Own Poetry Hindi

यहाँ सोचना गुनाह है।

यहाँ सोचना गुनाह है।

झुका सर, नपे कदम,
उनकी राह चलें जो हम,
वही सही राह है।

यहाँ सोचना गुनाह है।

तुम्हारे दिमाग के कीड़े
उनके नाज़ुक दिल को ना छेड़ें,
लगती बुरी उनकी आह है।

यहाँ सोचना गुनाह है।

पूछो ना कोई सवाल
तुम ठहरे जयचंद के लाल।
उसकी किसे परवाह है?

यहाँ सोचना गुनाह है।

पत्थर चुभते नहीं,
बर्फ पिघलती नहीं,
जो उन्होंने कहा
तो आग जलती नहीं।
तलवार उनके हाथ में
मगर मज़लूम वही हैं।
तुम्हारे सुबूत ओ सुराग
किसी काम के नहीं है।
मुक़दमा चल चुका है
फ़ैसला फरमाया है,
पूछो नहीं कि कौन सी
अदालत ने सुनाया है।
बस इतना काफी है कि
उनका इतिहास गवाह है।

यहाँ सोचना गुनाह है।

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3 thoughts on “यहाँ सोचना गुनाह है।

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