Own Poetry Hindi

सफ़ल कलम

एक कलम थी
बड़ी सफ़ल थी।
सब उसका लिखा पढ़ते थे
बड़ी वाहवाहियाँ करते थे।

एक दिन वो मुझे मिली,
कोई घमंडी भी नहीं लगी।
तो हिम्मत करके मैंने पूछा,
“बहन, कैसे ऐसा करती हो?
ज़ुल्मों का रोना भरती हो,
लेकिन ज़ुल्मी भी उसपर फ़िदा हैं,
मैं नहीं पूरा बाज़ार गवाह है।”

सुनकर वो हँसी,
हंसी थी बड़ी तीखी।
और मेरे सवाल पर
वो आश्चर्यचकित नहीं थी।
“तुम्हें राज़ अपना बताती हूँ।
पूछी है पते की बात तुमने,
तुमसे नहीं छिपाती हूँ।
व्यथाओं पर आहें भरना
सबको अच्छा लगता है।
आहें भर कर ज़ुल्मी भी
ख़ुद को हमदर्द समझता है।
पर क्या देखा नहीं तुमने,
मैने कभी इंसाफ़ नहीं मांगा।
व्यथाएं सुनाई बस
बदलाव नहीं मांगा।
अगर मांगा होता तो
आहें भरने वालों के
रास्ते में आती।
उनका दिन ख़राब होता
नींदें उड़ जाती।

कोई नहीं होता फिर
जो आहें भरता।
ना ही कोई होता
कि वाहवाहियां करता।
सफ़लता फिर मेरी
गोद में ना आती।
स्याही छिन जाती मेरी
मैं मार दी जाती।”

मेरा भौंचक्का चेहरा देख
वो फिर ज़ोर से हंसी।
और हंसते-हंसते यों ही
अपने रास्ते चल दी।

Photo by rawpixel.com on Unsplash

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2 thoughts on “सफ़ल कलम

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