Miles to go…

Ramblings by Jaya Jha in a world that is neither black, nor white!

Archive for the ‘Own Story Hindi’ Category

Well – yes, when poetry does not work

प्राचीन और नवीन

Posted by Jaya on May 12, 2008

प्राचीन

“भानुमति। क्या विचार है तुम्हारा? अब हमारी पुत्री के विवाह का समय आ गया है? जल्दी ही हमें तय कर देना चाहिए।”

“सही कह रहे हैं आप। किन्तु क्या कोई सुयोग्य वर है आपके मन में?”

“मैं तय नहीं कर पा रहा हूँ भानुमति। सूर्यवदन बहुत ही योग्य लड़का है।”

“हाँ। उसकी और रक्षिता की अच्छी बनती भी है। किन्तु…”

“मुझे पता है तुम्हे क्या दुविधा हो रही है। मेरे मन में भी वही एक प्रश्न है।”

“इस दुविधा को दूर करने का तो एक ही उपाय दिखता है मुझे।”

“क्या?”

“आप एक बार मयूर वन में जाकर पिताजी से बात क्यों नहीं करते। जब से उन्होंने वानप्रस्थ आश्रम के लिए प्रस्थान किया है, आप उनसे मिले भी तो नहीं हैं? मुझे विश्वास है कि वे हमारी दुविधा के लिए कोई समाधान अवश्य बताएँगे।”

“सही कह रही हो भानुमति। प्रातःकाल की पूजा और समाधि तो हो ही चुकी है। मैं अभी ही प्रस्थान करता हूँ। अभी निकल गया तो अँधेरा होने से पहले लौट भी आऊँगा।”

“जी। मैं राह के लिए पाथ्य दे देती हूँ। दोपहर की वेला में कही रुक कर ग्रहण कर लीजिएगा।”

“ठीक है।” और पंडित लक्ष्मीपति ने वन की ओर प्रस्थान किया।

“प्रणाम पिताजी।”

“चिरंजीवी भव। कैसे हो पुत्र?”

“सब कुशल है पिताजी।”

“क्या बात है, कोई चिन्ता है क्या?”

“कुछ बड़ी बात नहीं है पिताजी। किन्तु एक दुविधा थी।”

“बताओ मुझे।”

“पिताजी रक्षिता के विवाह के विषय में सोच रहा था।”

“यह तो बहुत अच्छा सोचा पुत्र। यही सही समय है उसके विवाह का। दुविधा की क्या बात है?”

“पिताजी। मुझे और भानुमति को लगता है कि सूर्यवदन एक योग्य वर है। आपने भी उसे देखा ही है। और ऐसा लगता है कि वह और रक्षिता एक-दूसरे को स्वीकार भी कर लेंगे।”

“दुविधा क्या है पुत्र?”

“पिताजी। सूर्यवदन के पिता शूद्र थे। तो ब्राह्मण होते हुए उससे अपनी पुत्री का विवाह करने में दुविधा हो रही है।”

“सूर्यवदन एक विद्वान् नौजवान है ना पुत्र?”

“जी पिताजी। शास्त्रों का अध्ययन तो उसने कई ब्राह्मण पुत्रों से भी अच्छा किया है। बहुत प्रतिभाशाली कवि है। राज-दरबार में उसे पुरस्कार और सम्मान भी मिला है।”

“फिर क्या समस्या है लक्ष्मीपति? जानते हो ब्राह्मण की परिभाषा क्या है?”

“क्या पिताजी?”

“जो ईश्वर को जानता है वह ब्राह्मण है। इसका कुल और पूर्वजों से कोई लेना-देना नहीं है।”

“किन्तु पिताजी, हमने तो हमेशा लोगों को कुल देखकर विवाह करते देखा है। मेरे सारे मित्र भी यह सलाह देते हैं।”

“इसलिए नहीं पुत्र कि ईश्वर ने किसी से कहा है कि ऐसा करना चाहिए।”

“फिर ऐसा क्यों करते हैं पिताजी? कोई तो कारण होगा। इतने लोग असत्य का साथ तो नहीं दे सकते।”

“विवाह के पश्चात् कन्या एक नए परिवार में जाती है। यदि उस परिवार का रहन-सहन कन्या के मायके से बहुत भिन्न हुआ तो कन्या और परिवार वालों, दोनो के लिए समस्या का कारण बन जाएगा।”

“बात तो सत्य है पिताजी।”

“इसीलिए हमारे समझदार पूर्वजों ने व्यावहारिक तौर पर एक ही जाति के अंदर और परिवार को देखकर विवाह करने की सलाह दी है। किन्तु रक्षिता का विवाह यदि सूर्यवदन के साथ होता है तो ऐसी कोई समस्या नहीं होगी। वह एक ब्राह्मण पिता की दिनचर्या को देखते हुए बड़ी हुई है। और सूर्यवदन भी एक ब्राह्मण की तरह ही जीवन-यापन करेगा।”

“जी पिताजी। आपने हमारी दुविधा का समाधान कर दिया है।”

नवीन

“अरे, बेटा प्रवीण। संजय के लिए बड़ा ही अच्छा रिश्ता आया है। बहुत अच्छा कुल है। और लड़की भी बहुत सुंदर है। देख फोटो देख लड़की की।” भवानी शंकर ने अपने बेटे को एक फोटो देते हुए कहा।

प्रवीण ने फोटो अपने हाथ में ली।

“मैं तो सोच रहा हूँ कि हाँ कर दूँ।”

“लेकिन पापा। ऐसे कैसे हाँ कर सकते हैं? संजय से तो बात कर लें। मुझे तो लगता है कि उसे कोई और लड़की पसंद है।”

“अरे होगी। लेकिन शादी-ब्याह तो ऐसे नहीं किए जाते ना। और जो भी लड़की हो, ये उससे कम नहीं है। ये लो संजय भी आ गया। संजय बेटा!”

“हाँ बाबा।”

“बेटा, ज़रा यह फोटो तो देख।” भवानी शंकर ने प्रवीण के हाथ से फोटो लेकर संजय को देते हुए कहा।

संजय ने फोटो हाथ में ली और थोड़ा गंभीर होकर बोला, “अच्छी है बाबा, पर किसकी है?”

“लता। तेरे लिए रिश्ता आया है इसका।”

“मेरे लिए रिश्ता?”

“हाँ। क्यों पसंद नहीं आई?”

“बाबा। ऐसे फोटो देख कर पसंद-नापसंद का क्या मतलब है? पर मेरे लिए रिश्ते ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं है।”

“क्यों? हम नहीं ढूँढ़ेंगे तो कौन ढूँढ़ेगा? और अब तो तुझे जॉब में लगे भी तीन साल होने को आए। अब तो शादी कर के घर बसाना ही चाहिए तुझे।”

“वो ठीक है बाबा। लेकिन मैंने मम्मी को बताया था। मोनिका के बारे में। वह आप लोगों से बात करने भी वाली थीं।”

“मोनिका? यह कैसा नाम है? ईसाई है क्या?”

“नहीं बाबा। ईसाई तो नहीं है। हिन्दू ही है।”

“ब्राह्मण तो नहीं हो सकती?”

“हाँ। ब्राह्मण नहीं है बाबा। पर उससे क्या फ़र्क पड़ता है?”

“क्या फ़र्क पड़ता है? अरे किसी दूसरी जात की बहू को घर में लाएगा? हम सबकी जाति भ्रष्ट करेगा। बच्चों की कोई जात रह ही नहीं जाएगी।”

प्रवीण ने बीच में बोलने की कोशिश की, “पापा। आजकल के बच्चे…”

लेकिन भवानी शंकर ने उसे चुप करवा दिया।

“प्रवीण! तू ऐसी बेतुकी बातों में इसका साथ मत दे।”

“बाबा। आजकल सच में फ़र्क नहीं पड़ता। मैं और मोनिका एक दूसरे को अच्छी तरह समझते हैं। यह ज़्यादा ज़रूरी है।”

“अरे तो अच्छी ब्राह्मण लड़कियाँ नहीं है क्या? लता ने भी एम. बी. ए. किया हुआ है।”

“बाबा। मुझे नहीं पता कि मैं आपको समझा पाउँगा कि नहीं। लेकिन आपके ज़माने में बात और थी। लोग ज्वाइन्ट फैमिली में रहते थे। औरतों और मर्दों के अपने-अपने दायरे और काम थे। जब तक सब लोग अपना काम कर रहे हैं, फ़र्क नहीं पड़ता था। लेकिन आजकल वैसा नहीं होता। पति-पत्नी अक्सर ही बस एक दूसरे के साथ रहते हैं। उनकी ज़िंदग़ी चलाने के लिए कोई और नहीं आता। पति-पत्नी का एक-दूसरे को समझना और एक दूसरे का दोस्त होना पहले ज़रूरी होता है। कोई भी और बात बाद में आती है।”

“अब तू अपने दादा को जीवन के सत्य समझाएगा।”

“ऐसा कुछ नहीं है बाबा। और वैसे भी जाति क्या होती है? हिस्ट्री तो आपने भी पढ़ी है और मुझे भी आपने ही पढ़ाई है। जाति-प्रथा कोई हमेशा से तो रही नहीं है। यह तो हम सबको पता है ना कि पहले जाति लोगों के प्रोफ़ेशन से जुड़ी होती थी। उसका कुल, ख़ानदान या शादी के मामलों से कोई संबंध नहीं था।”

“देख। पढ़-लिख लेने से कोई समाज और उसके क़ायदों से बड़ा नहीं हो जाता। तेरे पापा ने भी क़ायदों के अनुसार शादी की थी।”

“बाबा। ऐसे ग़लत और दकियानूसी क़ायदों को मानने का कोई मतलब नहीं है। मेरी ज़िंदगी आपकी या पापा की ज़िंदग़ी से अलग तरह की है। मुझे जिसके साथ ज़िंदग़ी भर रहना है उसको मैं फोटो, सूरत, डिग्री या जाति देख कर नहीं चुन सकता। आई एम सॉरी, लेकिन इस बारे में और बहस करना बेकार है।”

संजय अपने कमरे में चला गया।

भवानी शंकर अपना सामान बाँध कर निकल गए और जाते जाते प्रवीण को बोल गए कि उनके श्राद्ध पर संजय, उसकी पत्नी या बच्चे बिलकुल नहीं होने चाहिए।

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रंगमहल

Posted by Jaya on May 10, 2008

जब निशा ने राजस्थान के एक छोटे से शहर के उस प्राचीन महल को देखने जाने के लिए हामी भरी थी, उस वक़्त वह दिल्ली से, अपने काम से, अपने आस-पास की हर चीज़ से दूर जाने के लिए इतनी उतावली थी, कि वह किसी जंगल या श्मशान में जाने के लिए भी तैयार हो जाती। पुराने महल देखने में तो फिर भी उसे रुचि थी। लेकिन उसने तब ज़्यादा कुछ सोचा नहीं था।

जब वह अपने दोस्तो के साथ वहाँ पहुँची तो उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उस छोटी-सी जगह पर, जहाँ ज़्यादा लोग आते-जाते भी नहीं थे, उन्हें एक गाइड भी मिल गया। उस गाइड ने सौ रुपयों के लिए उन्हें दो घन्टे तक महल घुमाने का, उसके बारे में सारी जानकारी देने का और उससे जुड़ी सभी कहानियाँ बताने का वादा किया। उन्हें बाद में पता चला कि वह गाइड दरअसल पास में एक साइकिल और रिक्शों के पंक्चर ठीक करने की दुकान चलाता था।

गाइड उन्हें महल के अलग-अलग हिस्से घुमाने लगा। कुछ कमरों को संग्रहालय बना दिया गया था। कुछ अन्य कमरों में राजपरिवार के लोगों की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी हुई थीं। फिर वे लोग एक बड़े से हॉल में पहुँचे, जहाँ छत कई खम्भों पर टिकी थी। खम्भे बराबर दूरी पर एक पैटर्न में खड़े थे और गुलाबी रंग के पेन्ट के साथ बहुत ही सुन्दर नज़ारा बना रहे थे। निशा ने उस हॉल की और खम्भों के पैटर्न की कई तस्वीरें खींची अपने कैमरे से। गाइड बता रहा था कि यह रंगमहल है जहाँ नाच-गाने हुआ करते थे।

‘इसका माहौल ही बड़ा रसिक है इन खम्भों के साथ। नाच-गाने के लिए ही सही रहा होगा।’ निशा ने मन-ही-मन सोचा।

गाइड उन लोगों को कोने के एक खम्भे के पास ले गया। उसमें एक दरार पड़ी हुई थी। गाइड ने बड़े ही नाटकीय तरीके से उन्हें उस दरार की कहानी सुनाई। सत्रहवीं शताब्दी में इस राज्य के राजा महाराज चन्द्रभानु थे। उन्होंने किसी पर गुस्सा हो कर इस खम्भे पर ज़ोरों से मुक्का मारा था। उससे ही इस खम्भे में यह दरार पड़ गई। लेकिन उन्होंने कभी भी उस खम्भे की मरम्मत कराने की अनुमति नहीं दी और मरते हुए भी अपने वारिसों से उस खम्भे को वैसे ही छोड़ देने को कहा। इसलिए इस खम्भे की कभी मरम्मत नहीं करवाई गई। किसी को नहीं पता है कि उनका गुस्सा किस पर था।

सत्रहवीं शताब्दी के किसी राजा के हाथ इतने मजबूत होंगे, इस बात पर निशा विश्वास नहीं कर सकती थी। लेकिन फिर भी उसे बड़ा ही मज़ा आया कहानी सुनकर। एक राजा का गुस्सा। किसपर था कभी किसी को पता नहीं चला। एकदम बच्चों जैसी कहानी होकर भी कुछ तो जिज्ञासा उत्पन्न करती थी।

लोग आगे बढ़ने लगे, तभी निशा की नज़र खंभे के पास की दीवार पर बने एक दरवाज़े पर पड़ी। दरवाज़ा छोटा-सा लकड़ी का था और उसपर एक बड़ा भारी-सा जंग लगा ताला पड़ा हुआ था। निशा की नज़रें उस दरवाज़े पर गड़ गईं।

रंगमहल की साज-सज्जा चल रही थी। कई लोग इस काम में लगे हुए थे। तभी दो बच्चे, एक लड़का और एक लड़की रंगमहल से लगे लकड़ी के छोटे-से दरवाज़े से दौड़ते हुए रंगमहल में घुसे। लड़की आगे-आगे थी और लड़का उसके पीछे-पीछे उसे पकड़ने के लिए दौड़ रहा था।

“कांति की बच्ची। आज मैं तुझे नहीं छोड़ूँगा।”

तभी एक औरत उनके पीछे आई।

“राजकुमार चन्द्रभानु, कांति। ये क्या तमाशा चल रहा है? रंगमहल में रात के उत्सव के लिए तैयारियाँ हो रहीं हैं। यहाँ बच्चों का कोई काम नहीं है अभी।”

इतना कहते-कहते उस औरत ने कांति को पकड़ लिया।

“माँ। तुमने मुझे क्यों पकड़ा? देख नहीं रही थी, चंद्र मुझे आज फिर नहीं हरा पाया।”

“कांति। कितनी बार कहा है कि राजकुमार को उनके नाम से मत बुलाया कर।”

“हाँ, हाँ। नहीं बुलाउँगी।” फिर मुँह चिढाती हुई बोली, “राजकुमार चंद्रभानु।”

“कांति। देख लेना, जब मैं महाराज बन जाऊँगा तो तुझे इसी रंगमहल में नचाऊँगा।”

“नाचें मेरे दुश्मन। मैं राजमहल में तुम्हारी बांदी बनकर नहीं रहूँगी।”

कांति की माँ, राजकुमार की धाय माँ, मीरा उन्हें उसी दरवाज़े से अंदर ले गई, जिससे वे बाहर आए थे। वह दरवाज़ा रंगमहल को राजप्रासाद के अंतःपुर के रास्ते से जोड़ता था।

किशोरी कांति उद्यान में खड़ी थी। तभी पीछे से किसी ने उसका नाम पुकारा।

‘कांति।’

‘चंद्र। बधाई हो। सुना कि राजद्रोह के कुचलने में तुम सफल हो कर लौटे हो।’

‘सही सुना कांति। तू कैसी है?’

‘मैं तो ठीक हूँ। किन्तु तुम बड़े थके-थके से लग रहे हो। अभी-अभी आए हो क्या?’

‘हाँ। अभी-अभी आया हूँ। धाय माँ ने बताया कि तू यहाँ है तो मिलने चले आया।’

‘हाँ चन्द्र मन थोड़ा अशांत लग रहा था। उद्यान में आने से शांति मिलती है।’

‘मन तो मेरा भी अशांत है कांति। प्रियदर्शन की हत्या करनी पड़ी मुझे।’

कांति की आँखों में वह भाव था कि मैं तुम्हारी स्थिति समझ सकती हूँ। किन्तु उसने बस इतना कहा ‘तुम्हारा दोष नहीं है चन्द्र। इसके बारे में सोचकर परेशान न हो।’

फिर बात बदलती हुई बोली, “अच्छा चंद्र। तुमने तो कई गाँवों से, खेत-खलिहानों से होकर यात्रा की होगी ना।”

“हाँ।”

“कैसे होते हैं गाँव? सुंदर लगते हैं क्या खेत-खलिहान? मैं तो कभी राजमहल से बाहर गई ही नहीं। माँ तुम्हें छोड़कर कभी कहीं नहीं जा सकती थीं।”

“सुंदर तो लगते हैं खेत-खलिहान कांति, किन्तु उन्हें चलाने वाले किसानों का जीवन बड़ा कठिन है। बहुत परिश्रम करना पड़ता है उन्हें। और फिर कभी मौसम, कभी रास्ते से जाती सेनाएँ, कभी कीड़े-मकोड़े और कभी जानवर खेतों को क्षति पहुँचाते रहते हैं। पर क्यों पूछ रही है तू?”

“ऐसे ही। मैं भी कभी रहूँगी वहाँ।”

“भूल जा। मैं महाराजा बन जाऊँगा तो तुझे रंगमहल में नचाऊँगा।” चंद्रभानु से शैतानी से हँसते हुए कहा।

“नाचें मेरे दुश्मन। मैं राजमहल में तुम्हारी बांदी बनकर नहीं रहूँगी चंद्र।”

तभी मीरा की आवाज़ आई, “राजकुमार। आप यहाँ क्या कर रहे हैं? रानी माँ आपके स्वागत के लिए सारी तैयारियाँ कर के बैठी हैं। और कांति। तुझे कब समझ में आएगा कि राजकुमार से कैसे बात करते हैं। मैंने तुझे अभी भी उनका नाम लेते सुना। नाम से मत बुलाया कर।”

“हाँ, हाँ। नहीं बुलाउँगी।” फिर मुँह चिढाती हुई बोली, “राजकुमार चंद्रभानु।”

चंद्रभानु रंगमहल में थे। कांति लकड़ी के दरवाज़े से रंगमहल में आई।

“मुझे यहाँ क्यों बुलाया चंद्र?”

“मुझसे विवाह कर ले कांति।”

“मैं एक दासी की पुत्री हूँ।”

“मैं रानी बनाऊँगा तुझे।”

“मेरा विवाह बहुत पहले तय हो चुका है।”

“पता है।”

“अगले सप्ताह मेरा विवाह होने वाला है।”

“रुक सकता है।”

“पता है चंद्र। मैं मुँह नहीं खोलना चाहती थी। अब तुम महाराज हो। किन्तु बोलना पड़ेगा। मैं तुमसे विवाह नहीं करूँगी।”

“एक गरीब किसान से कर लेगी, मुझसे नहीं करेगी। क्यों कांति?”

“वह गरीब है। एक ही पत्नी रखेगा। तुम्हारे अंतःपुर में मैं कितनों के बीच एक रहूँगी?”

“मैं और किसी से विवाह नहीं करूँगा।”

“पिथौरागढ़ के महाराजा सीमा-समझौते और मित्रता के लिए अपनी पुत्री से विवाह करने को कहें फिर भी नहीं?”

चंद्रभानु चुप हो गए। थोड़ी देर नीचे ज़मीन की ओर देखते रहे। फिर बोले, “लेकिन प्यार मैं सिर्फ तुझसे करूँगा।”

“उसका क्या भरोसा चंद्र। प्रियदर्शन से प्यार नहीं करते थे? चचेरा भाई था तुम्हारा। बचपन से साथ खेल-कूद कर बड़े हुए थे तुम।”

“राजधर्म से विवश था कांति।”

“दोष नहीं दे रही तुम्हे। राजधर्म किसी को तो पूरा करना है। यह तुम्हारा कर्तव्य है। और मेरा? एक किसान का घर अभी मेरी राह देख रहा है। उसकी बूढ़ी माँ को मेरी सेवा की आवश्यकता है। उस घर को सँभालने की आवश्यकता है।”

“रानी बनाऊँगा तुझे कांति। ऐसे कितने ही किसानों का घर भर सकती है तू जब रानी बन जाएगी।”

“उस किसान के काम में हाथ बटाऊँगी तो उस खजाने को कर दे कर भरूँगी जिससे तुम्हारी रानी ऐसे कितने ही किसानों का घर भर सकेगी।”

“बहुत कष्ट हैं उस जीवन में कांति। तू राजमहल में पली-बढ़ी है।”

“जो कष्ट अपनी आँखों से देखें हैं, उन्हें नहीं झेलना चाहती। रानी माँ को रातों में छिप-छिप कर रोते नहीं सुना क्या मैंने? माँ का कमरा ठीक उनके कमरे से सटा हुआ है।”

“धन दौलत नहीं होगी उस जीवन में।”

“किसान के साथ मिलकर मिट्टी से सोना उगाऊँगी।”

“कभी मौसम, कभी रास्ते से जाती सेनाएँ, कभी कीड़े-मकोड़े और कभी जानवर खेतों को क्षति पहुँचाएँगे।”

“जो बचेगा उसे सहेज कर रखूँगी।”

“कभी अकाल पड़ जाएगा।”

“महल में घुट कर जीने की बजाय खुले आकाश के नीचे भूख से मर जाऊँगी।”

“अंतिम बात हमेशा तेरी ही होती है कांति। हमेशा हार जाता हूँ।”

“चलो इस बार प्रयत्न करते हैं कि अंतिम बात मेरी ना हो।”

“तेरा विवाह तय हो जाने की बात मुझे बहुत दिनों बाद पता चली थी। तूने मुझे बताया क्यों नहीं था?”

‘उस दिन उद्यान में बताना चाहती थी किन्तु माँ आ गईं थीं।’ कांति ने सोचा। पर बोला नहीं।

“तुम्हें बता कर झंझट कौन मोल लेता चंद्र। तुम तो मुझे इस रंगमहल में नचाना चाहते थे।”

“नाचें तेरे दुश्मन।”

कांति मुस्कुरा दी। फिर बहुत सहजता से झुक कर बोली, “चलती हूँ महाराज। प्रणाम स्वीकार कीजिए और अपना आशीर्वाद दीजिए।”

“देख। फिर तेरी ही बात अंतिम रही।”

कांति ने अब अपना मुँह नहीं खोला। बस मुस्कुराते हुए सिर ना में हिलाया। और दरवाज़े से अंदर चली गई। चंद्रभानु ने उसे तब अंतिम बार देखा।

किन्तु कांति ने चंद्रभानु को एक बार और देखा। उस दरवाज़े के अंदर का एक रास्ता ऊपर की और भी जाता था, जहाँ झरोखों से रंगमहल का दृश्य दिखता था। कांति ने वहाँ से झाँक कर देखा तो चंद्रभानु उदास चेहरे के साथ एक खम्भे का सहारा लेकर खड़ा था। कुछ क्षण बाद वहाँ से चला गया। दरबार में जाने का समय हो गया था।

“निशा। यहाँ कैसे रह गई थी तू यार? हमने पूरा महल देख लिया। खाने के लिए जाने का टाइम हो गया है। चल।”

निशा ने सागर को दो पल के लिए ऐसे देखा मानो पहचान ही ना रही हो। फिर बुदबुदा कर बोली, “गाइड झूठ बोल रहा था। उसने खंभे पर मुक्का नहीं मारा था। दरार कभी और पड़ी होगी।”

“क्या?”

“कुछ नहीं।”

तभी गाइड भी वहाँ आया।

निशा ने बंद दरवाज़ा दिखा कर उससे पूछा, “यह दरवाज़ा?”

“कुछ दो सौ सालों से बंद पड़ा है। यह अंतःपुर के रास्ते में खुलता है। एक बार रंगमहल के किसी उत्सव की चहल-पहल के दौरान महल की एक राजकुमारी यहाँ से भाग गई थी। उसके बाद से इसे बंद कर दिया गया था। आज तक नहीं खुला है।”

“निशा। वी नीड टू टॉक।”

रोशनी निशा की मैनेजर थी, कॉल सेंटर में जहाँ वह काम करती थी। निशा को पता था कि क्या बात होनी है। पिछले कई महीनों से एक ही बात हो रही थी।

“निशा। देखो तुम्हें सक्सेसफुल बनाना मेरा जॉब है। और मैं तुम्हारी मदद करना चाहती हूँ। तुम बहुत पहले ट्रेनर की पोस्ट पर प्रोमोट हो गई होती, तुम्हें पता है ना। लेकिन क्यों हर महीने किसी कस्टमर पर चिल्लाने जैसी हरक़त कर बैठती हो? हर प्रोमोशन मीटिंग में एक ही चीज़ पर बात अटक जाती है। तुम बहुत इन्टेलीजेंट हो लेकिन मैच्योरिटी नहीं है तुम्हारे अंदर। ट्रेनिंग कैसे दोगी नए लोगों को?”

रोशनी अपना काम कर रही थी। उसे अपने को रिपोर्ट करने वाले सभी लोगों को क्वाटरली फीडबैक देना था। उसने सोचा था कि हमेशा की तरह हाँ-ना कर के मीटिंग खतम हो जाएगी।

“अब परेशान होने की ज़रूरत नहीं है रोशनी। मैं रिज़ाइन कर रही हूँ।”

“क्या? कहाँ जा रही हो?”

“कहीं नहीं।”

“नहीं बताना चाहती हो तो ठीक है। लेकिन तुम्हें पता है ना कि इस कंपनी की तरह का ग्रोथ तुम्हें शायद ही कहीं और मिले। और तुम्हें रेज़ भी मिल रही है।”

“इनसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता रोशनी। मैं किसी और कंपनी में नहीं जा रही हूँ।”

“फिर?”

“मैं पेंटिंग करूँगी।”

“पेंटिंग? वो हॉबी है तुम्हारी। कैरियर नहीं।”

“मैं उसे कैरियर बनाऊँगी।”

“तुम सोच लो थोड़ा इसपर। हर कोई मशहूर नहीं हो जाता। बहुत रिस्क हैं।”

“मैं लेने को तैयार हूँ।”

“हर रात पिज़्जा खाने के पैसे बाइस साल के पेंटर को नहीं मिलते।”

“मैं चावल, रोटी खाऊँगी। परेशान मत हो।”

“इस कंपनी में बहुत ग्रोथ है।”

“मैं सुबह-सुबह सन-राइज़ देखना चाहती हूँ, किसी की वाशिंग-मशीन ठीक नहीं कराना चाहती।”

“सूरज पर बादल भी छाते हैं मैडम।”

“तो बादलों की पेंटिंग बना लूँगी।”

“सोच लो। एक-दो दिन का समय लो। फिर डिसाइड करना।”

“मैंने यहाँ आने से पहले अपना रेज़िगनेशन ई-मेल तुम्हें और एच आर मैनेजर को भेज दिया है।”

फिर उठती हुई बोली, “चलती हूँ रोशनी। जितनी जल्दी हो सके मुझे रिलीव कर देना। बाय।”

पहली बार अंतिम बात रोशनी की नहीं, निशा की हुई थी।

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गौतम बुद्ध की डायरी

Posted by Jaya on April 30, 2008

ग्रीष्म ऋतु आ गई है। आज से अगले चार महीनों तक मैं अपने जलमहल में रहूँगा। मुझे यहाँ रहना बहुत पसंद है। इस महल में हर तरफ़ पानी के तालाब जो हैं। पानी से खेलते रहना मुझे बहुत अच्छा लगता है।

आज मैंने पिताजी को मेरे विवाह के बारे में मासी से बात करते सुना। कह रहे था कि यशोधरा बहुत सुंदर है। मुझे उत्साह भी हो रहा है किन्तु थोड़ा भय भी लग रहा है। विवाहित जीवन बहुत भिन्न होता है ना बाल्यावस्था से? नये कर्तव्य। पता नहीं यशोधरा को कैसी चीज़ें पसंद होंगी? मासी को तो मेरी पानी से खेलने की आदत बहुत बुरी लगता है। यशोधरा को कैसा लगेगा। और यदि उसे बुरा लगा तो वह मुझसे कहेगी या नहीं? कहीं बिना बताए रूठ कर न बैठ जाए। स्त्री-स्वभाव को समझना भी तो बड़ा कठिन होता है, ऐसा मैंने सुना है। गलत तो नहीं ही सुना है। मासी को ही देखो, किस बात पर क्रोधित हो जाएँ, किस बात पर प्रसन्न हो जाएँ और किस बात पर उनका वात्सल्य उमड़ पड़े, इसका पता लगाना कितना मुश्किल है। यशोधरा का प्रेम किस बात पर उमड़ेगा और कैसी बातें उसे क्रोधित करेंगी, इसका तो पता नहीं है।

मुझे लगता था कि जीवन में कितनी प्रसन्नता है। किन्तु यशोधरा के मेरे जीवन में आने के बाद पता चला है कि वह प्रसन्नता तो कुछ भी नहीं थी। अब तो ऐसा लगता है कि एक-एक क्षण बस वहीं ठहर जाए। लेकिन ठहरने की क्या ज़रूरत है। अगला क्षण भी तो उतना ही मनोहर होता है। अब जीवन हमेशा ऐसा ही रहेगा। कितना मधुर, कितना मनोहर। यशोधरा की मधुर आवाज़, उसकी धीमी हँसी, उसको गहनों की मीठी रुनझुन और इन सबके बीच वसंत महल में चल रहे सुरीले गीत। जिसने भी जीवन बनाया है, उसका धन्यवाद कोई कैसे करे।

मासी ने आज मुझे बताया कि मैं पिता बनने वाला हूँ। मेरा एक अंश इस संसार में आएगा। जिस तरह पिताजी ने अपना प्रेम मुझपर बरसाया है हमेशा, वैसे ही मैं भी उसपर अपना प्रेम न्यौछावर करूँगा।

जब मैंने यशोधरा को पहली बार देखा था, तब अगर वह मुझे संसार की सबसे सुंदर स्त्री लगी थी तो राहुल के जन्म के पश्चात मातृत्व के तेज के साथ वह और भी अधिक सुंदर लगने लगी है। और राहुल? उसे तो सीने से हटाने का भी जी नहीं करता मेरा। वह मेरा अंश है। मासी उसके रंग-रूप और हाव-भाव को देखकर हमेशा कहती हैं कि मैं भी बचपन में ऐसा ही था। कितना सुखद है पिता बनना। जीवन अब और भी सुंदर हो गया है। और कल तो राहुल पहली बार अपने पैरों पर खड़ा हुआ था। कितना प्यारा लग रहा था।

आज तक मैं किस छलावे में जी रहा था? पिताजी और मासी एक दिन नहीं रहेंगे हमारे साथ। यशोधरा एक दिन बूढ़ी होकर कुरूप हो जाएगी। मैं संभवतः रोगी होकर मर जाऊँगा। और राहुल? उसके साथ भी यही सब होगा। उस कोमल से शरीर को इतना दुःख देखना पड़ेगा। ये जीवन हमेशा इतना सुखद नहीं रहेगा। तो फिर आज के सुखों का क्या अर्थ है? हम क्यों हैं इस संसार में? क्यों आते हैं? कुछ दिन सुख के छलावे के बाद दुःख झेलने को। जिसने भी जीवन बनाया है उसने क्यों बनाया? क्यों दुःख भरे इसमें?

जब जीवन का अंत होना ही है, जब जीवन में दुःख आने ही हैं, तो इस सुख के छलावे में रहकर क्या करना है? जीवन का सत्य क्या है, उद्देश्य क्या है? पिताजी ने जान-बूझ कर मुझे इतने दिनों तक इस झूठ के बीच रखा। वह अब भी मुझे सत्य की खोज नहीं करने देंगे। मुझे यहाँ से दूर जाना होगा। पता करना होगा कि सत्य क्या है।

यशोधरा और राहुल? नहीं, नहीं। मुझे पता नहीं है कि मैं कहाँ जा रहा हूँ। मैं उन्हें इस अनिश्चित पथ पर अपने साथ नहीं ले जा सकता। मेरे जाने से उन्हें दुःख होगा। किन्तु वह तो कभी न कभी होना ही है। तो आज हो जाए तो उसमें क्या अलग होगा। और जब मुझे सत्य के दर्शन हो जाएँगे, तो मैं वापस आकर इन्हें भी बताउँगा।

प्यारी यशोधरा।

किन्तु अब मुझे जाना ही होगा।

जिस सत्य के लिए मैं इतना भटका, इतने तरीकों से समझने की, पाने की कोशिश की, वह इतनी सीधी-सी बात में छिपा हुआ है। हमारे अंदर है। फिर क्यों संसार में इतने लोग, इतना कष्ट पाते हैं? औरक्यों जन्म-मरण के इस चक्रव्यूह से आगे नहीं निकल पाते हैं?

नहीं। अब और ऐसा होने की ज़रूरत नहीं है। मेरे जीवन के इतने वर्ष गए इस साधारण सत्य को समझने में। लेकिन मैं इस ज्ञान को व्यर्थ नहीं जाने दूँगा। मैं सबको बताउँगा। लेकिन यह बेचैनी-सी क्यों लग रही है मुझे? क्यों ऐसा लग रहा है कि मैंने कुछ अधूरा छोड़ दिया है? क्या है जो मुझे इतना व्यथित कर रहा है?

यशोधरा! यशोधरा कैसी होगी? उसने इतने वर्ष शायद रो-रो कर काटे होंगे। लेकिन अब? अब उसे और दुखी रहने की आवश्यकता नहीं है। मैं उसके पास जाऊँगा। मैं उसे उस सत्य के दर्शन कराऊँगा, जो मैंने इतने कष्ट से पहचाना है। और मेरे इन कष्ट के दिनों में उसने भी तो कष्ट सहे हैं। हम दोनों ने अपनी अज्ञानता के कारण कष्ट सहे हैं। अब इन कष्टों का निवारण होगा। मैं कल ब्रह्म-मुहूर्त में ही प्रस्थान करूँगा।

मैं आज कपिलवस्तु के लिए प्रस्थान करने की सोच कर उठा था। किन्तु ऐसा कर नहीं पाया। यशोधरा तो भोली है और मुझपर उसका अगाध विश्वास है। वह मेरी बातें अवश्य समझने का प्रयत्न करेगी और उन्हें मानेगी भी। किन्तु पिताजी। जिस पुत्र को उन्होंने तिल-तिल बढ़ते देखा है, उसके मुँह से सत्य-दर्शन की बातें उन्हें बचपना लगेंगी। वह मुझे अपने मार्ग पर कभी नहीं बढ़ने देंगे। ऐसा नहीं है कि वह मेरा बुरा चाहेंगे। लेकिन माता-पिता के लिए बच्चे हमेशा ही बच्चे रहते हैं। वह यह कभी नहीं मान पाएँगे कि उनके बच्चे कुछ ऐसा जान सकते हैं, जो उन्होंने नहीं जाना। मुझे क्षमा कर दीजिएगा पिताजी। मै ऐसे सोचकर आपका अनादर नहीं करना चाहता। ऐसा भी नहीं है कि मेरे अंदर बहुत गर्व भर गया है। किन्तु आदर-अनादर की सांसारिक परिभाषाओं ने कुछ बड़े सत्यों को अनदेखा कर दिया है।

और यशोधरा? उसे कष्ट सहना होगा। विश्व-कल्याण हेतु।

इसलिए मैं बोधगया से कपिलवस्तु जाने के बदले उससे उलटी दिशा में बढ़ गया आज। मुझे एक नए जीवन का प्रारंभ करना है।

आज वाराणसी के पास, सारनाथ नाम की जगह पर, पाँच भद्रजनों को मैंने अपने अनुभव और उस सत्य के बारे में समझाने का प्रयत्न किया जिसे मैंने देखा है। यह बात तो निश्चित है कि उनकी मेरे प्रति श्रद्धा है। किन्तु इस श्रद्धा का कारण यह नहीं है कि वे मेरी बात समझ गए। मैंने जो वर्षों कष्ट सहे हैं, एक राजसी जीवन छोड़ कर, सत्य की खोज के लिए; उसके कारण ये लोग मुझ पर श्रद्धा रखते हैं। मुझे लगा था कि यह सत्य इतना साधारण है कि सबको समझाना बहुत आसान होगा। किन्तु ऐसा नहीं हुआ। अनुभव को शब्दों में रखना बहुत कठिन था। नहीं समझ पाने का भाव उनके चेहरे पर साफ दिख रहा था। मैंने कल फिर उनसे बात करने वाला हूँ। किन्तु उससे पहले मुझे सोचना होगा कि अपने अनुभव को, सत्य को, साधारण शब्दों में कैसे रखूँ ताकि सब लोग उसे समझ पाएँ।

आज मुझे थोड़ी सफलता मिली। कुछ साधारण शब्दों में मैं उन्हें अपना सत्य समझा पाया। मैंने तीन साधारण वाक्यों में उन्हें अपना अनुभव समझाया:

  • संसार में कष्ट है।
  • कष्ट का कारण इच्छा और तृष्णा है।
  • इसलिए इच्छा और तृष्णा को मिटा देने से कष्ट भी मिट जाएँगे।

और इन पाँच लोगों को इस सत्य पर विश्वास हुआ। उन्होंने कहा कि वे मेरे साथ चलेंगे और इस सत्य का प्रचार-प्रसार पूरे विश्व में करने में मेरी सहायता करेंगे। विश्वास नहीं होता। इतनी शीघ्र हम एक से छह लोग हो गए। अगर इसी तरह से लोग जुड़ते गए तो संसार से कष्ट का निवारण होने में अधिक समय नहीं लगेगा।

संघ से जुड़े लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। आजकल जहाँ भी जाता हूँ वहाँ मेरी चर्चा मुझसे पहले पहुँच जाती है। लोग भिक्षा देने के लिए आतुर रहते हैं और सत्य के बारे में जानने को बेचैन। ऐसा लगता है कि पूरे संसार को ही इस सत्य की प्रतीक्षा थी।

पिताजी तक भी मेरी चर्चा पहुँच गई है। आज उनका संदेश लेकर कपिलवस्तु से लोग आए हैं। फिलहाल तो मैंने उन्हें टाल दिया है। कल वे भी मेरे प्रवचन में बैठेंगे। उसके बाद वह वापस जाकर पिताजी से क्या कहेंगे? क्या मेरा वहाँ जाना उचित होगा? कम-से-कम यशोधरा के लिए। ना जाने किस हाल में होगी। और राहुल? अब तो बड़ा हो गया होगा। शायद अपने पिताजी के बारे में पूछता होगा। क्या बताती होगी यशोधरा उसे?

किन्तु नहीं। अभी समय नहीं आया है। कई लोग संघ से जुड़े हैं। किन्तु मुझे नहीं लगता कि पिताजी अभी भी इसे मेरे बचपने से अधिक कुछ मानते हैं। अभी नहीं।

कपिलवस्तु से आए संदेशवाहक भी आज संघ में सम्मिलित होने के लिए सम्मति लेने आए थे। बड़ा ही आनंद हुआ। यशोधरा और राजपरिवार के लोगों के पास तो मैं इस सत्य को लेकर नहीं जा पाया हूँ। किन्तु कम-से-कम राज्य के कुछ लोगों का कल्याण तो होगा।

किन्तु आजकल एक और समस्या आ रही है। जब तक मैंने इस सत्य का प्रचार मुख्यतः विद्वज्जनों के बीच किया, वह सत्य क्या है, इतना बताना पर्याप्त होता था। लेकिन जैसे-जैसे मैं आम लोगों के बीच आ रहा हूँ, ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उन्हें मात्र इतना बताना पर्याप्त नहीं है। कुछ वैसी ही स्थिति हो रही है जैसी वर्षों पहले सारनाथ में हुई थी। लोगों की मेरे ऊपर श्रद्धा है। श्रद्धा का कारण यह है कि मुझसे मिलने के पूर्व ही वे मेरे बारे में, मेरे जीवन के बारे में बहुत कुछ सुन चुके हैं। इसलिए वे मेरी बातें सुनते हैं। इसलिए वे संघ से भी जुड़ते हैं। किन्तु सत्य को आत्मसात करना उनके लिए कठिन है। जो मैं समझ रहा हूँ, उसे लोगों को समझाने के लिए शब्दों में ढालने की आवश्यकता है। उन्हें यह बताने की आवश्यकता है कि वे इस सत्य को कैसे पा सकते हैं। मुझे और चिंतन करना होगा।

आज मैंने एक रोगी बच्चे को देखा। उसका रोग असाध्य नहीं था। कुछ सुलभ जड़ी-बूटियों से ही मैंने उसे ठीक कर दिया। मुझे आश्चर्य हुआ कि किसी वैद्य ने उसे अब तक ठीक क्यों नहीं किया था। पता चला कि वह तथाकथित छोटी जाति का था और कोई भी ऊँची जाति का वैद्य उसके पास आने को, उसका निरीक्षण करने को तैयार नहीं हुआ। कैसा अन्याय है ये? ये जाति-प्रथा हमारे समाज को कितना खोखला कर रही है। और सबसे बड़ी दुख की बात तो यह है कि जिन लोगों के साथ अन्याय हो रहा है, उन्हें भी नहीं लगता कि उनके साथ अनुचित हो रहा है। तो अन्याय का विरोध भी कौन करे? आज से मैंने यह निर्णय लिया है कि मैं इन लोगों का संसार के सत्य से साक्षात्कार कराने हेतु और अधिक प्रयत्न करूँगा। इनमें से अधिक-से-अधिक लोगों को संघ से जोड़ने की आवश्यकता है।

किन्तु एक अच्छा समाचार भी है। अष्टांग को मार्ग जो मैंने सोचा था, आम जनों के सत्य के रास्ते पर चलवाने के लिए, उसे लोगों ने हार्दिक रूप से स्वीकार किया है। संघ से पहले से जुड़ चुके लोगों को अपना मार्ग अब अच्छी तरह से दिख रहा है। संघ से जुड़ने वाले लोगों की संख्या में भी बहुत तीव्र गति से वृद्धि हो रही है। अब मैंने अपने सत्य की व्याख्या में एक चौथा वाक्य जोड़ दिया है कि अष्टांग के मार्ग पर चलने से इच्छा और तृष्णा का अंत किया जा सकता है।

पिताजी की ओर से अब तक सात संदेशे आ चुके हैं। संदेश ले कर आने वाले सभी लोगों ने संघ को अपना लिया है और वापस नहीं गए हैं। मुझे अभी भी कपिलवस्तु जाने का साहस नहीं हो रहा है।

और यशोधरा?

नहीं। मुझे उसके बारे में नहीं सोचना चाहिए। सांसारिक बंधनों से अब मेरा कोई नाता नहीं है। संघ में भी यही समस्या सबसे अधिक है। संघ के भिक्षुओं का स्त्रियों के प्रति झुकाव समस्या उत्पन्न करता है कई बार। संघ में अभी तक स्त्रियाँ सम्मिलित नहीं हुई हैं। मुझे लगता है कि इसे एक नियम ही बनाना पड़ेगा। ताकि आगे भी ऐसा ना हो। अन्यथा ये भिक्षु अपने पथ से भटक जाएँगे।

आज दसवीं बार पिताजी का संदेश आया है। इस बार उनके पत्र की भाषा से ऐसा लगता है कि उन्होंने मेरे रास्ते को स्वीकार कर लिया है। हालांकि वह अभी भी इसमें विश्वास नहीं करते, किन्तु वह मुझे रोकने के लिए अधिक प्रयत्न भी नहीं करेंगे।

संभवतः अब कपिलवस्तु जाने का समय आ गया है।

किन्तु कुछ बातें सही नहीं चल रही हैं। आज मैंने एक ऐसे पुरुष को देखा जो कि एक असाध्य रोग से पीड़ित था। उसके घर वालों ने मुझसे उसे आशीर्वाद देने और उसे अपनी शक्ति से ठीक कर देने की प्रार्थना की। वैसे ही, जैसे मैंने अन्य लोगों को ठीक किया है। मैंने उन्हें समझाने का प्रयत्न किया कि यह रोग असाध्य है और मैने लोगों को किसी दैवीय शक्ति से नहीं वरन् औषधियों से ठीक किया है। और उसके रोग के लिए कोई भी औषधि अभी तक के चिकित्सा-विज्ञान में ज्ञात नहीं है। किन्तु उन्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं हुआ। उन्हें लगा कि मेरे स्वागत में उनसे कोई कमी रह गई थी, इसलिए मेरा आशीर्वाद उस रोगी व्यक्ति को नहीं मिला। मैं उन्हें नहीं समझा पाया कि मैं आशीर्वाद देने वाला कौन होता हूँ।

यशोधरा! उसका बुझा हुआ रूप देखने के लिए मैंने अपने आप को किंचित् तैयार नहीं किया था। कहाँ गया वह यौवन, चेहरे की लाली, भरे हुए गाल, लंबे केश, आँखों की चमक? यह तो कोई और स्त्री मेरे सम्मुख खड़ी थी। और इस परिवर्तन का कारण क्या मैं था?

लेकिन जब उसने अपना मुख खोला तो मुझे पता चला कि उसे मान में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। मुझे लग रहा था कि वह मुझे ताने देगी, कोसेगी, रोएगी। और तब मैं उसे उस सत्य के बारे में बता पाऊँगा जो मैंने पाया है। और उसके कष्ट भी दूर हो जाएँगे। किन्तु उसने मात्र इतना पूछा, “अगर विश्व में कोई एक सत्य है तो वह जंगल में ही क्यों पाया जा सकता है, महल में क्या समस्या है?”

जब मैं सत्य की खोज में गया था तब मुझे पता नहीं था कि सत्य क्या है। बस इतना जानता था कि जहाँ मैं रहा हूँ, वहाँ किसी ने मुझे सत्य नहीं जानने दिया। इसलिए मैं चला गया। किन्तु यह मैं उससे बोल नहीं पाया। क्योंकि मुझे पता था कि इसके कारण मेरा उसके प्रति व्यवहार सही नहीं हो जाता। जब मैं सत्य नहीं भी जानता था, तब भी मैं कुछ और बातें जानता था। पुरुष और पिता के कर्तव्य। जो मैं जानता था, उससे भी मैंने मुँह मोड़ लिया था।

मैने जब एक बार फिर यशोधरा के चेहरे को देखा तो उस बुझे हुए चेहरे में भी मुझे वह कांति दिखायी दी, जो मैंने संघ के सबसे विद्वान् भिक्षुओं में भी नहीं देखी है। और मुझे ऐसा लगा कि यशोधरा ने भी सत्य को जान लिया है। और उसने सत्य से अधिक भी कुछ जान लिया है। शायद उसने जो जाना है उससे संसार का अधिक भला हो। किन्तु अब मैं बहुत आगे निकल चुका हूँ। मेरे ही बनाए नियमों के अनुसार संघ में स्त्रियाँ नहीं सम्मिलित हो सकती हैं। हर बात जो मैं यशोधरा से करना चाहता था, हर अनुभव जो मैं बताना चाहता था, बेमानी हो गए थे उस क्षण में।

मुझे कुछ नहीं सूझा। मैंने बात बदल दी, “देवि! भिक्षुक द्वार पर भिक्षा प्राप्ति हेतु खड़ा है।”

“मेरे पास मेरे पुत्र के अलावा कुछ नहीं है। मैं इसे आपको दान करती हूँ। आशा करती हूँ इसे सत्य किसी भिन्न तरीके से मिलेगा और संसार में एक और यशोधरा नहीं जन्म लेगी।”

उसने मुझे ताना दिया। किन्तु वह एक पत्नी द्वारा पति को दिया गया ताना नहीं था। वह एक ज्ञानी द्वारा अज्ञानी को दिया गया ताना था। मुझे रुकने की, कुछ सीखने की आवश्यकता थी। किन्तु मैं बहुत आगे निकल गया हूँ। अब मैं पीछे नहीं हट सकता।

आज के प्रवचन के बाद कपिलवस्तु के कई लोगों ने संघ में दीक्षा ली।

इतने वर्ष बीत गए हैं। इतने लोग संघ में आ चुके हैं। कितने लोगों ने चार मूल सत्य और अष्टांग को आत्मसात कर लिया है। किन्तु फिर भी मुझे संतुष्टि क्यों नहीं होती? ऐसा क्यों लगता है कि इन सिद्धांतों को अपनाने के बाद भी लोग सत्य को नहीं पा सके हैं?

आजकल लोग मेरा स्वागत धूप, दीप और अन्य पूजा की सामग्रियों से करने लगे हैं। कई स्थानों पर मेरी प्रार्थना के गीत लिखे जाने लगे हैं। लोग मेरे चरण-स्पर्श करना चाहते हैं और उन्हें लगता है कि बस मेरे आशीर्वाद मात्र से उन्हें निर्वाण मिल जाएगा। बड़े-बड़े, धनी सेठ और व्यापारी हमारे भिक्षुओं को विहार और उद्यान दान कर के पुण्य और निर्वाण की प्राप्ति करने का प्रयत्न कर रहे हैं। यह सब क्या हो रहा है? मैं तो संसार में सत्य का संदेश देने के उद्देश्य से निकला था। फिर सत्य से अधिक महत्वपूर्ण मैं कैसे हो गया? यह सही नहीं हो रहा है।

अब तो संघ इतना बड़ा हो गया है कि कई भिक्षु मुझसे अलग रह कर भी यात्रा करते हैं। मेरे नाम पर किन बातों का प्रचार किया जा रहा है इस पर अब मेरा वश नहीं रह गया है। सुना है कुछ स्थानों पर लोगों ने अष्टांग को लिखकर दीवारों पर चिपका लिया है और सुबह-शाम उसे पढ़ते हैं। क्या मैं कभी उन्हें समझा पाऊँगा कि उन्हें पढ़ने मात्र से किसी का कल्याण नहीं होगा। जब मैं लोगों को सत्य की महत्ता समझाने का प्रयत्न करता हूँ, ताकि वह मुझे सत्य और ईश्वर ना समझें, तो वे लोग इसे मेरा बड़प्पन समझते हैं।

ये मैंने क्या कर दिया है? विश्व को सत्य दिखाने के लिए निकला था मैं, लेकिन मैं तो लोगों को और भटका रहा हूँ। क्या कहा था उस नवयुवक ने, जो मुझसे कई वर्ष पहले जेतवन में मिला था। उसे पता था कि मैंने सत्य को पाया है। किन्तु हर किसी को अपना सत्य स्वयं ही ढूँढ़ना पड़ता है। इसलिए वह संघ की शरण नें नहीं आएगा। सत्य कहा था उसने। क्या उसे सत्य मिल गया?

आज जब राहुल को समाधि पर से उठते देखा तो मुझे उसके चेहरे पर वही कांति दिखाई दी जो मैंने यशोधरा के चेहरे पर अंतिम भेंट में देखी थी। राहुल ने मेरे चरण-स्पर्श किए और कहा,”भगवन्! आज मैंने अपना सत्य पा लिया है। और अब मुझे जाने की आवश्यकता है।”

मुझे उसकी बात पर एक बार में ही विश्वास हो गया। उसने सत्य पा लिया था। मैं पहली बार उसे लेकर एकांत में टहलने निकला। आज वह मेरा शिष्य या मेरा छोटा-सा बालक नहीं था। उससे मैं किसी बराबर वाले की तरह बात कर सकता था। मैंने उसे अपने मन की बात बताई। कि किस तरह मुझे लग रहा है कि मैने लोगों को सत्य के पास ले जाने के स्थान पर उन्हें और भटका दिया है। और किस तरह मुझे इन सबसे दूर चले जाने की इच्छा हो रही है।

राहुल के उत्तर में ऐसी गंभीरता थी, जिससे मैं आश्चर्यचकित हो गया, “भगवन्। मैं आपकी मनोदशा अच्छी तरह से समझ रहा हूँ। आपके साथ भेजने से पहले मुझसे माताजी ने कहा था ‘तुम्हें मैं तुम्हारे पिता के सुपुर्द कर रही हूँ। आशा करती हूँ कि तुम उनसे प्रेरित होगे और सत्य की खोज करोगे। किन्तु पुत्र! हर किसी को अपना सत्य स्वयं ही ढूँढ़ना पड़ता है। और सत्य जानने के बाद एक बात और जाननी होती है। कि उस सत्य को जानने के बाद जो सही लगे वह करो। किन्तु यह आशा मत रखो कि कोई और आसानी से वह सत्य तुम्हारे द्वारा पा लेगा।’ भगवन्, उनकी बातों को याद कर के मुझे आश्चर्य नहीं हो रहा आपके विचारों पर।”

यशोधरा जानती थी। यही वह बात थी जो वह जानती थी। मेरे सत्य के आगे की बात।

राहुल ने आगे कहा, “किन्तु एक और बात है जिसे आप अपनी निराश मनोदशा में अनदेखा कर रहे हैं।”

“वह क्या है?”

“भगवन्! मैं मानता हूँ कि आपका सत्य विश्व नहीं समझ पाया है। और आसानी से समझ पाएगा भी नहीं। किन्तु क्या आपने यह नहीं देखा कि कम-से-कम जाति प्रथा से प्रताड़ित लोगों में पहली बार एक आशा कि किरण जगी है। कर्मकांडों और कई अन्य सामाजिक बुराइयों के बारे में लोगों ने सोचना प्रारंभ तो किया है। मानता हूँ कि अगर लोग सत्य को समझ जाते तो ये सब बातें वैसे ही बेमानी हो जातीं। किन्तु जब तक पूरा विश्व सत्य को नहीं समझता, कम-से-कम कुछ तो पहले से अच्छा हो सकता है। यदि आज आप इन सबको बीच में छोड़ कर चले गए तो जो अविश्वास इनके मन में घर कर लेगा, उसके बाद तो सत्य की खोज के लिए कोई आशा ही नहीं बची रह जाएगी भगवन्।”

राहुल चला गया। वह दुनिया में सत्य के प्रचार का प्रयत्न नहीं करेगा। बस स्वयं सत्य के मार्ग पर चलेगा। और शायद उससे जिन थोड़े लोगों का कल्याण होगा, वह कम नहीं होगा। मेरे किए गए कार्य से अधिक सम्पूर्ण होगा।

यशोधरा! मैं उस दिन रुका क्यों नहीं? किन्तु अब तो और भी देर हो चुकी है। अब तो मैं और भी आगे निकल आया हूँ।

मुझे निर्वाण मिले बहुत समय बीत गया है। लोगों ने सत्य से दूर जाने को जो काम मेरे रहते ही प्रारंभ कर दिया था, वह तो अब और भी अधिक गहरी जड़े ले चुका है। मेरे नाम पर मंदिर बनाए गए हैं। कई जगहों पर मुझे भगवान माना जाता हैं। चीन और जापान में तो मेरे कई अवतार भी माने जाते हैं। बौद्ध धर्म भी बन गया है, जिसके अपने ही नियम हैं। और उस धर्म का ‘संस्थापक’ मुझे माना जाता है।

किन्तु इतिहास बदलने की शक्ति मुझमें नहीं है। काश! मेरे अंदर वह दैवीय शक्ति सच में होती, जो लोग मानते हैं कि मेरे अंदर थी। तो मैं इतिहास में जाकर कुछ घटनाओं को बदल देता। महात्मा बुद्ध का पहला उपदेश – सारनाथ में – कभी नहीं होता।

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तवायफ़

Posted by Jaya on April 27, 2008

“आइए बेग़म। बड़ा ही प्यारा शेर पढ़ रहे हैं हम। आप भी लुत्फ़ उठाइए।”

नूरी एक बार फिर भौंचक्की सी रह गई। उसकी समझ में नहीं आता था कि उसका शौहर आख़िर किस मिट्टी का इंसान है। वह उसके साथ शेर-ओ-शायरी पढ़ना चाहता था, उस्तादों की बनाई तस्वीरों पर चर्चा करना चाहता था, गायकी के सुर और ताल के बारे में बातें करना चाहता था। शौहरों की ऐसी ज़रूरतों के बारे में उसकी अम्मी, बड़ी बहनों और भाभियों ने उसे कुछ नहीं बताया था। शौहर को रिझाने और जनाने में अपनी जगह बना कर रखने की तरक़ीबें उसने सीखी थीं। लेकिन गाना-बजाना तो तवायफ़ों का काम होता है। शरीफ़ औरतों को उनके बारे में क्यों पता होने लगा? शेर-ओ-शायरी और तस्वीरों के बारे में जानकारी रखना कहाँ औरतों का काम था?

जब भी ऐसी अजीब सी फरमाइशें नवाब साहब उसके सामने रखते थे, उसका दिल एक अनजाने डर से भर जाता था। क्या वह उन्हें रिझाने में क़ामयाब नहीं हो पाई है? क्या उसे देखकर उनके दिल में ख़्वाहिशें नहीं उठती हैं?

फिर भी वह जाकर उनके क़रीब बिस्तर पर बैठ गई। कुछ देर तक बेमन से वे शेर सुनती रही जो नवाब साहब काफ़ी लुत्फ़ लेकर पढ़ रहे थे। नवाब साहब को यह अहसास होते देर नहीं लगी कि उनकी बेग़म को मज़ा नहीं आ रहा था। कोई नई बात नहीं थी, लेकिन फिर भी उनके चेहरे पर निराशा एक पल के लिए ज़ाहिर थी। मग़र बस एक पल के लिए। फिर उन्होंने क़िताब बंद कर के रख दी और शमाँ बुझाकर नूरी को बाँहों में ले लिया।

अब नूरी को अपनी ज़िम्मेदारी पता थी।

नवाब सफ़दर अपनी बेग़म के लिए अपने अहसासों को बहुत अच्छी तरह से समझ नहीं पाते थे। उनकी अम्मीजान के हिसाब से वह एक अच्छी बीवी थी। और जो क़सौटी उनकी अम्मीजान उनके सामने रखती थीं, उसके हिसाब से वह भी कोई और फ़ैसला नहीं कर सकते थे। वह उनका ख़याल रखती थी। उनकी हर बात को सर-आँखों पर लेती थी। नवाब साहब अग़र दिन को रात कहें तो वह शायद उसे भी मान लेती। उनकी जिस्मानी ज़रूरतों को बहुत अच्छी तरह से समझती थी, उनके गुस्से को समझती थी। एक नवाबी ख़ानदान की बहू होने की सारी खूबियाँ थी उसमें और जो चीज़ें औरतों को नहीं करनी चाहिए, उनमें से कुछ भी करने की सोचती भी नहीं थी।

अच्छी बीवी थी वह। लेकिन…

नवाब सफ़दर जब सत्रह साल के थे तब उनके हम-उम्र भाई और दोस्त उन्हें मर्दानग़ी और नवाबों की शान का हवाला दे कर शहर के एक मशहूर कोठे पर ले गए थे। लेकिन सफ़दर वहाँ ज़्यादा देर रुक नहीं पाए थे। वे अपनी अम्मीजान के बहुत क़रीब थे और अपने अब्बाजान की उनको लेकर ज़िन्दग़ी भर की बेरुख़ी के असर को बहुत शिद्दत से महसूस किया था। बचपन से ही अपने अब्बाजान की तरह ना बनने का फ़ैसला किया था उन्होंने। ऐसा नहीं है कि जवानी की ज़रूरतों ने उन्हें लालच ना दिया हो; और दोस्तों के मज़ाक पर ध्यान नहीं देना भी आसान नहीं था। लेकिन कुछ ही दिनों में उनका निक़ाह होने वाला था। नूरी के साथ। अम्मीजान की पसंद थी वह। उसके साथ सफ़दर कभी भी वैसा कुछ नहीं होने देंगे, जैसा उनकी अम्मी के साथ हुआ था।

और उस रात तक, तवायफ़ों की सोहबत के नवाबी शौक से अपने आप को दूर रखने में वे क़ामयाब भी हुए थे। लेकिन उस रात, अपने अजीज़ दोस्त के यहाँ सजी महफ़िल में कुछ बदल गया। उन्होंने निक़हत – निक़हत जान – को शेर पढ़ते हुए सुना उस महफ़िल में। जब निक़हत महफिल में तशरीफ़ लाई तो सफ़दर चौंक गए। दो पल के लिए उन्हें समझ में भी नहीं आया कि क्या करना है। मर्दों की महफ़िल में एक औरत का यों धड़ल्ले से चले आना और वह भी बिना परदे के? उनकी समझ में कुछ आता, इससे पहले ही उन्हें यह अहसास हुआ कि वे अकेले हैं, जिन्हें कुछ अजीब लग रहा है। बाकी लोगों की इस औरत के साथ बड़ी बे-तक़ल्लुफ़ी से दुआ-सलाम चल रही था। लोग उनकी ख़ुशामदीद करने के लिए आगे भी बढ़ गए थे। आख़िरकार माहौल थोड़ा शांत हुआ तो निक़हत की नज़र उनपर पड़ी। झिझक और अचरज साफ दिखी उसकी आँखों में एक पल के लिए। फिर जल्दी ही ख़ुद को सँभाल कर वह आगे बढ़ी और नवाब सफ़दर की और देखते हुए थोड़ा झुक कर बोली, “आदाब नवाब साहब।”

सफ़दर अभी भी नहीं समझ पा रहे थे कि क्या करें। उनके मेजबान ने मौके को सँभाल लिया। बोले, “इनसे तो आपकी पहचान करवानी पड़ेगी निक़हत जान।”

यह सुनकर नवाब साहब को समझ में आया कि उनके सामने एक तवायफ़ खड़ी थी।

निक़हत ने बिना एक पल गँवाए मेजबान को जवाब दिया, “इनकी पहचान की ज़रूरत हमें नहीं है हुज़ूर। हाँ, ये हमारे बारे में कुछ नहीं जानते होंगे। तो इन्हें बताने की तोहमत आपको उठानी पड़ेगी।”

मेजबान चौंक पड़ा, “आप इन्हें पहचानती हैं? पर कैसे? ये तो कभी…”

निक़हत ने उनकी बात बीच में काट कर कहा, “तशरीफ़ नहीं लाते हम जैसों के यहाँ। लेकिन हुज़ूर किसी का हमेशा होना उसे पहचाना सा बना देता है, तो किसी का कभी ना होना भी उसकी ऐसी पहचान बनाता है कि हर कोई उसे पहचानता है। क्यों नवाब सफ़दर साहब?”

मेजबान ने कहा, “अब आपसे तो बातों में कौन ही जीतेगा निक़हत जान।”

उसके बाद मेजबान ने नवाब सफ़दर को जो बताया निक़हत के बारे में, उससे उन्हें पता चला कि निक़हत उस शहर में ही नहीं, काफ़ी दूर-दूर तक मशहूर थी। और चर्चा उसकी ख़ूबसूरती और अदाओं की उतनी नहीं थी, जितनी उसकी शायरी और गायकी की थी। न चाहते हुए भी सफ़दर को कौतूहल हुआ निक़हत के बारे में और जानने का। लेकिन उन्होंने ख़ुद को ज़ब्त किया। उसके बाद जब सब लोग बैठे तो मानो उनके तक़ल्लुफ़ का पूरा मज़ा उठाने के लिए निक़हत नवाब सफ़दर के बग़ल में आ कर बैठ गई।

शायरी का दौर शुरु हुआ। जब नवाब सफ़दर की बारी आई, तो उन्होंने ये शेर पढ़ा,

आशिक समझा हमें ख़ुदा भी समझा,
ग़म ये कि उसने इन्सान ना समझा।

फिर निक़हत की बारी आई। तो वह थोड़ी देर चुप रही, कुछ सोचती हुई सी। किसी ने टोका, “क्या बात है निक़हत जान? ऐसा क्या हुआ कि आप अपने शेर भूल गईं?”

निक़हत ने कोई जवाब नहीं दिया। फिर नवाब सफ़दर की आँखों में सीधे देखते हुए ये शेर पढ़ा,

इन्सानों की पहचान रखते हैं जो उनके
पहलू में आने की बात इन्सान ना समझा।

सफ़दर सोच में डूब गए। महफ़िल ख़तम हो जाने के बाद भी वह निक़हत के बारे में सोचने से ख़ुद को रोक ना सके। उस रात पहली बार नूरी ने महसूस किया कि नवाब साहब उसके पास होकर भी कहीं और थे।

उस रात के अपने मेजबान दोस्त की महफ़िल में अब वे अक्सर जाने लगे। निक़हत से बेतक़ल्लुफ़ी बढ़ी और उसकी ओर खिंचाव भी। सफ़दर परेशान थे, लेकिन खुश भी। उन्हें लगता था कि वे निक़हत के जाल में फँसते जा रहे हैं, लेकिन मन की बातें किसी से कहने की ऐसी आजादी उन्होंने पहले नहीं जानी थी। निक़हत के साथ ज़्यादा समय बिताना उन्हें लाज़िमी लगने लगा।

लेकिन एक तवायफ़ और एक नवाब का अकेले साथ समय बिताने के लिए एक ही मुनासिब जगह और वक़्त था। तवायफ़ का कोठा और रात का वक़्त। यह फ़ैसला करना नवाब साहब के लिए आसान नहीं था। कई दिनों तक उन्होंने ख़ुद को जब्त किए रखा। दोस्त की महफ़िलों में गए। अपने घर पर भी महफ़िलें रखीं। सब में निक़हत शरीक़ होती। तक़रीबन छह महीने ऐसे ही बीते। इस बीच नवाब साहब को यह भी ख़बर मिली कि वे बाप बनने वाले हैं। नूरी एक महीने पहले अपने मायके जा चुकी थी।

एक दिन एक दोस्त के यहाँ बागीचे में महफिल लगी थी। निक़हत और सफ़दर औरों से थोड़ा पहले ही पहुँच गए थे। मेजबान अभी भी तैयारियों में ही लगे थे। सफ़दर ने उनसे कहा कि वे परेशान न हों और जब तक बाकी लोग आते हैं, तब तक वे उस ख़ूबसूरत बागीचे में टहलने का मज़ा उठाएँगे। और शायद इसमें निक़हत जान भी शिरक़त करें।

मेजबान दोस्त ने एक चुटीली सी मुस्कान के साथ कहा कि उन्हें ज़रूर बागीचे की ठंढी हवा का लुत्फ़ उठाना चाहिए। वे दोनों निकल पड़े।

छह महीनों में यह पहला मौक़ा था जब वे दोनों अकेले साथ में थे। सफ़दर ने निक़हत से शायरी और गायकी के उनके शौक के बारे में पूछा। निक़हत ने उन्हें कोठे पर मिलने वाली तालीम के बारे में बताया। कितनी सख़्ती के साथ उन्हें गायकी और रक़्स के अलावा अरबी, फ़ारसी और उर्दू की तालीम भी दी गई थी। कितने शायरों को उसने बचपन से पढ़ा है। कैसे मौलाना साहब ने उसकी अपनी शायरी को तराशा, जो कि आज वह किसी को पसंद आने लायक शेर लिख सकती है।

सफ़दर को पहली बार इस बात का अहसास हुआ कि जिस तरह की तालीम इन मशहूर कोठों पर तवायफ़ों को मिलती है, उसके बारे में उनके ख़ानदान की शरीफ़ औरतें सोच भी नहीं सकती हैं। बिना मतलब समझे क़ुरान की चंद आयतें याद करना ही उनके लिए बहुत बड़ी तालीम है। औरतें तो क्या, कई मर्द भी अपनी तालीम इतनी संजीदग़ी से नहीं लेते। अपने ख़ानदान की पर्दा-नशीन औरतों और कई बिगड़ैल मर्दों के चेहरे उनकी आँखों के आगे घूमने लगे।

काफ़ी देर तक बाते चलती रहीं। दोनों महफ़िल के बारे में भूल ही गए। सफ़दर ने निक़हत को अपने घर वालों के बारे में बताया। अम्मीजान के बारे में, नूरी के बारे में। अपने बड़े भाईजान के बारे में, जिनकी हाल में ही किसी लाइलाज बीमारी से मौत हो गई थी। सफ़दर को ख़ुद पर आश्चर्य हो रहा था। इतनी बातें उन्होंने आज तक किसी से नहीं की थी। बातें भी कुछ ख़ास या बड़ी-बड़ी नहीं कर रहे थे। लेकिन उन छोटी-छोटी बातों में ही बड़ा मज़ा आ रहा था उन्हें।

अचानक उन्हें याद आया कि महफ़िल शुरू हो गई होगी। उन्होंने निक़हत को भी याद दिलाया। और थोड़ा उदास होकर कहाकि उन्हें बहुत अच्छा लगा निक़हत की सोहबत में। जाने फिर कभी ऐसा मौक़ा मिले या नहीं। निक़हत ने कहा, “नवाब साहब के हुक़्म करने की देर है। बंदी की पूरी शाम उनकी ही रहेगी।”

सफ़दर चौंक से गए, “मग़र…”

निक़हत ने उनकी बात काटते हुए कहा, “आप तसल्ली रखें। किसी को कुछ पता चलने की ज़रूरत नहीं है। पीछे की तरफ़ से जो कोठे का दरवाज़ा है, वहाँ से बिना किसी की नज़र में आए, नवाब साहब हमारे कमरे में आ सकते हैं। कल हम ख़याल रखेंगे कि हमारे पास और कोई न आए।”

“नहीं निक़हत। इसकी ज़रूरत नहीं है। हम नहीं आ पाएँगे।”

“कोई बात नहीं। बंदी की एक शाम इतनी बेशक़ीमती भी नहीं है कि बरबाद होने से दुनिया में कोई तूफ़ान आ जाए। हमारे पास कल कोई और नहीं आएगा।”

कहकर निक़हत आगे बढ़ गई। जब दोनों बाकी लोगों के पास पहुँचे, तो महफ़िल शुरू हुए काफ़ी वक़्त बीत चुका था। किसी ने उन्हें देखते ही कहा, “आइए निक़हत जान। आज तो आपने अपने साथ-साथ हमारे पाक़-दामन दोस्त की शायरी से भी हमें मरहूम कर दिया।”

निक़हत ने छूटते ही जवाब दिया, “काश कि इस मुश्किल काम को करने का सेहरा हम अपने सर पर बाँध सकते जनाब। नवाब साहब को तो बागीचे के गुलाबों ने ऐसा पागल कर दिया कि वहीं बैठ कर शेर लिखने लगे और रास्ता तक भटक गए उनके पीछे।”

सफ़दर ने पल भर के लिए शुक्र-गुज़ार नज़रों से निक़हत को देखा।

महफ़िल में बैठे किसी और आदमी ने कहा, “आप जो भी कह लें निक़हत जान। हम तो आपको ही क़सूरवार ठहराएँगे। और आपकी सज़ा ये है कि एक-आध शेर नहीं, एक पूरी ग़ज़ल आप हमें गा कर सुनाएँ।”

“गा कर? मग़र अभी साज़िंदे कहाँ हैं?”

“क्यों नख़रे कर रही हैं निक़हत जान। आपकी आवाज़ भी भला किसी साज की मोहताज है।”

“आप हमें भले ही कुसूरवार ठहराएँ, लेकिन हमारे क़ुसूर में नवाब साहब का भी तो बराबर का हिस्सा है। उन्हें कोई सज़ा नहीं मिल रही तो कम-से-कम वे ख़ुद हमें गाने के लिए तो कहें।”

लोग हँस पड़े। सफ़दर भी मुस्कुरा दिए, “हम बड़ी बेचैनी से आपको गाते हुए सुनने का इंतज़ार कर रहे हैं।”

“ठीक है। कल ही लिखी है ये ग़ज़ल हमने।”

और निक़हत ने अपनी सुरीली आवाज़ में यह ग़ज़ल सुनाई।

मेरी नज़रों ने जब तीर चलाए
सब घायल होने मेरे दर आए।

पर कौन है वो जो दूर जा रहा
कि तीर कहीं ये चुभ ना जाए।

मुसाफ़िर न तेरे पंख कटेंगे
एक बार गर नज़र मिलाए।

आजा मेरे आँगन दम भर
ज़रा देर तो हम मुसकाएँ।

—-

अगले दिन शाम को नवाब सफ़दर अकेले ही घूमने निकले। निक़हत के कोठे से पाँच कोस दूर उन्होंने कोचवान को वापस जाने को और अगली सुबह वहीं मिलने को कहा। उससे यह भी कहा कि अम्मीजान को कहलवा दें कि वे रात एक दोस्त के यहाँ बिताएँगे।

निक़हत ने जब दरवाज़ा खोला तो नवाब साहब घबराए हुए थे। लेकिन अंदर वाक़ई कोई नहीं था। साज़िदे तक नहीं। वे चले तो आए थे लेकिन उन्हें भरोसा नहीं था कि निक़हत अपनी पूरी शाम सच में खाली रखेगी। वह भी तब जब उन्होंने आने का कोई वादा भी नहीं किया था। लेकिन निक़हत ज़ुबान की पक्की निकली।

कमरा खाली देखने के बाद नवाब साहब को बेतक़ल्लुफ़ होने में ज़्यादा देर नहीं लगी। दोनों में से किसी ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा या किया जिससे ऐसा लगता कि उनका वहाँ आना कोई नयी बात है। रात भर बातों, शायरी और गायकी का दौर चलता रहा। साज़िंदे नहीं थे तो नवाब साहब ने ख़ुद ही बीच-बीच में कुछ साज़ उठा लिए।

सुबह उन्होंने दो दिन के बाद फिर से आने की बात कही और निकल पड़े। उनके जाने के बाद निक़हत की नज़र साज़ों के बीच रखी एक थैली पर पड़ी। उसने उसे खोला तो उसमें ढेर सारे सोने के सिक्के पड़े थे।

दो दिन बाद जब नवाब साहब वापस आए तो उन्होंने तस्वीर बनाने के लिए रंगों और कागज़ की फ़रमाइश की। उस रात उन्होंने निक़हत की एक तस्वीर बनानी शुरू की। कुछ देर बना कर फिर आगे पूरी करने की सोचकर बैठ गए।

“जानती हैं निक़हत, कितनी बार दिल चाहा कि नूरी की एक तस्वीर बनाएँ हम। लेकिन कभी पूछ भी नहीं पाए। हमेशा ऐसा लगा जैसे कि उन्हें सही नही लगेगा।”

“शायद आपको ठीक ही लगा। वैसे आप ये क्यों छोड़ कर गए थे?” निक़हत के हाथ में वह थैली थी।

“इतने दिनों से आपके बारे में सुनकर हमें ये तो पता चल ही गया है कि आपका समय बहुत कीमती है। उसे यों ज़ाया करवाना भी तो सही नहीं है।”

“ठीक है। लेकिन यों चुपचाप छोड़ कर जाने की क्या ज़रूरत थी? ख़ुद दे कर भी तो जा सकते थे।”

“अब आप इसे जो भी समझें निक़हत। लेकिन शायद हम कभी ऐसा कर नहीं पाएँगे। ये एक ज़िद हमारी मान लीजिए। वरना यहाँ आना हमारे लिए मुश्किल हो जाएगा।”

निक़हत ने सर हिला कर हामी भरते हुए वह थैली बगल में रख ली।

“निक़हत। नूरी जब से वापस आईं हैं, उन्हें पता चल गया है कि हम यहाँ आते हैं।”

“पर्दा-नशीन औरतों की दुनिया अपने शौहर से शुरू होकर उनपर ही ख़त्म होती है नवाब साहब। उन्हें कैसे पता नहीं चलेगा?”

“लेकिन हम ये भी जानते हैं कि जिस्मानी ज़रूरतों के अलावा हमारे यहाँ आने की कोई वजह हो सकती है, ये वह कभी नहीं समझेंगी। कम-से-कम हमसे कुछ पूछें तो हम समझाने की कोशिश भी करें।”

“कैसे पूछेंगी नवाब साहब? आपकी अम्मी ने कभी आपके अब्बा से कुछ पूछा था।”

“नहीं।” सफ़दर ठंढी साँस लेते हुए बोले।

“उन्हें बचपन से सिखाया गया है कि शौहरों का हक़ है ये। उन्हें रोकने या कुछ पूछने का काम औरतज़ात का नहीं है। अगर वो अपने मायके में मिली तालीम भूल भी जाएँ, तो आपकी अम्मीजान नहीं भूलने देंगी उन्हें।”

“अम्मीजान?”

“जी। क्योंकि उनका भी यही ख़याल है।”

“लेकिन वह पूरी ज़िदग़ी दुखी रही हैं अब्बाजान की आदतों से।”

“लेकिन उसके लिए उन्होंने ख़ुद को क़सूरवार ठहराया है। कि वो अपने शौहर को रिझा कर रख न सकीं। और अभी वह आपकी बेग़म को भी इसी के लिए कोस रही होंगी।”

“निक़हत – आप सबकुछ कैसे जानती हैं?”

निक़हत ठहाका लगा कर हँस पड़ी।

“आपने कभी अपने ख़ानदान की औरतों से हम जैसी औरतों की चर्चा की है नवाब साहब? वे नफ़रत भरे लफ़्ज़ों में आपको बताएँगी कि हमने घाट-घाट का पानी पिया हुआ है। और सच भी है। हमने दुनिया देखी है।”

“बुराई क्या है दुनिया देखने में निक़हत?”

“पता नहीं हमें। आपको भले ही ऐसा लगे, लेकिन सच ये है कि हम सब कुछ नहीं जानते हैं। जैसे कि इस सवाल का जवाब हमारे पास नहीं है। दुनिया देखने में क्या बुराई है?”

निक़हत सोच में डूब गई। नवाब साहब भी चुप थे।

“कभी यों सोचा नहीं था नवाब साहब। लेकिन अब ये अजीब-सी बात बड़ी ज़ाहिर लग रही है। हमारे समाज में एक आदमी के पास दुनिया देखने के कई तरीक़े हैं। वह अपने किसी भी फ़न का इस्तेमाल कर सकता है और दुनिया में अपने बूते पर रह सकता है। वह नवाबों को शायरी सुना कर अपना पेट भर सकता है और शरीफ़ों की ज़िंदग़ी जी सकता है। लेकिन अपने आप को शरीफ़ कहलाने का एक ही ज़रिया है एक औरत के पास। वह है परदा। और परदा करने के बाद ना वह शायरी कह सकती है, ना गीत गा सकती है, ना तस्वीरों की समझ रख सकती है, ना ही दुनिया में अकेले क़दम रख सकती है। ये सब उसकी शराफ़त पर बट्टा लगाते हैं।”

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद निक़हत फिर बोली, “कोई भी फन सीखने का, उसे दुनिया को दिखाने का हक़ औरत को एक ही सूरत में मिल सकता है नवाब साहब। और वह तब जब वह अपना जिस्म बेचने लगे, और तवायफ़ बन जाए। इसलिए हमें तालीम मिली। इसलिए हम आज आपको शायरी सुना सकते हैं, आपसे अपनी तस्वीर बनवा सकते हैं। और कोई कुछ नहीं कहेगा। आपकी बेग़म भी नहीं।”

“आपको बुरा नहीं लगता निक़हत। इस तरह…”

“कोठे पर रहना?”

“हाँ?”

“हमारा तो जन्म कोठे पर ही हुआ था। हमारी अम्मी की कहानी और थी। वह अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ यहाँ लाई गईं थीं। ज़िन्दग़ी भर दुखी रहीं कि शराफ़त की ज़िदग़ी नहीं मिली उन्हें। कभी अपने पेशे को दिल से अपना नहीं पाई वह। उन्हें शायद हमेशा बुरा लगता रहा यहाँ रहना। मग़र हम? हमारे लिए एक तवायफ़ बनना उतनी ही आम बात थी, जितनी ख़ानदानी औरतों के लिए परदा करना। अभी भी है। अजीब लग रहा होगा ना सुनकर आपको। हमें शर्मिंदग़ी नहीं है अपने पेशे पर।”

नवाब साहब चुप ही रहे। उनके चेहरे से उनके दिल की बात का कोई पता नहीं चल रहा था।

निक़हत ने अपनी बात ज़ारी रखी, “शायद एक दिन ऐसा आएगा जब औरत को दुनिया देखने के लिए तवायफ़ बनना ज़रूरी नहीं रहेगा…”

“निकहत। आप हमारे साथ चलिए। हमारे घर।”

“इज़्ज़त के साथ नवाब साहब? जनाने में?”

“हाँ।”

निक़हत ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “आपने हमें अपनी बात पूरी करने का मौक़ा नहीं दिया नवाब साहब। शायद एक दिन ऐसा आएगा, जब औरत को दुनिया देखने के लिए तवायफ़ बनना ज़रूरी नहीं रहेगा, जब वह भी अपने और फनों के साथ सर उठा कर जी सकेगी। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता है, हम परदा-नशीन शरीफ़ औरत की बजाय दुनिया देखने वाली तवायफ़ ही रहना पसंद करेंगे। जनाने के परदे में हमारी गायकी मर जाएगी नवाब साहब, हमारी शायरी दम तोड़ देगी और हमारी तालीम… उसे जंग लग जाएगी। हम यहीं ठीक हैं नवाब साहब। आपके जनाने में हम वह निक़हत नहीं रह जाएँगे जिसकी सोहबत आपको अच्छी लगती है। हम भी एक नूरी बन जाएँगे।”

“पता है निक़हत। हम अक्सर सोचते थे कि हम क्यों यहाँ खिंचे चले आते हैं। जिस्मानी रिश्ते नहीं हैं हमारे। फिर भी। कई तरह के जवाब ख़ुद को दिए हमने। लेकिन आज हमें सही जवाब मिला है।”

निक़हत की चेहरे पर थोड़ा डर सा छा गया, “और क्या है वह जवाब?”

“आदमी और औरत को ख़ुदा ने एक दूसरे की शरीक़-ए-ज़िंदग़ी बनने के लिए इस रिश्ते में डाला है। निक़ाह हम उसी शरीक़-ए-ज़िंदग़ी को पाने के लिए करते हैं। मगर हम इंसानों के समाज ने औरत और मर्द की ज़िंदग़ी ही इतनी अलग-अलग कर दी है कि वे एक दूसरे की ज़िंदग़ी में शरीक़ हो ही नहीं सकते। और निक़ाह का रिश्ता जिस्मानी रिश्तों से आगे जा ही नहीं पाता। निक़हत – हमारे और आपके रिश्ते को हम कभी पाक साबित नहीं कर सकते। आज के लोग, आने वाली नस्लें इसे जिस्म की भूख का नतीज़ा मानेंगी। और हम शायद उन्हें ये कभी नहीं समझा पाएँगे कि आप में हमने शरीक़-ए-ज़िन्दग़ी को पाया है। जबकि वह हमारा निक़ाह का रिश्ता है जो हमबिस्तर होने के अलावा और कुछ न बन सका। हाँ निक़हत – और दुनिया फिर भी आपको तवायफ़ और नूरी को शरीफ़ औरत कहेगी।”

“दुखी न हों नवाब साहब। हम फिर भी खुश हैं।”

नवाब साहब उठ कर खड़े हो गए। निक़हत भी उनके पीछे खड़ी हो गई। सफ़दर ने आगे बढ़कर निक़हत का चेहरा अपने हाथों मे लिया और बोले, “हमेशा ऐसे ही खुश रहिए निक़हत। लेकिन अब हमें जाना होगा। हम नूरी को अम्मीजान की तरह दुख और पछतावे की ज़िंदग़ी जीते नहीं देखना चाहते। जो वह नहीं समझती, उसमें पूरे समाज की ग़लती है, उनकी नहीं। और अपनी बच्ची को हम बेहतर तालीम देना चाहते हैं। आपके साथ बिताए गए पल हमारी ज़िंदगी के सबसे ख़ूबसूरत लम्हे बनकर हमारे साथ रहेंगे। और हम इस अहसास के साथ खुश रहेंगे कि हमें हमारी शरीक़-ए-ज़िंदग़ी मिली थी। आप भी हमेशा खुश रहिए।”

इतना कह कर नवाब साहब पीछे हट गए। पहली बार उन्होंने निक़हत को छुआ था!

निक़हत की आँखों में आँसू से थे, जिसपर उसने फ़ौरन क़ाबू पा लिया। फिर अपनी तस्वीर, जो अब पूरी हो चुकी थी, नवाब साहब को देती हुई बोली, “इसे रखिए। हमें याद करते रहिएगा। हम ख़ुश रहेंगे।”

नवाब सफ़दर तस्वीर लेकर फ़ौरन बाहर निकल गए।

उनके जाने के बाद निक़हत को कमरे में साज़ों के बीच एक और थैली मिली। सिक्कों से भरी हुई।

नूरी की चिंता के दिन चले गए थे। उसने सोचा कि शायद बेटा ना होने की वजह से नवाब साहब उससे नाराज़ थे और दूर हो गए थे। मग़र अब उन्होंने उसे माफ़ कर दिया है। इतना ही नहीं, वह अपनी बेटी की परवरिश में बहुत दिलचस्पी लेने लगे थे। घंटों उसे और अपने मरहूम बड़े भाई साहब के लड़के, शौकत, को अपने साथ लेकर बैठे रहते थे और उनसे बातें किया करते थे।

कहकशाँ, नूरी और नवाब साहब की बेटी अब तेरह साल की हो चुकी थी। ख़ुद नवाब साहब ने उसे और शौकत को साथ-साथ हर तरह की तालीम दी थी और अभी भी दे रहे थे। दोनो ही बच्चों का दिमाग़ तेज़ था और नवाब साहब मन-ही-मन यह सोचकर ख़ुश होते थे कि उनकी बेटी और औरतों की तरह नहीं होगी। शराफ़त के दायरे में रहकर भी वह किसी की हमसफ़र बन सकेगी, सिर्फ़ हमबिस्तर नहीं। शायद शौकत की। एक-सी परवरिश और तालीम को साथ दोनों की जोड़ी अच्छी रहेगी।

लेकिन पिछले एक महीने से उन्हें शौकत के बर्ताव में काफ़ी बदलाव-सा नज़र आ रहा था। वह कहकशाँ की मौज़ूदगी में बड़ा चुप-चाप सा बैठा रहता था। उससे बातें करने से कतराता था।

एक दिन सफ़दर कहकशाँ के साथ बैठे कुछ शेर पढ़ रहे थे, तभी शौक़त वहाँ से गुज़रा। सफ़दर ने उसे आवाज़ लगाकर पास बुलाया और पूछा उससे कि कोई दिक्कत तो नहीं है उसे। वह बहुत परेशान-सा लग रहा था उन दिनों। उसी समय उन्हें अपना गला सूखता हुआ महसूस हुआ तो उन्होंने कहकशाँ को पानी लाने को कहा। तभी अचानक से शौकत बोल पड़ा, “चचाजान। हमें लगता है कि कहकशाँ का अब यों मर्दों की सोहबत में रहना ठीक नहीं है। शायरी, संगीत ये सब शरीफ़ घर की औरतों के लिए नहीं हैं। अच्छा यही होगा कि अब वह परदा करे और जनाने में ज़्यादा समय बिताए।”

नवाब साहब को शौकत की बात सुनकर ऐसा झटका लगा कि वह थोड़े समय के लिए कुछ बोल ही नहीं पाए। फिर उन्होंने बोलने की कोशिश की, “मगर बेटा…”

“देखिए चचाजान। इस मामले में बहस करने से कोई फ़ायदा नहीं है। लोग बातें बनाने लगे हैं। कहकशाँ के लिए भी यही अच्छा है। दादीजान भी हमेशा कहती रहती हैं कि कहकशाँ को औरतों के क़ायदे सीखने की ज़रूरत है।”

कहकशाँ उस वक़्त तक चेहरे पर बिना कोई शिकन लाए उनकी बातें सुन रही थी। उसी तरह से वह अब बोली, “शायद ये ठीक ही कह रहे हैं अब्बाजान। अम्मीजान और दादीजान भी तो यही चाहती हैं। आज से हम जनाने में ही रहेंगे पूरे दिन।”

एक झटके से मुड़कर वह अंदर गई और परदा किए हुए बाहर निकली। अपने अब्बाजान को जब उसने पानी दिया तो नवाब साहब को पता लग गया कि परदे के पीछे उन आँखों में आँसू थे।

उस रात मुज़रा करते समय एक शख़्स को अंदर आते देख कर निक़हत की आवाज़ पल भर के लिए लड़खड़ा गई। गज़ल तो उसने सँभाल ली, मग़र उसके बाद तबीयत ठीक ना होने का बहाना कर के अंदर चली गई। एक-एक करके सब लोग चले गए। साज़िंदे भी साज़ समेट कर निकल गए। तब नवाब सफ़दर निक़हत के कमरे में घुसे। वह ज़मीन पर पैर फैलाए बैठी हुई थी। सफ़दर अपना सर उनकी गोद में रखकर लेट गए और आँखें बंद कर ली। निक़हत ने उनका माथा सहलाते हुए उन्हें ये कहते सुना, “शायद एक दिन ऐसा आएगा, जब औरत को दुनिया देखने के लिए तवायफ़ बनना ज़रूरी नहीं रहेगा”

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स्वर्ण-जयंती

Posted by Jaya on August 9, 2005

Okay – could not give up the temptation of making the 400th post on this blog. (yep! This is the one :-D ) So, decided to put this up.

A ’story’ again – though elsewhere, I have mentioned my limitations with story-writing.

And once again, it was written long back – 18/08/1997). That is almost 8 years back. So, please keep the age of the author in mind, while reading the work :-D

विद्यालय परिसर में काफी चहल-पहल थी। शिक्षक और विद्यार्थी भाग-दौड़ कर रहे थे। स्वयं प्राचार्य भी काफ़ी व्यस्त नज़र आ रहे थे। शारीरिक शिक्षा-निदेशक की व्यस्तता कुछ विशेष ही थी। माइक और साउण्ड-बॉक्स व्यवस्थित किए जा रहे थे। मंच-सज्जा का सूक्ष्म निरीक्षण हो रहा था। इस अवसर पर होने वाले कार्यक्रमों में भाग लेने वाले विद्यार्थियों की स्टेज-रिहर्सल हो रही थी।

ये तैयारियाँ ज़रा भी अप्रत्याशित नहीं थीं। आख़िर स्वतंत्रता की स्वर्ण-जयंती मनाई जाने वाली थी।

हाँ! स्वर्ण-जयंती – आज़ादी की। वह आज़ादी जिसके पीछे न जाने कितनी क़ुर्बानियाँ, कितने दुस्साहस और कितने दृढ़ संकल्प छिपे थे। जिसके पीछे कैसी दीवानगी थी कि न जीवन से कोई मोह रह गया था, न ही मृत्यु से कोई भय। उसी आज़ादी की स्वर्ण-जयंती थी। निश्चय ही यह एक ऐतिहासिक मौक़ा था।

इस ‘महान् अवसर’ पर मुझे भी अपने विचारों को भाषण के माध्यम से व्यक्त करने का अवसर मिलना था। निश्चित समय पर मैं मंच पर चढ़ी और अपने उद्गार व्यक्त करना लगी,”…. बच्चे-बच्चे को शिक्षा देना हमारा पहला लक्ष्य है। चाहे वो अमीर हो या गरीब, लड़की हो या लड़का, ब्राह्मण हो या शूद्र….।” कि अचानक नज़रें हमारे विद्यालय के ‘सभ्य और अनुशासित’ विद्यार्थियों के पीछे खड़े बगल की बस्ती के कुछ ‘असभ्य’ बच्चों पर पड़ीं। एक लड़की थककर नीचे बैठी दुई थी। गोद में एक छोटा-सा बच्चा, संभवतः उसका छोटा भाई था, लेटा हुआ था। भाषण के किसी उत्तेजक भाग पर करतल-ध्वनि करने की सभ्यता नहीं आती थी उसे, क्योंकि ‘वंदे मातरम’का अर्थ नहीं जानती थी वो। मेरी आवाज़ कुछ लड़खड़ाई, किन्तु यह असर क्षणिक था। मैंने फ़ौरन ख़ुद को सँभाला। आख़िर मैं एक ‘कुशल वक्ता’ थी । अपनी ‘पहचान’ का भी तो ख़्याल रखना था।

लेकिन वह दृश्य दिमाग से नहीं उतरा। मंच से उतरने के बाद उसके पास गई। उसके विषय में पूछा, उसकी पढ़ाई के विषय में पूछा। पता चला,”बाबूजी कमाने के लिए पंजाब गए हुए हैं। माँ रोज़ सुबह घास काटने चली जाती है। मेरी एक बड़ी बहन है, शादी हो चुकी है। मेरे बाद दो बहनें हैं, फिर यह भाई। रही बात पढ़ाई की तो हम लड़कियों को पढ़कर क्या करना है? हाँ, हो सकता है कि माँ इस भाई को पढ़ाए। लेकिन संभव होगा तब तो।”

मैं भौंचक्क-सी खड़ी थी, उसकी बुद्धि और मानसिकता को देखकर। उम्र से पहले कुछ ज़्यादा ही समझने लगी थी। मैंने फ़िर पूछा, “यहाँ आती हो तो सभी को देखकर पढ़ने की इच्छा नहीं होती?”

“पढ़ने की? मुझे क्या पता कि यहाँ पर कोई क्या करता है। वो तो पिछले साल कुछ ऐसा ही हुआ था, तो उसमें एक-एक लड्डू हमें भी मिला था, इसलिए आज भी आ गई हूँ।”

मेरी नज़र गई वहाँ, जहाँ मेस के कुछ कर्मचारी उन बच्चों को एक-एक लड्डू दे रहे थे। बार-बार पंक्ति में लगने का आग्रह किए जाने के बाद भी उनकी ‘अनुशासनहीनता’ चरम पर थी। मैंने फिर उस लड़की की ओर देखा। वहाँ कोई नहीं था। नज़रें फिर उन बच्चों की तरफ़ गईं, तो वो कब की उन बच्चों में शामिल हो चुकी थी।

तभी मंच संचालक ने घोषणा की, “इसी के साथ स्वाधीनता-स्वर्ण जयंती पर आयोजित अभी का यह कार्यक्रम समाप्त होता है। सभी शिक्षकों, कर्मचारियों और छात्र-छात्राओं से अनुरोध किया जाता है कि सायं 6.30 बजे झंडा उतारने के कार्यक्रम में अवश्य सम्मिलित हों।

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क़िरदार

Posted by Jaya on February 14, 2005

Okay this is one of the few stories I have ever tried to write. Written on 24/05/1997. Yeah, that 1997! Pretty old. Almost 8 years. I was in class 9th then… So, you have to be little liberal minded (keeping the age-factor of author in mind) while reading it… :-)

And of course, your browser needs to be unicode enabled to be able to view this text in Devnagri. (Goodness! It has taken some effort to type the whole thing…)

“पढ़ती हो?”
किसी इन्टरव्यू बोर्ड के सदस्य के से लहज़े में पूछे गए इस साधारण से सवाल से भी एकदम से घबरा गई वह पंद्रह वर्ष की दुनियादारी से अनजान किशोरी, किसी अनुभवहीन उम्मीदवार की तरह। हालांकि तब या उसके बाद भी मेरे द्वारा दिए गए ये उपमान उसके दिमाग़ में नहीं आए होंगे।
“जी, पढ़ना-लिखना आता है।”
अतिसंक्षिप्त सा जवाब देना की कोशिश की उसने।
“अच्छा! ज़रा कॉपी-पेन मँगवाइए तो।”
किसी ज़रख़रीदे ग़ुलाम की तरह उसकी माँ ने उठकर उसके छोटे भाई से कॉपी-पेन लाने को कहा। उसे हड़बड़ाहट में पेन नहीं मिल रहा था। मैं मौक़े की नज़ाक़त को समझती हुई ज़ल्दी से उठी और बिना कुछ कहे अपने घर की ओर दौड़ गई तथा एक लाल कलम और कॉपी ले आई। लेकिन तब तक उसके भाई ने उसके हाथ में ‘परीक्षा’ के लिए कॉपी-कलम थमा दिया था।
“अरे भई! ज़रूरी है। अगर शादी तय हो जाती है तो ससुराल इतनी दूर होगा। कम-से-कम हाल-समाचार लिखना तो आना ही चाहिए।”
हाँ भई! बात तो दूर की सोची है। क़ाफ़ी ‘समझदार’ हैं। कहीं किसी अनपढ़ लड़की से शादी न करा दी जाए उनके लड़के की। लड़की का बाप भी गया था लड़का देखने। अब उसे अनुभवहीन कहा जाए कि उसने लड़के की परीक्षा नहीं ली या अनुभवी (आखिर लड़की का बाप था)! ख़ैर! ये पैमाना निर्धारित करने का मुझे न तो कोई अधिकार था, न ही आवश्यकता। आगे चन्द सवालात और पूछ कर बेचारी की इन्टरव्यू से तो छुट्टी हो गई। प्रारंभिक परीक्षा में तो भगवान के दिए चेहरे और शरीर के कारण वह पहले ही पास हो गई थी। अब प्रायोगिक परीक्षा की बारी थी। मुझे यक़ीन था, जो कि सच भी साबित हुआ, उसमें वह आसानी से पास हो गई क्योंकि होश सँभालने के बाद से उसने इसकी ही तैयारी की थी।

लेकिन आजकल की परीक्षाओमें एक चरण और जुट गया है, और इस चरण में उम्मीदवारों की योग्यता धरी की धरी रह जाती है, क्योंकि इस चरण में उनकी योग्यता की नहीं अपितु इस बात की जाँच होती है कि उनके अभिभावकों के पास अपना या दूसरों का छीना हुआ ही सही, कितना खून-पसीना है।

“लड़के की शादी कर रहे हैं, कोई घर से थोड़े ही न ख़र्च करेंगे, लेकिन लड़के-लड़की की शोभा तो होनी ही चाहिए।”मेरी माँ जानती थी कि यह ‘दहेज प्रथा – एक अभिशाप’पर उपदेश पिलाने का समय नहीं है। इसलिए बोली, “हाँ, बात तो आपकी सही है कि घर से क्यों खर्च करेंगे। लेकिन…”

बात पूरी नहीं हुई थी कि कुछ सज्जन-वृंद, जिनमें लड़के के भाई और एक चचेरे भाई थे, अंदर प्रविष्ट हुए। महिलाओं के झुंड में से एक ने कहा, “अरे भई! कुछ कुर्सी वगैरह मँगवाइए तो ये लोग भी बैठ जाएँ।”

माँगी हुई चादर पर उन महिलाओं को बैठाने वाली उसकी माँ इस अनपेक्षित माँग पर सकपका-सी गई, लेकिन फिर सँभल कर बेटे को मेरे यहाँ भेजा। मेरा माँ भी उसके साथ गई और झूठ क्या कहा जाए। ऐसे समय में एक मध्यमवर्गीय परिवार से ज़्यादा शर्मनाक स्थिति किसी की नहीं होती है। एक उच्चवर्गीय परिवार में कुर्सी नहीं होने का कोई सवाल नही है, गरीब के घर में न हो तो कोई बात नहीं, लेकिन एक बैंक ऑफिसर के घर में कुर्सी न हो! जो भी हो घर में कुर्सी नहीं थी। खैर! माँ ने समझदारी से काम लेते हुए एक खाट और उसके साथ एक धोई हुई चादर भिजवा दी। जैसे ही वह खाट लेकर आया, मैनें भी ‘लड़की वालों की तरफ़ से होने के कारण’ सुघड़ता और तत्परता का परिचय देते हुए तुरत उस पर चादर बिछा दी। ये अलग बात थी कि उनके साथ आए छः-सात बच्चों ने, जो नल के पानी से ऐसे सराबोर हो चुके थे, मानों होली खेल कर आए हों, मुश्किल से दो मिनट में उस चादर का कबाड़ा कर दिया। वे देवघर में रहने वाले बच्चे उस भोलेशंकर के गणों से कम तो कहीं भी नहीं दिख रहे थे। कभी-कभी तो उन गणों को लेकर आए लोगों की संख्या देखकर मुझे ये संदेह होने लगता था कि वे लड़की देखने आए हैं या पार्वती को ब्याह कर ला जाने।

खैर! जो भी हो। आख़िर थे तो लड़के वाले ही। उनके पास हाड़-माँस का बना एक प्राणि, जिसे समाज ने ‘लड़का’नाम दिया है, जो शादी के बाज़ार में बिकाऊ और कमाई का अच्छा स्रोत होता है, वह था।

इधर मेरी माँ की उन महिलाओं के साथ बात-चीत आगे बढ़ी। तब तक लड़के के बहनोई अपनी पत्नी को उठाकर अलग ले गए, विचार-विमर्श करने, फिर लड़के के भाई साहब चले, पीछे से उसकी माँ और भाभी भी। अंततः लड़की का पिता भी वहाँ पहुँचा, अपनी क्षमता का ब्यौरा देने।

और फिर उधर से महिलाओं का झुंड लगभग चिल्लाता हुआ लौटा, जहाँ मैं, लड़की की माँ और लड़की देखने आई एक-दो महिलाएँ बैठी थीं। माँ पहले ही किसी काम से घर चली गई थी।

“भला ऐसा भी कहीं हुआ है। अरे! लड़के की शादी कर रहे हैं, घर से तो नहीं ही देंगे। फिर लड़के-लड़की की शोभा तो होनी ही चाहिए। गरीब-से-गरीब भी एक अँगूठी और घड़ी दे देता है। एक सोने की चेन तो चाहिए ही…।”

आगे सुनने की हिम्मत नहीं थी और सामाजिकता के आधार पर उम्र के लिहाज से बैठना भी उचित नहीं था। इसलिए वहाँ से चली आई।

कुछ देर बाद माँ गई थी। खाना-पीने चल रहा था, पर सभी का मिजाज़ सुस्त था। वह वहाँ से चली आई।

उनके जाने के बाद फिर गई, सामाजिकता निभाने। मैं तब तक टी. वी. पर आ रही फ़िल्म देखने का लालच नहीं छोड़ पाई। माँ के पीछे-पीछे ही गई।

वहाँ लड़की की माँ मेरा माँ को माँगों का लिस्ट बता रही थी,”कह रहे थे, कम-से-कम दस हज़ार जो हम पचास बारातियों को लाएँगे और उनकी व्यवस्था करेंगे, बहूभात के लिए कम-से-कम… लड़के-लड़की को कम-से-कम… और…”

क्या इस कम-से-कम की कोई सीमा थी? माँ ने उसे सांत्वना दी, “क्या है? वह नहीं तो कोई और होगा। लड़कों की कमी थोड़े ही न है…”

और मैं? सोच रही थी कि उस लड़के की माँ ने अपनी बेटी भी तो ब्याही, उस लड़के की भाभी भी तो उसी घर में बहू बनकर आई थी, इन्हीं परिस्थितियों को झेलकर…। क्या वे सब ख़ुद को भूल गई हैं? आख़िर वे भी किसी की बेटी हैं, आख़िर उनकी भी कोई बेटी है। लेकिन कोई फ़ायदा नहीं, देखना यह भी है कि आज जो ये बेटी वाले हैं, वे भी कल बेटे वाले बनकर कहीं जाएँगे। क्या उस वक़्त उन्हें यह परिस्थिति याद रहेगी?

ख़ैर! बीच आँगन में एक लैम्प जल रहा था। हमारे घर का ही था। जानती हूँ कि तेल बहुत महँगा है और ब्लैक में मिल रहा है, परन्तु बची-खुची रोशनी भी वहाँ से उठा लेने का साहस नहीं था। लेकिन लड़की कापिता भी इस तथ्य से परिचित था। इसलिए स्वयं ही लैम्प बुझाकर उसने माँ की ओर बढ़ा दिया।

सोच में डूबी घर आई तो माँ से कुछ और भी पता चला। लड़की के बाप के लड़के वालों के पास जाने से पहले उनलोगों ने पाँच रुपये महीना प्रति सौ रुपये के सूद पर एक सूदख़ोर से कर्ज़ लिए थे। और आज फिर ‘कुटुम्ब’के सत्कार के लिए पाँच सौ रुपये।

अजीब उथल-पुथल थी मन में। सभी इस स्थिति का सामना करते हैं, लेकिन फिर भी समाज बदलता क्यों नहीं है? जिसने ख़ुद भोगा, वह दूसरों को भी भोक्ता क्यों बनाना चाहता है? जवाब देना वाला कोई नहीं था। ग्रिल से झाँक कर देखा, तो वह लड़की मेकअप उतार कर, कपड़े बदल जूठे बर्त्तन धो रही थी।

तभी से एक बात और सोच रही हूँ, मैं वहाँ क्यों गई थी? उनके दुख को बाँटने, या तमाशा देखने, या अपनी कहानी के लिए एक सशक्त क़िरदार ढूँढ़ने?

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