“आइए बेग़म। बड़ा ही प्यारा शेर पढ़ रहे हैं हम। आप भी लुत्फ़ उठाइए।”
नूरी एक बार फिर भौंचक्की सी रह गई। उसकी समझ में नहीं आता था कि उसका शौहर आख़िर किस मिट्टी का इंसान है। वह उसके साथ शेर-ओ-शायरी पढ़ना चाहता था, उस्तादों की बनाई तस्वीरों पर चर्चा करना चाहता था, गायकी के सुर और ताल के बारे में बातें करना चाहता था। शौहरों की ऐसी ज़रूरतों के बारे में उसकी अम्मी, बड़ी बहनों और भाभियों ने उसे कुछ नहीं बताया था। शौहर को रिझाने और जनाने में अपनी जगह बना कर रखने की तरक़ीबें उसने सीखी थीं। लेकिन गाना-बजाना तो तवायफ़ों का काम होता है। शरीफ़ औरतों को उनके बारे में क्यों पता होने लगा? शेर-ओ-शायरी और तस्वीरों के बारे में जानकारी रखना कहाँ औरतों का काम था?
जब भी ऐसी अजीब सी फरमाइशें नवाब साहब उसके सामने रखते थे, उसका दिल एक अनजाने डर से भर जाता था। क्या वह उन्हें रिझाने में क़ामयाब नहीं हो पाई है? क्या उसे देखकर उनके दिल में ख़्वाहिशें नहीं उठती हैं?
फिर भी वह जाकर उनके क़रीब बिस्तर पर बैठ गई। कुछ देर तक बेमन से वे शेर सुनती रही जो नवाब साहब काफ़ी लुत्फ़ लेकर पढ़ रहे थे। नवाब साहब को यह अहसास होते देर नहीं लगी कि उनकी बेग़म को मज़ा नहीं आ रहा था। कोई नई बात नहीं थी, लेकिन फिर भी उनके चेहरे पर निराशा एक पल के लिए ज़ाहिर थी। मग़र बस एक पल के लिए। फिर उन्होंने क़िताब बंद कर के रख दी और शमाँ बुझाकर नूरी को बाँहों में ले लिया।
अब नूरी को अपनी ज़िम्मेदारी पता थी।
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नवाब सफ़दर अपनी बेग़म के लिए अपने अहसासों को बहुत अच्छी तरह से समझ नहीं पाते थे। उनकी अम्मीजान के हिसाब से वह एक अच्छी बीवी थी। और जो क़सौटी उनकी अम्मीजान उनके सामने रखती थीं, उसके हिसाब से वह भी कोई और फ़ैसला नहीं कर सकते थे। वह उनका ख़याल रखती थी। उनकी हर बात को सर-आँखों पर लेती थी। नवाब साहब अग़र दिन को रात कहें तो वह शायद उसे भी मान लेती। उनकी जिस्मानी ज़रूरतों को बहुत अच्छी तरह से समझती थी, उनके गुस्से को समझती थी। एक नवाबी ख़ानदान की बहू होने की सारी खूबियाँ थी उसमें और जो चीज़ें औरतों को नहीं करनी चाहिए, उनमें से कुछ भी करने की सोचती भी नहीं थी।
अच्छी बीवी थी वह। लेकिन…
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नवाब सफ़दर जब सत्रह साल के थे तब उनके हम-उम्र भाई और दोस्त उन्हें मर्दानग़ी और नवाबों की शान का हवाला दे कर शहर के एक मशहूर कोठे पर ले गए थे। लेकिन सफ़दर वहाँ ज़्यादा देर रुक नहीं पाए थे। वे अपनी अम्मीजान के बहुत क़रीब थे और अपने अब्बाजान की उनको लेकर ज़िन्दग़ी भर की बेरुख़ी के असर को बहुत शिद्दत से महसूस किया था। बचपन से ही अपने अब्बाजान की तरह ना बनने का फ़ैसला किया था उन्होंने। ऐसा नहीं है कि जवानी की ज़रूरतों ने उन्हें लालच ना दिया हो; और दोस्तों के मज़ाक पर ध्यान नहीं देना भी आसान नहीं था। लेकिन कुछ ही दिनों में उनका निक़ाह होने वाला था। नूरी के साथ। अम्मीजान की पसंद थी वह। उसके साथ सफ़दर कभी भी वैसा कुछ नहीं होने देंगे, जैसा उनकी अम्मी के साथ हुआ था।
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और उस रात तक, तवायफ़ों की सोहबत के नवाबी शौक से अपने आप को दूर रखने में वे क़ामयाब भी हुए थे। लेकिन उस रात, अपने अजीज़ दोस्त के यहाँ सजी महफ़िल में कुछ बदल गया। उन्होंने निक़हत - निक़हत जान - को शेर पढ़ते हुए सुना उस महफ़िल में। जब निक़हत महफिल में तशरीफ़ लाई तो सफ़दर चौंक गए। दो पल के लिए उन्हें समझ में भी नहीं आया कि क्या करना है। मर्दों की महफ़िल में एक औरत का यों धड़ल्ले से चले आना और वह भी बिना परदे के? उनकी समझ में कुछ आता, इससे पहले ही उन्हें यह अहसास हुआ कि वे अकेले हैं, जिन्हें कुछ अजीब लग रहा है। बाकी लोगों की इस औरत के साथ बड़ी बे-तक़ल्लुफ़ी से दुआ-सलाम चल रही था। लोग उनकी ख़ुशामदीद करने के लिए आगे भी बढ़ गए थे। आख़िरकार माहौल थोड़ा शांत हुआ तो निक़हत की नज़र उनपर पड़ी। झिझक और अचरज साफ दिखी उसकी आँखों में एक पल के लिए। फिर जल्दी ही ख़ुद को सँभाल कर वह आगे बढ़ी और नवाब सफ़दर की और देखते हुए थोड़ा झुक कर बोली, “आदाब नवाब साहब।”
सफ़दर अभी भी नहीं समझ पा रहे थे कि क्या करें। उनके मेजबान ने मौके को सँभाल लिया। बोले, “इनसे तो आपकी पहचान करवानी पड़ेगी निक़हत जान।”
यह सुनकर नवाब साहब को समझ में आया कि उनके सामने एक तवायफ़ खड़ी थी।
निक़हत ने बिना एक पल गँवाए मेजबान को जवाब दिया, “इनकी पहचान की ज़रूरत हमें नहीं है हुज़ूर। हाँ, ये हमारे बारे में कुछ नहीं जानते होंगे। तो इन्हें बताने की तोहमत आपको उठानी पड़ेगी।”
मेजबान चौंक पड़ा, “आप इन्हें पहचानती हैं? पर कैसे? ये तो कभी…”
निक़हत ने उनकी बात बीच में काट कर कहा, “तशरीफ़ नहीं लाते हम जैसों के यहाँ। लेकिन हुज़ूर किसी का हमेशा होना उसे पहचाना सा बना देता है, तो किसी का कभी ना होना भी उसकी ऐसी पहचान बनाता है कि हर कोई उसे पहचानता है। क्यों नवाब सफ़दर साहब?”
मेजबान ने कहा, “अब आपसे तो बातों में कौन ही जीतेगा निक़हत जान।”
उसके बाद मेजबान ने नवाब सफ़दर को जो बताया निक़हत के बारे में, उससे उन्हें पता चला कि निक़हत उस शहर में ही नहीं, काफ़ी दूर-दूर तक मशहूर थी। और चर्चा उसकी ख़ूबसूरती और अदाओं की उतनी नहीं थी, जितनी उसकी शायरी और गायकी की थी। न चाहते हुए भी सफ़दर को कौतूहल हुआ निक़हत के बारे में और जानने का। लेकिन उन्होंने ख़ुद को ज़ब्त किया। उसके बाद जब सब लोग बैठे तो मानो उनके तक़ल्लुफ़ का पूरा मज़ा उठाने के लिए निक़हत नवाब सफ़दर के बग़ल में आ कर बैठ गई।
शायरी का दौर शुरु हुआ। जब नवाब सफ़दर की बारी आई, तो उन्होंने ये शेर पढ़ा,
आशिक समझा हमें ख़ुदा भी समझा,
ग़म ये कि उसने इन्सान ना समझा।
फिर निक़हत की बारी आई। तो वह थोड़ी देर चुप रही, कुछ सोचती हुई सी। किसी ने टोका, “क्या बात है निक़हत जान? ऐसा क्या हुआ कि आप अपने शेर भूल गईं?”
निक़हत ने कोई जवाब नहीं दिया। फिर नवाब सफ़दर की आँखों में सीधे देखते हुए ये शेर पढ़ा,
इन्सानों की पहचान रखते हैं जो उनके
पहलू में आने की बात इन्सान ना समझा।
सफ़दर सोच में डूब गए। महफ़िल ख़तम हो जाने के बाद भी वह निक़हत के बारे में सोचने से ख़ुद को रोक ना सके। उस रात पहली बार नूरी ने महसूस किया कि नवाब साहब उसके पास होकर भी कहीं और थे।
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उस रात के अपने मेजबान दोस्त की महफ़िल में अब वे अक्सर जाने लगे। निक़हत से बेतक़ल्लुफ़ी बढ़ी और उसकी ओर खिंचाव भी। सफ़दर परेशान थे, लेकिन खुश भी। उन्हें लगता था कि वे निक़हत के जाल में फँसते जा रहे हैं, लेकिन मन की बातें किसी से कहने की ऐसी आजादी उन्होंने पहले नहीं जानी थी। निक़हत के साथ ज़्यादा समय बिताना उन्हें लाज़िमी लगने लगा।
लेकिन एक तवायफ़ और एक नवाब का अकेले साथ समय बिताने के लिए एक ही मुनासिब जगह और वक़्त था। तवायफ़ का कोठा और रात का वक़्त। यह फ़ैसला करना नवाब साहब के लिए आसान नहीं था। कई दिनों तक उन्होंने ख़ुद को जब्त किए रखा। दोस्त की महफ़िलों में गए। अपने घर पर भी महफ़िलें रखीं। सब में निक़हत शरीक़ होती। तक़रीबन छह महीने ऐसे ही बीते। इस बीच नवाब साहब को यह भी ख़बर मिली कि वे बाप बनने वाले हैं। नूरी एक महीने पहले अपने मायके जा चुकी थी।
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एक दिन एक दोस्त के यहाँ बागीचे में महफिल लगी थी। निक़हत और सफ़दर औरों से थोड़ा पहले ही पहुँच गए थे। मेजबान अभी भी तैयारियों में ही लगे थे। सफ़दर ने उनसे कहा कि वे परेशान न हों और जब तक बाकी लोग आते हैं, तब तक वे उस ख़ूबसूरत बागीचे में टहलने का मज़ा उठाएँगे। और शायद इसमें निक़हत जान भी शिरक़त करें।
मेजबान दोस्त ने एक चुटीली सी मुस्कान के साथ कहा कि उन्हें ज़रूर बागीचे की ठंढी हवा का लुत्फ़ उठाना चाहिए। वे दोनों निकल पड़े।
छह महीनों में यह पहला मौक़ा था जब वे दोनों अकेले साथ में थे। सफ़दर ने निक़हत से शायरी और गायकी के उनके शौक के बारे में पूछा। निक़हत ने उन्हें कोठे पर मिलने वाली तालीम के बारे में बताया। कितनी सख़्ती के साथ उन्हें गायकी और रक़्स के अलावा अरबी, फ़ारसी और उर्दू की तालीम भी दी गई थी। कितने शायरों को उसने बचपन से पढ़ा है। कैसे मौलाना साहब ने उसकी अपनी शायरी को तराशा, जो कि आज वह किसी को पसंद आने लायक शेर लिख सकती है।
सफ़दर को पहली बार इस बात का अहसास हुआ कि जिस तरह की तालीम इन मशहूर कोठों पर तवायफ़ों को मिलती है, उसके बारे में उनके ख़ानदान की शरीफ़ औरतें सोच भी नहीं सकती हैं। बिना मतलब समझे क़ुरान की चंद आयतें याद करना ही उनके लिए बहुत बड़ी तालीम है। औरतें तो क्या, कई मर्द भी अपनी तालीम इतनी संजीदग़ी से नहीं लेते। अपने ख़ानदान की पर्दा-नशीन औरतों और कई बिगड़ैल मर्दों के चेहरे उनकी आँखों के आगे घूमने लगे।
काफ़ी देर तक बाते चलती रहीं। दोनों महफ़िल के बारे में भूल ही गए। सफ़दर ने निक़हत को अपने घर वालों के बारे में बताया। अम्मीजान के बारे में, नूरी के बारे में। अपने बड़े भाईजान के बारे में, जिनकी हाल में ही किसी लाइलाज बीमारी से मौत हो गई थी। सफ़दर को ख़ुद पर आश्चर्य हो रहा था। इतनी बातें उन्होंने आज तक किसी से नहीं की थी। बातें भी कुछ ख़ास या बड़ी-बड़ी नहीं कर रहे थे। लेकिन उन छोटी-छोटी बातों में ही बड़ा मज़ा आ रहा था उन्हें।
अचानक उन्हें याद आया कि महफ़िल शुरू हो गई होगी। उन्होंने निक़हत को भी याद दिलाया। और थोड़ा उदास होकर कहाकि उन्हें बहुत अच्छा लगा निक़हत की सोहबत में। जाने फिर कभी ऐसा मौक़ा मिले या नहीं। निक़हत ने कहा, “नवाब साहब के हुक़्म करने की देर है। बंदी की पूरी शाम उनकी ही रहेगी।”
सफ़दर चौंक से गए, “मग़र…”
निक़हत ने उनकी बात काटते हुए कहा, “आप तसल्ली रखें। किसी को कुछ पता चलने की ज़रूरत नहीं है। पीछे की तरफ़ से जो कोठे का दरवाज़ा है, वहाँ से बिना किसी की नज़र में आए, नवाब साहब हमारे कमरे में आ सकते हैं। कल हम ख़याल रखेंगे कि हमारे पास और कोई न आए।”
“नहीं निक़हत। इसकी ज़रूरत नहीं है। हम नहीं आ पाएँगे।”
“कोई बात नहीं। बंदी की एक शाम इतनी बेशक़ीमती भी नहीं है कि बरबाद होने से दुनिया में कोई तूफ़ान आ जाए। हमारे पास कल कोई और नहीं आएगा।”
कहकर निक़हत आगे बढ़ गई। जब दोनों बाकी लोगों के पास पहुँचे, तो महफ़िल शुरू हुए काफ़ी वक़्त बीत चुका था। किसी ने उन्हें देखते ही कहा, “आइए निक़हत जान। आज तो आपने अपने साथ-साथ हमारे पाक़-दामन दोस्त की शायरी से भी हमें मरहूम कर दिया।”
निक़हत ने छूटते ही जवाब दिया, “काश कि इस मुश्किल काम को करने का सेहरा हम अपने सर पर बाँध सकते जनाब। नवाब साहब को तो बागीचे के गुलाबों ने ऐसा पागल कर दिया कि वहीं बैठ कर शेर लिखने लगे और रास्ता तक भटक गए उनके पीछे।”
सफ़दर ने पल भर के लिए शुक्र-गुज़ार नज़रों से निक़हत को देखा।
महफ़िल में बैठे किसी और आदमी ने कहा, “आप जो भी कह लें निक़हत जान। हम तो आपको ही क़सूरवार ठहराएँगे। और आपकी सज़ा ये है कि एक-आध शेर नहीं, एक पूरी ग़ज़ल आप हमें गा कर सुनाएँ।”
“गा कर? मग़र अभी साज़िंदे कहाँ हैं?”
“क्यों नख़रे कर रही हैं निक़हत जान। आपकी आवाज़ भी भला किसी साज की मोहताज है।”
“आप हमें भले ही कुसूरवार ठहराएँ, लेकिन हमारे क़ुसूर में नवाब साहब का भी तो बराबर का हिस्सा है। उन्हें कोई सज़ा नहीं मिल रही तो कम-से-कम वे ख़ुद हमें गाने के लिए तो कहें।”
लोग हँस पड़े। सफ़दर भी मुस्कुरा दिए, “हम बड़ी बेचैनी से आपको गाते हुए सुनने का इंतज़ार कर रहे हैं।”
“ठीक है। कल ही लिखी है ये ग़ज़ल हमने।”
और निक़हत ने अपनी सुरीली आवाज़ में यह ग़ज़ल सुनाई।
मेरी नज़रों ने जब तीर चलाए
सब घायल होने मेरे दर आए।
पर कौन है वो जो दूर जा रहा
कि तीर कहीं ये चुभ ना जाए।
मुसाफ़िर न तेरे पंख कटेंगे
एक बार गर नज़र मिलाए।
आजा मेरे आँगन दम भर
ज़रा देर तो हम मुसकाएँ।
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अगले दिन शाम को नवाब सफ़दर अकेले ही घूमने निकले। निक़हत के कोठे से पाँच कोस दूर उन्होंने कोचवान को वापस जाने को और अगली सुबह वहीं मिलने को कहा। उससे यह भी कहा कि अम्मीजान को कहलवा दें कि वे रात एक दोस्त के यहाँ बिताएँगे।
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निक़हत ने जब दरवाज़ा खोला तो नवाब साहब घबराए हुए थे। लेकिन अंदर वाक़ई कोई नहीं था। साज़िदे तक नहीं। वे चले तो आए थे लेकिन उन्हें भरोसा नहीं था कि निक़हत अपनी पूरी शाम सच में खाली रखेगी। वह भी तब जब उन्होंने आने का कोई वादा भी नहीं किया था। लेकिन निक़हत ज़ुबान की पक्की निकली।
कमरा खाली देखने के बाद नवाब साहब को बेतक़ल्लुफ़ होने में ज़्यादा देर नहीं लगी। दोनों में से किसी ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा या किया जिससे ऐसा लगता कि उनका वहाँ आना कोई नयी बात है। रात भर बातों, शायरी और गायकी का दौर चलता रहा। साज़िंदे नहीं थे तो नवाब साहब ने ख़ुद ही बीच-बीच में कुछ साज़ उठा लिए।
सुबह उन्होंने दो दिन के बाद फिर से आने की बात कही और निकल पड़े। उनके जाने के बाद निक़हत की नज़र साज़ों के बीच रखी एक थैली पर पड़ी। उसने उसे खोला तो उसमें ढेर सारे सोने के सिक्के पड़े थे।
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दो दिन बाद जब नवाब साहब वापस आए तो उन्होंने तस्वीर बनाने के लिए रंगों और कागज़ की फ़रमाइश की। उस रात उन्होंने निक़हत की एक तस्वीर बनानी शुरू की। कुछ देर बना कर फिर आगे पूरी करने की सोचकर बैठ गए।
“जानती हैं निक़हत, कितनी बार दिल चाहा कि नूरी की एक तस्वीर बनाएँ हम। लेकिन कभी पूछ भी नहीं पाए। हमेशा ऐसा लगा जैसे कि उन्हें सही नही लगेगा।”
“शायद आपको ठीक ही लगा। वैसे आप ये क्यों छोड़ कर गए थे?” निक़हत के हाथ में वह थैली थी।
“इतने दिनों से आपके बारे में सुनकर हमें ये तो पता चल ही गया है कि आपका समय बहुत कीमती है। उसे यों ज़ाया करवाना भी तो सही नहीं है।”
“ठीक है। लेकिन यों चुपचाप छोड़ कर जाने की क्या ज़रूरत थी? ख़ुद दे कर भी तो जा सकते थे।”
“अब आप इसे जो भी समझें निक़हत। लेकिन शायद हम कभी ऐसा कर नहीं पाएँगे। ये एक ज़िद हमारी मान लीजिए। वरना यहाँ आना हमारे लिए मुश्किल हो जाएगा।”
निक़हत ने सर हिला कर हामी भरते हुए वह थैली बगल में रख ली।
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“निक़हत। नूरी जब से वापस आईं हैं, उन्हें पता चल गया है कि हम यहाँ आते हैं।”
“पर्दा-नशीन औरतों की दुनिया अपने शौहर से शुरू होकर उनपर ही ख़त्म होती है नवाब साहब। उन्हें कैसे पता नहीं चलेगा?”
“लेकिन हम ये भी जानते हैं कि जिस्मानी ज़रूरतों के अलावा हमारे यहाँ आने की कोई वजह हो सकती है, ये वह कभी नहीं समझेंगी। कम-से-कम हमसे कुछ पूछें तो हम समझाने की कोशिश भी करें।”
“कैसे पूछेंगी नवाब साहब? आपकी अम्मी ने कभी आपके अब्बा से कुछ पूछा था।”
“नहीं।” सफ़दर ठंढी साँस लेते हुए बोले।
“उन्हें बचपन से सिखाया गया है कि शौहरों का हक़ है ये। उन्हें रोकने या कुछ पूछने का काम औरतज़ात का नहीं है। अगर वो अपने मायके में मिली तालीम भूल भी जाएँ, तो आपकी अम्मीजान नहीं भूलने देंगी उन्हें।”
“अम्मीजान?”
“जी। क्योंकि उनका भी यही ख़याल है।”
“लेकिन वह पूरी ज़िदग़ी दुखी रही हैं अब्बाजान की आदतों से।”
“लेकिन उसके लिए उन्होंने ख़ुद को क़सूरवार ठहराया है। कि वो अपने शौहर को रिझा कर रख न सकीं। और अभी वह आपकी बेग़म को भी इसी के लिए कोस रही होंगी।”
“निक़हत - आप सबकुछ कैसे जानती हैं?”
निक़हत ठहाका लगा कर हँस पड़ी।
“आपने कभी अपने ख़ानदान की औरतों से हम जैसी औरतों की चर्चा की है नवाब साहब? वे नफ़रत भरे लफ़्ज़ों में आपको बताएँगी कि हमने घाट-घाट का पानी पिया हुआ है। और सच भी है। हमने दुनिया देखी है।”
“बुराई क्या है दुनिया देखने में निक़हत?”
“पता नहीं हमें। आपको भले ही ऐसा लगे, लेकिन सच ये है कि हम सब कुछ नहीं जानते हैं। जैसे कि इस सवाल का जवाब हमारे पास नहीं है। दुनिया देखने में क्या बुराई है?”
निक़हत सोच में डूब गई। नवाब साहब भी चुप थे।
“कभी यों सोचा नहीं था नवाब साहब। लेकिन अब ये अजीब-सी बात बड़ी ज़ाहिर लग रही है। हमारे समाज में एक आदमी के पास दुनिया देखने के कई तरीक़े हैं। वह अपने किसी भी फ़न का इस्तेमाल कर सकता है और दुनिया में अपने बूते पर रह सकता है। वह नवाबों को शायरी सुना कर अपना पेट भर सकता है और शरीफ़ों की ज़िंदग़ी जी सकता है। लेकिन अपने आप को शरीफ़ कहलाने का एक ही ज़रिया है एक औरत के पास। वह है परदा। और परदा करने के बाद ना वह शायरी कह सकती है, ना गीत गा सकती है, ना तस्वीरों की समझ रख सकती है, ना ही दुनिया में अकेले क़दम रख सकती है। ये सब उसकी शराफ़त पर बट्टा लगाते हैं।”
थोड़ी देर की चुप्पी के बाद निक़हत फिर बोली, “कोई भी फन सीखने का, उसे दुनिया को दिखाने का हक़ औरत को एक ही सूरत में मिल सकता है नवाब साहब। और वह तब जब वह अपना जिस्म बेचने लगे, और तवायफ़ बन जाए। इसलिए हमें तालीम मिली। इसलिए हम आज आपको शायरी सुना सकते हैं, आपसे अपनी तस्वीर बनवा सकते हैं। और कोई कुछ नहीं कहेगा। आपकी बेग़म भी नहीं।”
“आपको बुरा नहीं लगता निक़हत। इस तरह…”
“कोठे पर रहना?”
“हाँ?”
“हमारा तो जन्म कोठे पर ही हुआ था। हमारी अम्मी की कहानी और थी। वह अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ यहाँ लाई गईं थीं। ज़िन्दग़ी भर दुखी रहीं कि शराफ़त की ज़िदग़ी नहीं मिली उन्हें। कभी अपने पेशे को दिल से अपना नहीं पाई वह। उन्हें शायद हमेशा बुरा लगता रहा यहाँ रहना। मग़र हम? हमारे लिए एक तवायफ़ बनना उतनी ही आम बात थी, जितनी ख़ानदानी औरतों के लिए परदा करना। अभी भी