Durga Chalisa

I have grown up with Durga Pooja being the most important festival. Things are different now, but as a kid I remembered Durga Chalisa by heart🙂 Remembering the good old days

नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥
निराकार है ज्योति तुम्हारी ।
तिहूं लोक फैली उजियारी ॥

भाल शशि मुख महा विशाला ।
नेत्र लाल भृकुटी विकराला ॥
रुप मातु को अधिक सुहावे ।
दरश करत जन अति सुख पावे ॥

तुम संसार शक्ति लय कीना ।
पालन हेतु अन्न धन दीना ॥
अन्नपूर्णा हु‌ई जग पाला ।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी ।
तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें ।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥

रुप सरस्वती को तुम धारा ।
दे सुबुद्घि ऋषि मुनिन उबारा ॥
धरयो रुप नरसिंह को अम्बा ।
प्रगट भ‌ई फोड़ि के खम्भा ॥

रक्षा करि प्रहलाद बचायो ।
हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो ॥
लक्ष्मी रुप धरो जग माही ।
श्री नारायण अंक समाही ॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा ।
दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।
महिमा तव न जाय बखानी ॥

मातंगी अरु धूमावति माता ।
भुवनेश्वरि बंगला सुखदाता ॥

श्री भैरव तारा जग तारिणि ।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥
केहरि वाहन सोह भवानी ।
लांगुर वीर चलत अगवानी ॥

कर में खप्पर खड्ग विराजे ।
जाको देख काल डर भाजे ॥
सोहे अस्त्र और तिरशूला ।
जाके उठत शत्रु हिय शूला ॥

नगर कोटि में तुम्ही विराजत ।
तिहूं लोक में डंका बाजत ॥
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे ।
रक्तबीज शंखन संहारे ॥

महिषासुर दैत्य अभिमानी ।
जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥
रुप कराल कालिका धारा ।
सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥

परी गाढ़ सन्तन पर जब जब ।
भ‌ई सहाय मातु तुम तब तब ॥
अमरपुरी अरु बासव लोका ।
तव महिमा सब रहें अशोका ॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।
तुम्हें सदा पूजें नर नारी ॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावै ।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवे ॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन ला‌ई ।
जन्म-मरण ताको छुटि जा‌ई ॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी ।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥

शंकर आचारज तप कीनो ।
काम क्रोध जीति सब लीनो ॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।
काहू काल नहिं सुमिरो तुमको ॥

शक्ति रुप को मरम न पायो ।
शक्ति ग‌ई तब मन पछतायो ॥
शरणागत हु‌ई कीर्ति बखानी ।
जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥

भ‌ई प्रसन्न आदि जगदम्बा ।
द‌ई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो ।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥

आशा तृष्णा निपट सतावे ।
रिपु मूरख मो कह डर पावे ॥
शत्रु नाश कीजै महारानी ।
सुमिरों इकचित तुम्हें भवानी ॥

करहुँ कृपा हे मातु दयाला ।
ऋद्घि सिद्घि दे करहु निहाला ॥
जब लगि जियौं दया फल पा‌ऊँ ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुना‌ऊँ ॥

दुर्गा चालीसा जो नित गावै ।
सब सुख भोग परम पद पावै ॥
देवीदास शरण निज जानी ।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥

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About Jaya

Jaya Jha is an entrepreneur, a techie, a writer and a poet. She was born and brought up in various towns of Bihar and Jharkhand. A graduate of IIT Kanpur and IIM Lucknow, she realized early on that the corporate world was not her cup of tea. In 2008, she started Pothi.com, one of the first print-on-demand publishing platform in India. She currently lives in Bangalore and divides her time between writing and working on her company's latest product InstaScribe (http://instascribe.com) with a vision to make it the best e-book creation tool. Blog: https://jayajha.wordpress.com Twitter: @jayajha Facebook: http://facebook.com/MovingOnTheBook

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