाद, श्लोकों में नारियों की पूजा कर के हम कौन सा धमाल मचा देंगे?

नारियों की पूजा करने से नारियों का कोई भला नहीं होता है।

संस्कारी भारतीय पुरुष नारियों की रक्षा करते हैं।

क्यों करनी पड़ती है रक्षा? आप कहेंगे कि आज-कल ग़ैर-संस्कारी लोगों से करनी पड़ती है। लेकिन संस्कृति तो पुरानी है ना? और जिन जगहों पर सब पुराने संस्कारों वाले लोग रहते हैं, वहाँ ये बात और भी ज़ोर-शोर से कही जाती है। क्या दर्शाता है यह हमारे समाज की स्थिति के बारे में। पहली तो यह कि स्त्रियाँ सुरक्षित नहीं है। दूसरी यह कि उन्हें अपनी सुरक्षा करना सिखाया नहीं जाता।

इस विचारधारा का परिणाम ये होता है कि अगर कोई पुरुष नहीं है उसकी रक्षा करने के लिए तो ये मान लिया जाता है कि नारी खतरे में पड़ेगी ही। तो ये नारी की गलती हो जाती है कि बिना पुरुष की सुरक्षा के उसने कुछ किया या कहीं गई। नारी को सब शर्मिन्दा करते हैं। उसपर हमला करने वाले को कोई शर्मिन्दा नहीं करता।

यह कैसा समाज है? क्यों नारियों को इस विशेष सुरक्षा की ज़रूरत है। कितने भारतीय पुरुष आज की तारीख में प्रशिक्षित योद्धा हैं? आम पुरुष तो नहीं है। तो जहाँ इन पुरुषों को अंगरक्षक लेकर चलने की ज़रूरत नहीं पड़ती, वहाँ नारियों को इसकी ज़रूरत क्यों पड़ती है? आज के ज़माने में ज़्यादातर पुरुष युद्ध कर के अपनी रक्षा नहीं करते। उन्हें भरोसा होता है कि इसकी ज़रूरत नहीं है। समाज के नियम और देश का क़ानून उनकी रक्षा करते हैं। देश का, समाज का जो क़ानून इन पुरुषों की रक्षा कर सकता है, वह स्त्रियों के लिए काफ़ी क्यों नहीं है? और अग़र नहीं ही है तो बनाओ उसे और मजबूत।

भारतीय संस्कृति नारियों को सुरक्षा नहीं देती। पुरुषों को उनका रक्षक बनाकर वह इन सवालों से अपने हाथ धो लेती हैं। और जो पुरुष उन्हीं नारियों का शोषण करते हैं, उनके साथ हिंसा करते हैं, उन्हें भी अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त कर देती है। बल्कि उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, बढ़ावा देती है, कि करो नारियों पर हमला। एक नारी ने बिना किसी पुरुष का सहारा लिए कुछ करने की कोशिश की है। तो उसे सबक सिखाओ और अपनी जगह दिखाओ।

और ऐसा नहीं है कि जिन पुरुषों को रक्षा की ज़िम्मा दिया गया है, वे ही भक्षक नहीं बन जाते। मुझसे बहस करते समय आप उन्हें ग़ैर-संस्कारी बता कर उनसे पल्ला झाड़ लेंगे। लेकिन तब भी असल जीवन में उन पुरुषों को भी कोई सज़ा नहीं देता। स्त्री को सब चुप करा देते हैं।

तो माफ़ कीजिए। पुरुषों को नारी की सुरक्षा का ज़िम्मा देकर भारतीय संस्कृति नारियों की रक्षा नहीं करती। बल्कि वह यह मान लेती है कि समाज नारियों के लिए सुरक्षित नहीं हो सकता। वह उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेने से इंकार करती है।

संस्कारी भारतीय नारियाँ ख़ुद को खतरे में नहीं डालती।

वे आधुनिक, कामकाज़ी नारियों की तरह पुरुषों से अकेले मिलने नहीं जाती, शराब नहीं पीती, इत्यादि इत्यादि।

कुछ समस्याएँ हैं इस तर्क में। एक ये कि जो नारियाँ ना बाहर काम करने जाती हैं, ना शराब पीती हैं, वे भी सुरक्षित नहीं हैं। अगर आप संस्कारी वातावरण में रहते हैं तो अपने आस-पास की घटनाओं पर भी थोड़ी गहरी नज़र डालें। ना ही आधुनिक समाज में सारे हमले शराब पी हुई स्त्रियों पर होते हैं। और शराब हो भी तो अगर एक शराब पिए हुए पुरुष के साथ कोई बदतमीज़ी नहीं करता, तो स्त्रियों के साथ करने की भी कोई वजह नहीं है। इस तरह के तर्कों को विक्टिम-ब्लेमिंग कहते हैं। यानि कि अपराध की ज़िम्मेदारी पीड़ित इंसान पर डाल दी जाती है, बजाय अपराधी के ऊपर डालने के। ऐसे तर्कों का एक आधुनिक, सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं है। जो संस्कृति नारियों के हर काम में, हर बात में ऐब ढूँढ़ना चाहती है, उन्हें खुल कर जीने देने की बजाय उनके पैरों में संस्कारों के नाम की बेड़ियाँ बाँध देना चाहती है, वह #MeToo का कारण है, उसका समाधान नहीं। जेल में बंद होकर सुरक्षित रहना किसी का सपना नहीं होता। हमें घर में, सड़कों पर, ऑफ़िस में, बाज़ार में, बस, रेल या मेट्रो में, पार्टियों में, यहाँ तक की शराब वाली पार्टियों में, कहीं भी स्त्री-मात्र होने की वजह से असुरक्षित महसूस करना स्वीकार्य नहीं है।

जिस संस्कृति के पास इसका समाधान हो, वह अपना डंका पीटे। अन्यथा #MeToo को स्वीकार करे।

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