Posted by Jaya on February 27, 2009
मन क्यों ना तू खुश होता रे?
जब थीं दिल में उमंगें जागी,
जब सपने नए मिले थे सारे,
कितनी मन्नतें तब माँगी,
कितने देखे टूटते तारे।
अब जब झोली में हैं आए,
क्यों है तू यों थका-थका रे।
रस्ते का क्यों दर्द सताए,
सामने मंज़िल बाँह पसारे।
मन क्यों ना तू खुश होता रे?
–
खुशी न जाने क्यों नहीं आती!
मंज़िल क्यों वैसी नहीं लगती,
जैसी थी सपनों में भाती,
जो भी पीछे छोड़ आया हूँ,
अलग ये उससे नहीं ज़रा सी।
प्रश्न है खुद से जिसको ढूँढ़ा
क्या वो कोई मरीचिका थी?
और उसे सब कुछ दे डाला
बची है बस ये राख चिता की।
खुशी न जाने क्यों नहीं आती!
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Posted by Jaya on February 11, 2009
चाहे कुछ भी हो जाए
मेरी जान मत घबराना।
एक-एक कर सारे
<div>s ठिकाने लगाना।
Inline CSS भर जाएँगे
File हो जाएगी ugly,
सब समझने से लगेगी
Assembly language भली।
पर हिम्मत हारे बिना
Refactoring में लग जाना।
चाहे कुछ भी हो जाए
मेरी जान मत घबराना।
जब भी तुम करोगे
कोई feature आख़िर fix.
IE7 मान भी जाए
रोएगा देखना IE6.
उसके सब work-arounds
Googling कर कर के लाना।
चाहे कुछ भी हो जाए
मेरी जान मत घबराना।
कभी-कभी हो जाएगा
MySQL gone away.
कभी शायद php का
Timeout तुम पे हँसे।
Server को गालियाँ दे देना
पर upgrade ज़रूर करवाना।
चाहे कुछ भी हो जाए
मेरी जान मत घबराना।
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Posted by Jaya on August 23, 2008
बड़े दिनों के बाद आज
सूरज से पहले जगी,
बड़े दिनों के बाद सुबह की
ठंढी हवा मुझपर लगी।
बड़े दिनों के बाद पाया
मन पर कोई बोझ नहीं,
बड़े दिनों के बाद उठकर
सुबह नयी-नयी सी लगी।
बड़े दिनों के बाद दिन के
शुरुआत की उमंग जगी,
बड़े दिनों के बाद मन में
पंख से हैं लगे कहीं।
बड़े दिनों के बाद आज
मन में एक कविता उठी,
बड़े दिनों के बाद आज,
कविता काग़ज़ पर लिखी।
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Posted by Jaya on January 13, 2008
मन के पीछे चलने वाले,
मन के साथ भटकना होगा।
हाँ, अभी देखी थी मन ने
रंग-बिरंगी-सी वह तितली
फूल-फूल पे भटक रही थी
जाने किसकी खोज में पगली।
पर वह पीछे छूट गई है
इन्द्रधनुष जो वह सुन्दर है
अब उसको ही तकना होगा।
मन के पीछे चलने वाले,
मन के साथ भटकना होगा।
बच्चों-सा जो कल सीधा था
और कभी किशोर-सा चंचल
आज वयस्कों-सा वह दूर, क्यों
रूप बदलता है पल-पल?
मन घबराए, गुस्सा आए
चोट लगे, आँसू आ जाएँ
हर कुछ को ही सहना होगा।
मन के पीछे चलने वाले,
मन के साथ भटकना होगा।
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Posted by Jaya on January 11, 2008
गाए हैं बहुत ही मैंने, सुख और दुःख के गीत
आओ सुनाऊँ आज खालीपन का भी संगीत।
महसूस की है तुमने रागिनी जो बजती है
जब बाहों में होकर भी मिलता नहीं मीत?
जब सैलाब-सा होता है मन के अंदर कोई पर
मिलती नहीं दो बूँद जिससे धरती जाए रीत।
मुस्कान की जगह आँसू आते आँखों में जब,
जीत कर भी ज़िन्दग़ी में मिलती नहीं जीत।
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Posted by Jaya on January 3, 2008
हो रही है बेचैनी सी, कुछ तो लिखना है मुझे,
ना हो बात जो ख़ुद पता पर, वो कोई कैसे कहे?
इंतज़ार की आदत जिसको, बरसों से है हो गई
मिलन के सपने बुनने की समझ उसे कैसे मिले?
उजड़े महलों पर ही नाचना, जिसने हरदम सीखा हो
रंगशाला की चमक भला, कैसे उसकी आँख सहे?
जिसने हँसना सीखा है, ज़िन्दग़ी के मज़ाक पर
दे देना मत उसको खुशी, खुशी का वो क्या करे?
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Posted by Jaya on July 26, 2007
सवाल कईयों ने पूछे हैं,
मैं पहली नहीं हूँ।
सवाल सभी पूछते हैं,
मैं अकेली नहीं हूँ।
पर बहुत से लोग
सवाल पूछ-पूछ कर थक गए।
जवाब मिलने की तो छोड़ो
कोई अलग रास्ता तक न सूझा।
उसी लीक पर चलते गए।
और मैं?
क्या कम-से-कम
अलग रास्ता अपना पाऊँगी?
या यों ही अपने सारे सवाल लिए
एक दिन ख़ुद भी चली जाऊँगी।
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Posted by Jaya on May 12, 2007
है नहीं कुछ फिर क्यों भारी मन है,
दिन के अंत में कैसा अधूरापन है?
बोझिल आँखें, चूर बदन हैं, थके कदम से
कहाँ रास्ता मंज़िल का भला पाता बन है?
अधूरेपन की कविताएँ भी अधूरी ही रह जाती हैं,
पूरा कर पाए इन्हें, कहाँ कोई वो जन है?
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Posted by Jaya on December 29, 2006
कौन सा है रास्ता जो यों मुझे बुला रहा?
धुंधला ये स्वप्न मुझे कौन है दिखा रहा?
बदली कई बार मग़र राह अभी मिली नहीं
चलने को जिसपर मेरा मन कुलबुला रहा।
बैठी थी यों ही, पर वैसे ना रह सकी
सफ़र कोई और है जो मुझे बुला रहा।
यहाँ-वहाँ, कहीं-कोई, झकझोर सा मुझे गया
कोई है सवाल जो पल-पल मुझे सता रहा।
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Posted by Jaya on October 16, 2006
सब आ जाते रास्ते पर मैं ही तो बेराह नहीं?
सबके दिन फिरते रब तक जाती मेरी आह नहीं।
छिन जाता है ये भी, वो भी, हँस कर पर देखा करती मैं
बहाने की दो आँसू भी क्यों रह गई मुझको चाह नहीं।
गीत सुना जाते शायर सब, पंछी भी कुछ गा जाते हैं,
दर्द कौन सा है अंदर कि कहती मुँह से वाह नहीं।
इम्तिहान ये ज़िन्दग़ी के इतने लंबे क्यों होते हैं
कहना पड़ जाता है खुलकर – और अब अल्लाह नहीं।
(Written on OCtober 15, 2006)
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